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दुनिया मेरे आगे: सामाजिक छलना

कोई मजदूर बेहतर जीवन की तलाश में जब शहरों की ओर आता है, तो वह सिर्फ गांव नहीं छोड़ता, उसके साथ एक पूरा सांस्कृतिक जीवन पीछे छूट जाता है। वह जिस परिवेश में पला-बढ़ा होता है, उस वातावरण की ऊष्मा छूटती है, परिजनों का स्नेह छूटता है, संगी-साथियों का साथ छूटता है और छूट जाती है उसकी अपनी पहचान। इन सब खालीपन को ढोने के बावजूद वह कुछ भौतिक संसाधनों को हासिल कर लेना चाहता है, ताकि कम से कम अगली पीढ़ी की दिक्कतें कम हों।

संकट में मजदूर

कुछ दृश्य अपने स्वरूप में इतने शक्तिशाली होते हैं कि सदा के लिए मानस में अंकित हो जाते हैं। देखे जाने की भंगुर क्रिया के विपरीत ये स्थायी हो जाते हैं। चेतना में जीवित रहते हैं। इस प्रकार वे हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाते हैं। पर यह भी जरूरी नहीं कि कोई दृश्य हर किसी पर एक-सा प्रभाव डाले। किसी के लिए उस दृश्य को देखना एक क्रिया भर होगी, तो किसी के लिए विशेषण। जब दिल्ली की सड़कों पर हजारों मजदूर बदहवास होकर किसी भी तरह घर लौटने की जद्दोजहद में उमड़ पड़े, तो क्या इस दृश्य को पूरे देश ने एक ही नजर से देखा? क्या सब पर इसका एक-सा प्रभाव पड़ा? नहीं।

किसी के लिए यह सरकारी व्यवस्था की लापरवाही का दृश्य था, तो कोई इसमें संभावित मृत्यु का संचरण ढूंढ़ रहा था। किसी के लिए मूढ़ नागरिकों का उन्माद। तो साथ ही कोई इसे विवशता के सामूहिक रुदन के रूप में भी देख रहा होगा, तो किसी के लिए यह सामाजिक भरोसे के छिन्न-भिन्न हो जाने का संकेतक होगा। मेरे लिए यह दृश्य सामाजिक पराजय का पर्याय था।

मृत्यु किसी के लिए भी कम या अधिक डरावनी नहीं होती। और न ही किसी व्यक्ति के लिए जीवन कम या अधिक कीमती है। तो जब ऐसी स्थिति आ जाए कि जान पर ही बन आए, तो कोई क्यों न बदहवास हो! इसलिए मजदूरों की हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा कर घर पहुंचने की हड़बड़ाहट स्वाभाविक है। आखिर संकट के समय हर कोई अपने घर में होना चाहता है। तो इन मजदूरों में ऐसी चाह क्या कोई आश्चर्य का विषय है! घर क्या, कोई भवन की संरचना है, जिसमें जीने लायक बुनियादी सुविधाएं हों या फिर जन्म लेने वाली जगह?

घर इन दोनों में से कोई भी हो सकता है, मसला बस इतना है कि समाज के किस हिस्से पर भरोसा है और कौन-सी मिट्टी जीवन-मरण तक साथ रहने का आश्वासन देती है। अगर मजदूरों को वापस अपने जन्मस्थान की ओर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो निश्चित ही यह उस सामाजिक परिवेश के मृत होने का परिचायक है, जहां वे अब तक रह रहे थे। वह समाज उनमें इतना भरोसा नहीं जगा पाया कि वह उसके प्राणों की रक्षा कर लेगा। इससे न्यूनतम आश्वासन पर भी कोई सामाजिक व्यवस्था टिकती है क्या? पर अफसोस कि वर्षों से ऐसी कृतघ्न सामाजिक व्यवस्था चली आ रही है, जो एक वर्ग से उसका सब कुछ तो छीन लेती है, पर बदले में जान सलामत रहने तक की गारंटी नहीं दे पाती। भारत के शहरों का गांव के प्रवासियों के साथ ऐसा ही रिश्ता रहा है।

कोई मजदूर बेहतर जीवन की तलाश में जब शहरों की ओर आता है, तो वह सिर्फ गांव नहीं छोड़ता, उसके साथ एक पूरा सांस्कृतिक जीवन पीछे छूट जाता है। वह जिस परिवेश में पला-बढ़ा होता है, उस वातावरण की ऊष्मा छूटती है, परिजनों का स्नेह छूटता है, संगी-साथियों का साथ छूटता है और छूट जाती है उसकी अपनी पहचान। इन सब खालीपन को ढोने के बावजूद वह कुछ भौतिक संसाधनों को हासिल कर लेना चाहता है, ताकि कम से कम अगली पीढ़ी की दिक्कतें कम हों।

इन तमाम झंझावतों को झेलता हुआ वह किसी और समाज का हिस्सा हो जाता है और उसकी उन्नति के लिए अपना सब कुछ झोंक देता है। वह खाल उधेड़ देता है, ताकि शहर की दीवारें महफूज रहें, वह कारखानों के धुओं को अपने फेफड़े में भर लेता है और शहर को चमकीले उत्पाद देता है, वह अपना खून जला कर शहर को ऊर्जा देता है। शहर की सारी चमक-दमक इन मजदूरों के पसीने से ही आती है। घरेलू जरूरतों से लेकर ऊंची इमारतों को खड़ा करने तक में ये एकनिष्ठ भाव से डटे रहते हैं। इस प्रकार ये इस समाज का हिस्सा हो जाते हैं। इसकी हर गति में शामिल हो जाते हैं। शहर को पहचानने लगते हैं। अपनी रोजी के सहारे ही सही, शहर से घुलने-मिलने लगते हैं। शहर इनके लिए आशा का केंद्र होता जाता है।

बदले में क्या इन मजदूरों का इतना भी हक नहीं बनता कि यह शहर संकट के समय उसके साथ खड़ा रहे? जिसके लिए वह आजीवन लड़ता रहा, वह उसके लिए एक दिन लड़ ले? पर यह छोटी-सी उम्मीद भी पूरी नहीं होती। अगर होती तो यों हजारों मजदूरों को अनिश्चितता में यों भटकना नहीं पड़ता। उसका कोई पड़ोसी उसे जीवन का आश्वासन दे देता, तो वह क्यों भटकता। पर ऐसा नहीं हुआ। उस समाज ने इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया। दिल्ली की सड़कों पर का दृश्य छली हुई सामाजिकता और कृतघ्नता के सताए समुदाय के क्रंदन का दृश्य था। दोष तो कइयों को दिया जा सकता है, सरकार को या फिर स्वयं इन मजदूरों को ही, पर मुख्य दोषी कृतघ्न समाज है।

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