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दुनिया मेरे आगे: भविष्य की हथेलियों पर

हम जिन चीजों के बारे में नहीं जानते, उन्हें हमने उजले रंगों से रंग कर रख लिया है, ताकि जब भी खुलेगी मुट्ठी, कुछ अच्छा ही होगा। कुछ उजले रंग बिखरेंगे जो अतीत के स्याह को ढंक लेंगे। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता।

Dunia Mere Aageदुनिया की खुशियां और प्रकृति का सान्निध्य (फोटो-फ्रीपिक)

प्रतिभा कटियार

हर साल के आखिरी और नए साल के शुरुआती दिनों में नए को सोचती हूं कि क्या था जो बीत गया और क्या है जो आने वाला है। भविष्य एक भोली उम्मीद है, जिसकी मुट्ठी में क्या है, क्या नहीं, पता नहीं, लेकिन हम उसे लेकर आशान्वित जरूर रहते हैं। इतिहास में यह साल दर्द, भूख, मृत्यु, भय के लिए दर्ज होगा शायद। लेकिन इसके अलावा भी कुछ था जो इस बरस में अच्छा था। उसके बारे में भी बात होनी चाहिए। जब पिछले बरस नए कैलेंडर ने अपनी मुट्ठी धीमे से खोली थी, तब हमारी उम्मीद को नहीं पता था कि वह इस कदर मुरझा जाएगी। हम नहीं जानते थे कि एक महामारी इस वर्ष हमारे सामने खड़ी होगी। हमें एहसास नहीं था कि पूरी दुनिया घर-कैद में धकेल दी जाएगी और किसी भी तरह तमाम सुरक्षा उपायों को करते हुए जान को बचा ले जा पाना ही बड़ी उपलब्धि होगी।

हम जिन चीजों के बारे में नहीं जानते, उन्हें हमने उजले रंगों से रंग कर रख लिया है, ताकि जब भी खुलेगी मुट्ठी, कुछ अच्छा ही होगा। कुछ उजले रंग बिखरेंगे जो अतीत के स्याह को ढंक लेंगे। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। और कई बार रंग भी अपना घर बदल लेते हैं, जिसकी ओर अक्सर हमारी नजर जाती नहीं। जैसे जिसे हम स्याह समझे बैठे रहे, उसमें जीवन की इतनी सीख छिपी थी। रिल्के ने यों ही नहीं कहा होगा कि जीवन में अवसाद के होने का अर्थ है, जीवन ने हमें बिसराया नहीं है।

बीता बरस बहुत सारे दंश देकर गया, लेकिन कई मायनों में सीखने का साल था। सीखा कितना, यह अलग बात है। दरअसल, हमें बीते साल में सीखना था ज्यादा मनुष्य होना, गिराने थे भेदभाव के किले। बेशक कुछ किले गिरे, मगर कुछ मजबूत भी हुए। जो गिरे, उनका शुक्रिया अदा करना बनता है। जैसे मैंने देखा इस दौर में कि शिक्षकों ने अपनी भूमिकाओं को खूब अच्छे से पहचाना। बिना किसी सरकारी आदेश के अपनी इच्छा से उत्तराखंड के हजारों सरकारी स्कूल के शिक्षकों ने अपनी तरफ से इस बुरे वक्त की ओर मदद के हाथ बढ़ाए। ऐसा दूसरे प्रदेशों में भी हुआ होगा। शिक्षकों ने बच्चों से बात की, उनके माता-पिता से बात की।

राशन के साथ-साथ सैनिटाइजर और मास्क जैसे कोरोना से बचाव के उपाय भी उन तक पहुंचाए। सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उनके साथ संवाद भी कायम किया। एक ओर समृद्ध मध्यवर्ग आॅनलाइन होती पढ़ाई को लेकर जूझ रहा था, वहां इन शिक्षकों के बच्चों के पास आॅनलाइन होने के बारे में सोचना भी किसी सुविधासंपन्नता और विलासिता जैसा ही था। किस तरह दूरदराज में कोई शिक्षक बच्चों से बात कर रहा था, उन्हें पढ़ा रहा था! कोई शिक्षक फोन पर कहानियां सुना रहा था, तो कोई बच्चों से जान रहा था उनका हाल। कुछ शिक्षकों ने आपस में मिल कर प्रवासी मजदूरों के लिए रसोई चलाई।
ये वही सरकारी स्कूल के शिक्षक हैं, जिनके बारे में नकारात्मक सोच समाज में बैठी रही है।

एक धारणा बन गई लगती है कि सरकारी स्कूल के शिक्षक हैं तो समाज के लिए उनकी कोई उपयोगिता नहीं है। हालांकि अपने सबसे बुरे समय में भी इन शिक्षकों ने उम्मीद कि किरणों को जिलाए रखा। इस समय ने समाज की उस नकारात्मक सोच की दीवार को तोड़ा। लगातार अपनी सामर्थ्य से ज्यादा ही काम करते रहे ये शिक्षक। उनके काम की भूमिकाओं को लेकर सरकारी आदेशों के आने से पहले ही ये लोग समुदाय और बच्चों से जुड़ चुके थे। उन्हें इस कोविड के खतरे से बचने को उन्होंने कहा और सकारात्मक ऊर्जा को बचाए रखने की कोशिश की।

बुरे वक्त की अच्छी बात यह होती है कि वह हमें जुड़ना सिखाता है। मनुष्य होना सिखाता है। लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे किसी भी बुरे वक्त के दौर में, चाहे वह महामारी का दौर हो या युद्ध के बाद का, अराजकता भी बढ़ी है। युद्ध के बाद की होने वाली लूटपाट की घटनाओं का पूरा एक इतिहास है। समझना बस यह है कि ऐसा आखिर क्यों होता होगा। मनोवैज्ञानिक नजरिए से अगर सोचें या देखें तो इसका कारण होता है असुरक्षा का भाव। असुरक्षा से अविश्वास जागता है और लालच तो है ही सबकी जड़ में। वजह चाहे जो होती हो, लेकिन इसकी आग में युद्ध से बची हुई एक बड़ी आबादी को झुलसना पड़ता है।

जो हो, इस जाते बरस ने हमारी हथेलियों पर यह ताकीद रखी है कि सिर्फ और सिर्फ मनुष्य बन कर ही जीता जा सकता है किसी भी बड़ी से बड़ी लड़ाई को। और अगर यहां चूक हुई तो महामारी से बड़ी बीमारी हम सबको खा जाएगी… अविश्वास की, लालच की, हिंसा की। महामारी से चाहे हम बच भी जाएं, या इससे ठीक भी हो जाएं, लेकिन अगर अविश्वास और हिंसा ने हमारे बीच घर बना लिया तो हम बच कर भी क्या ही कर लेंगे!
फिर से कैलेंडर बदला है… फिर से हथेलियों में उम्मीद के सिक्के बंद हैं। हमें अपने जीने के ढंग से इन सिक्कों को खोटा सिक्का होने से बचाना है। नया साल तभी कुछ नया होगा, जब हमारे बीच गाढ़ा होगा स्नेह और भरोसा। वरना कैलेंडर बदलना कोई नई बात नहीं।

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