दुनिया मेरे आगे: बसंत की पगध्वनि

बसंत प्रकृति की मुस्कान है। उसकी खुशी है। जिस तरह हमारा जीवन खुशियों से शृंगार कर खिलता है, बिल्कुल उसी तरह वर्ष बसंत के माध्यम से मुस्कुराता है। बसंत जीवन की उदासी को मिटाती प्रेरणा है।

Author Updated: February 10, 2021 12:27 AM
Spring Seasonबसंत की मुस्कान के साथ सड़क पर बहार। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

सरस्वती रमेश

बसंत यानी प्यार में पड़े पक्षियों के चहचहाने का मौसम। प्रेम पिपासु जोड़ों के इठलाने का मौसम। बसंत तो बहार का माह ही है। गेंदे के फूलों के गदराने और भंवरों, मधुमक्खियों के गुनगुनाने के नजारे इन दिनों आम रहते हैं। पेड़-पौधे, झाड़ियां और फूल जाड़े की शुष्कता को झाड़ कर जैसे सौंदर्य की ओर करवट बदल लेते हैं। पीपल, नीम में जामुनी रंग की कोमल पत्तियां फूटने लगती हैं। आम के पेड़ में हर कली-कली पर बौर छा जाते हैं तो महुआ की सुगंध से बागों में रहने वाले जीव मदमस्त हो उठते हैं। पेड़, छाल, पात, डाल हर तरफ बसंत दिखता है। मैदानों में, कछारों में, ढलानों में, पहाड़ों में, बागों, बगीचों, तनों, फुनगियों, क्यारियों, गमलों और मन की धरती के हर कोने में बसंत बिहंस रहा है।

अपने झोंकों से द्वार-द्वार खटखटा रहा है। अपने आने की सूचना दे रहा है। इस मौसम में हवा भी बसंत के प्रभाव से बासंती हो उठती है, जिसकी सरसराहट अंगों को झिंझोड़ कर रख देती है। गांव-कस्बों के लोगों की जुबान में कहें तो फगुनाहट बहती है। वहीं खेतों में गेहूं, सरसों उफान पर होते हैं। किसान अपनी फसलों के रूप को देख मुग्ध होता रहता है, तो हम जैसे जबरन शहरी बने लोग आते-जाते सरसों के पीले फूलों को तरसती आंखों से देख कर ही संतोष का सुख ले लेते हैं।

इस वक्त अपने रूप को सजा-संवार कर मानो पूरी कायनात का जर्रा-जर्रा प्रेम में होने का सबूत देने लगता है। चहुं ओर बस प्रेम ही प्रेम का रंग दिखता है। कभी पलाश के पेड़ों को देखिए, बसंत के प्रेम में कैसा जोगिया रूप धर लेता है। पलाश के वन प्रेम अग्नि में दहक से उठते हैं। कचनार शर्म से गुलाबी हो जाते हैं तो गुलाब के तो भाव ही आसमान पर चढ़ जाते हैं।

बसंत वर्ष का प्रेमी है। राह का गुलमोहर, जो मुसाफिरों को हंस-हंस कर मिलता है। ऋतुओं की दर्शक दीर्घा का अतिमहत्त्वपूर्ण तबके का कोना। समस्त काम कलाओं का खजुराहो। प्रकृति का मनोहारी रूप। धरती का सुखकारी आश्चर्य। इस नश्वर संसार में जो भी शाश्वत है, सर्वव्यापी है, सत्य है, वह बसंत का आगमन है। अनंत युगों से अनंत युगों तक बसंत आता रहा है, आता रहेगा, क्योंकि बसंत का आना ही निसर्ग का मुस्काना है। मुरझाए का खिल जाना है और सृष्टि का चलते जाना है। बसंत जीवन के थिर पानी में आया आवेग है, हलचल है, धारा है। जिंदगी की कुंद हुई गति को धार देने वाला कारगर हथियार है। बसंत में नवसृजन का जैसा मेला लगता है, वैसे अन्यत्र कहीं दुर्लभ है।

दरअसल, बसंत प्रकृति की मुस्कान है। उसकी खुशी है। जिस तरह हमारा जीवन खुशियों से शृंगार कर खिलता है, बिल्कुल उसी तरह वर्ष बसंत के माध्यम से मुस्कुराता है। बसंत जीवन की उदासी को मिटाती प्रेरणा है। जब शीत से ठिठुरती धरती में बसंती हवाएं ऊष्मा का संचार करती हैं, तब हमारे मन आंगन में भी जिजीविषा के बीज प्रस्फुटित होते हैं। उत्सव की इस बेला में हम भी अपने जीवन को तनिक और सुवासित, शृंगारिक बनाने के लिए मचल उठते हैं। प्रकृति के सौंदर्य और इसके उल्लास को अपने जीवन में उड़ेलने को व्याकुल हो उठते हैं।

सच कहें तो बसंत का संदेश भी यही है। हम अधिक प्रफुल्लतित हों, निराशाओं के धुंध से निकल जीवन में आशाओं की चमक धारण करें। बेहतर जीवन जियें। दूसरों को जीने की प्रेरणा दें। हंसे हसाएं। खुशियां फैलाएं। बसंत की पगध्वनि अजर-अमर है। बिल्कुल कीट्स की ‘नाइटिंगल’ की तरह, जो सदियों से अपनी मधुर वाणी को मनुष्य के कानों में घोल रही है। महाप्राण निराला के लिए तो बसंत का आना नवोत्कर्ष का छा जाना है- ‘सखि वसंत आया/ भरा हर्ष वन के मन/ नवोत्कर्ष छाया।’

पृथ्वी पर आई तमाम अराजकताओं के बावजूद बसंत आता रहा है और संपूर्णता में भी। उसके सौंदर्य में किंचित मात्र का दोष नहीं। वरना बीते वर्ष की त्रासद परिस्थितियों में भला किसने सोचा होगा कि बसंत कभी लौट भी सकता है। सच कहा जाए तो बसंत हमें नींद से जगाने आया है। झकझोरने आया है। देखो! धरा अपनी उदासी झाड़ कर मुस्करा रही है, तो फिर तुम क्यों उदास हो! बीते वर्ष की पीड़ाओं के संजाल में तुम क्यों उलझे हो… उठो, जागो… पीड़ा का अंत निकट है। आने वाले सुख की तैयारी करो। निर्बलों की हिम्मत बढ़ाओ। धीरज बंधाओ। आने वाला वक्त जीवन में इंद्रधनुषी कामनाओं के बीज बोने का है। तुम भी अपनी कामनाओं का शृंगार करो। उन पर रीझो, मुस्कराओ। बसंत की पगध्वनि सुन कर आपके हृदय में भी कोई हलचल हुई क्या?

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