ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: असीम प्रकृति

हम उसे प्रकृति का नाम दें या कुछ और..! वही अदृश्य, अनजानी शक्ति सांसों के स्पंदन के रूप में हमारे भीतर भी वर्तमान है। इन सारे तथ्यों को देखने और जानने बावजूद हर युग में मनुष्य अपने अनावश्यक भ्रम और झूठी दंभ से भरी महत्ता को सिद्ध करने के लिए उस ‘सर्वशक्तिमान’ को बांधने और बांटने के लिए प्रपंच करता रहा है।

Urbanisationशहरीकरण से बढ़ती आम लोगों की दूरी। (फाइल फोटो)

संगीता सहाय

शहरी सुविधाओं की चाह और रोजगार प्राप्ति के साधनों की कमोबेश उपस्थिति के कारण दिन-प्रतिदिन बढ़ती आबादी के दबाव से विस्तृत होता हमारा शहर वर्तमान में विस्तार के अंतिम सीमा को छूने लगा है। स्थिति यह हो गई है कि शहर के सबसे सुदूर इलाके के रूप में गिना जाने वाला और कम पैसे वाले लोगों की रिहाइश के लिए माकूल माना जाने वाला हमारा क्षेत्र भी आज शानदार बहुमंजिली इमारतों और सुरुचिपूर्ण तरीके से बने घरों से शोभायमान होता जा रहा है। ऐसे में यहां रहने वाले लोगों की बेहतर जीवन शैली के मद्देनजर स्वाभाविक रूप से इस विस्तारित होते मोहल्ले में अवस्थित एक चौरस सरकारी जमीन के हिस्से को पार्क निर्माण के लिए तय किया गया है। और यही बात आज समस्या का कारण भी बन गया है, क्योंकि यहां पहले से रह रहे कुछ शक्ति संपन्न लोग उस स्थल पर एक मंदिर निर्माण की शुरुआत कर चुके थे। जबकि प्रशासन और मोहल्ले के कुछ पढ़े-लिखे नई पीढ़ी के लोग चाहते थे कि वहां पार्क बने।

दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। इस मामले ने पहले आपसी रंजिश को जन्म दिया, फिर बढ़ते-बढ़ते दोनों पक्ष अदालत तक जा पहुंचे। अब फिलहाल वहां किसी भी निर्माण या काम के लिए अदालत की ओर से रोक लग चुकी है। इस स्थिति ने जाने-अनजाने वहां के लोगों को दो खेमों में बांट दिया है। वे अपनी-अपनी मान्यताओं और विचारों को सही सिद्ध करने की जुगत में लगे हैं। ऐसी समस्याएं अक्सर मैंने भिन्न मतावलंबी के लोगों के बीच उठते देखा है। पूरे विश्व में वर्गीय रंजिश और झगड़े का सबसे बड़ा कारण धार्मिक मतभेद ही है। कई ऐसे देश है जो इस विषय को मुद्दा बना कर आपस में लड़ रहे हैं और बर्बाद हो रहे हैं।

ऐसी परिस्थितियां मेरे मन में विचारों का बवंडर खड़ा करती हैं। यह सवाल कुरेदने लगा है कि आखिर मनुष्य मंदिर, मस्जिद, चर्च जैसे इबादतगाहों का निर्माण क्यों करता है! वह जिसे सर्वशक्तिमान की संज्ञा देता है, जिसकी अनजानी शक्ति और सत्ता के आगे सदैव नतमस्तक रहता है, उसी को भिन्न-भिन्न रूपों वाले ईंट-गारे से बने दड़बों और महलों में बांधने की कोशिश क्यों करता है? वह एक तरफ सभ्यता और संस्कृति की जननी ‘नदियों’ को मां की संज्ञा देता है। उन्हें मोक्षदायिनी मानता है, उनके अंजुरी भर बोतलबंद जल से गाहे-बगाहे अपने घर को शुद्ध करता है, वहीं उन्हीं नदियों में गंदगी को उड़ेलने, मलिन और जहरीले पदार्थों को डालते हुए उफ्फ तक नहीं करता।

सच कहूं तो मनुष्य के इस मूढ़ता भरी हिमाकत पर मुझे हंसी और नाराजगी दोनों एक साथ आती है। एक तरफ वह कहता है कि जगत के कण-कण में ईश्वर का वास है, उसकी इच्छा सर्वोपरी है, दुनिया के प्रत्येक चर और अचर, धरा, आसमान, प्रकृति हर चीज का निर्माणकर्ता और संहारकर्ता ईश्वर ही होता है और दूसरी ओर, फिर उस असीम को बांधने के लिए हर गली, मुहल्ले, चौक, चौराहे पर दड़बों का निर्माण वालों को क्या कहेंगे?

गौरतलब है कि हमारी तमाम वैज्ञानिक प्रगति, मनुष्य के द्वारा बेहिसाब रूप से विकास के पायदानों को मापने और संसार के सारे बूझ-अबूझ रहस्यों के परदे खोल लेने का दावा करने के बावजूद यह एक बड़ा सत्य है कि आज भी लगभग हरेक व्यक्ति, चाहे वह नास्तिक हो या आस्तिक, इस तथ्य को तो मानता ही है कि जीव, धरती, आसमान, सूर्य, चांद, दिन, रात, हवा, मिट्टी के बीच बहुत कुछ ऐसा है, जो अब तक अबूझा और अनजाना है। हम उसे प्रकृति का नाम दें या कुछ और..! वही अदृश्य, अनजानी शक्ति सांसों के स्पंदन के रूप में हमारे भीतर भी वर्तमान है। मादा के कोख में पड़े नर शुक्राणु रूपी सूक्ष्मतम कण से साकार जीव बनने और धरा के अंक में लिपटे लघु बीज से पौधा और फिर विशालकाय वृक्ष बनने तक में, हर तरफ वही शक्ति अपनी पूर्ण सर्वोपरिता के साथ हमारे भीतर बाहर, हर ओर उपस्थित है। यह भी गौरतलब है कि बगैर किसी विभेद के पृथ्वी के कोने कोने में हर देश, समाज और कौम में यह शक्ति सामान रूप से उपस्थित है।

लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि इन सारे तथ्यों को देखने और जानने बावजूद हर युग में मनुष्य अपने अनावश्यक भ्रम और झूठी दंभ से भरी महत्ता को सिद्ध करने के लिए उस ‘सर्वशक्तिमान’ को बांधने और बांटने के लिए प्रपंच करता रहा है। ऐसा करता हुआ वह ‘मैं सब जानता हूं’, ‘सब कुछ मेरी मुट्ठी में है’ और ‘यह दुनिया मेरे बगैर रुक जाएगी’ का भ्रम पाले रहता है। वास्तव में मनुष्य द्वारा भिन्न-भिन्न प्रयोजनों के माध्यम से शक्ति और सत्ता को बांधने करने की कोशिश करना उसकी नादानी और नासमझी का सबसे बड़ा प्रमाण है। क्या यह अपने आप में एक विरोधाभासी विचार नहीं है कि जिसकी कोई सीमा नहीं है, उसे हम कुछ निर्माणों में सीमित करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि आखिरकार हम उसे बांध नहीं पाएंगे। हमें यह याद रखना चाहिए कि प्रकृति असीम है और उसे बांधने की हर कोशिश न सिर्फ नाकाम हुई है, बल्कि त्रासद नतीजे देने वाली भी साबित हुई है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: तरक्की का प्रशस्तिगायन
2 दुनिया मेरे आगे : जरा देख के चलो
3 दुनिया मेरे आगे: बाजार की नई चमक