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दुनिया मेरे आगेः कामयाबी का चेहरा

परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने की फिक्र बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों और यहां तक कि शिक्षकों को भी तनाव में डाल देती है।
Author April 29, 2017 02:43 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

चैतन्य सागर

परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने की फिक्र बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों और यहां तक कि शिक्षकों को भी तनाव में डाल देती है। नतीजे आने के बाद नब्बे प्रतिशत वाले के पीछे लाखों साठ और सत्तर प्रतिशत वालों के मां-बाप चुपचाप सिसकते दिखाई देते हैं। ‘सफल’ बच्चों के मां-बाप गर्व से अपने बच्चों की सफलता की गाथा सुनाते हैं और ‘असफल’ बच्चों को अकेले में चीख-चीख कर और लोगों के सामने दांत पीस-पीस कर कोसा जाता है। कई बच्चे घर के कोनों में सहमे, दुबके खड़े दिखाई देते हैं। यह शिक्षा है या एक क्रूर, निर्मम युद्ध! जो ‘असफल’ बच्चे हैं, उन्हें तो जैसे जीने का हक ही नहीं!

हमारे सामाजिक मूल्यों में कितने गहरे विरोधाभास हैं! सफल होने का दबाव किसी विषय को पढ़ने का आनंद ही छीन ले रहा है। गणित जैसे विषय को लेकर बच्चों में किस तरह से शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों और स्कूलों ने मिलजुल एक झूठा भय पैदा किया है, इस पर गौर कीजिए जरा। गणित बच्चों को समझ नहीं आता और उसे समझना बहुत जरूरी है, यह बात बचपन से बच्चों के दिमाग में बैठा दी जाती है। कठिन भी है और जरूरी भी। बच्चों को अगर गणित समझ में नहीं आता तो दोष किसका है? मेरा मानना है कि सिर्फ शिक्षक का। अक्सर कई स्कूल अपनी ही कोचिंग भी चलाते हैं। वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता के सवाल अब छिपे नहीं हैं।

एक ही शिक्षक जब कोचिंग में पढ़ाता है तो बच्चे को समझा देता है और वही शिक्षक स्कूल में उसी विषय को जटिल बना देता है! कई लोग मानते हैं कि कोचिंग और प्राइवेट ट्यूशन के जरिए शिक्षा के कारोबार को चलाने के लिए गणित, भौतिकी और रसायन शास्त्र को जानबूझ कर कठिन और जटिल ढंग से पढ़ाया जाता है। बच्चे के मस्तिष्क का रास्ता उसके दिल से होकर गुजरता है। जो शिक्षक उसके दिल को छूता है, उसका विषय अधिक समझ में आता है! मैंने आठ साल के एक बच्चे के मुंह से एक दिन सुना- ‘मैं हिंदी कभी नहीं पढ़ूंगा।’ मैंने वजह पूछी तो उसने बताया कि ‘क्योंकि मेरी हिंदी की टीचर बहुत ही निर्दयी है और मैं भी हिंदी पढ़ने पर वैसा ही बन जाऊंगा!’ कलेजा बींध देने वाली बात है यह।

अंकों के आधार पर बच्चों की काबिलियत और प्रज्ञा का आकलन कितना क्रूर है, इसकी पीड़ा वही ‘असफल’ बच्चा समझ सकता है, जिसकी तुलना ‘सफल’ बच्चों के साथ की जाती है। स्कूल, शिक्षक, मां-बाप, कोचिंग संस्थान- सब इस साजिश में शामिल हैं। इसी प्रतिस्पर्धा की भावना को लेकर बच्चा जीवन के किसी क्षेत्र में भी जाएगा तो लगातार अपना और दूसरे लोगों का जीवन दूभर बना देगा। सफलता की उपासना करेगा, असफलता से कुंठित होगा और अपने बच्चों को भी आखिरकार इसी दुश्चक्र में डाल देगा। कितने मां-बाप बच्चे में भ्रष्टाचार की नींव अच्छे अंकों के नाम पर डालते हैं! बच्चे के अवचेतन में यह बात बैठ जाती है कि कुछ करने के लिए अलग से कोई इनाम मिलना जरूरी है। यही तो रिश्वत है! वही बच्चा बड़ा होकर सरकार में जब नौकरी बजाता है तो यही उम्मीद आम जनता से करता है- ‘कुछ करेंगे, पर ऊपर से कुछ मिल जाए तो काम जल्दी होगा!’

‘अंकों की पूजा’ इंसानियत के मूल्यों के भी विपरीत है। कम नंबर पाने वाले बच्चे इंसान के तौर पर बहुत अधिक अच्छे हो सकते हैं, जबकि किसी भी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के जरिए आगे निकलने वाला बहुत ही क्रूर, असहिष्णु और असंवेदनशील हो सकता है। बच्चे में ये बातें शुरुआत में खुल कर नहीं आतीं, पर इसके बीज मां-बाप और शिक्षक डाल देते हैं। जो असफल है, वह किस चीज में असफल है? पैसे और शोहरत कमाने में ही न? पर वह अच्छा इंसान तो हो सकता है? अच्छे इंसान से ज्यादा और किसकी जरूरत है समाज को?

बच्चा स्वस्थ है, खेल रहा है, हंस रहा है, जीवित है! और क्या चाहिए! अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए बचपन के कलेजे पर चढ़ कर पत्थर क्यों कूट रहे हैं हम! कोशिश हम यह करें कि बच्चा अपनी छिपी हुई प्रतिभा को ढूंढ़ निकाले! इम्तिहान में बढ़िया अंक इस स्वाभाविक रुचि और प्रेम के सह-उत्पाद होंगे। इस असामान्य समाज के मूल्यों पर बच्चा जितने सवाल उठाएगा, जितना इनसे दूर रहेगा, उतना ही खुश, स्वस्थ और सामान्य होगा। जो स्मृति में जितना ज्यादा ठूंसने की क्षमता रखे, वह उतना ज्यादा प्रज्ञावान और बुद्धिमान है। यह सोच अपने आप में ही मूढ़ और कुंठा पैदा करने वाली है। बच्चे ने अच्छा किया, हल्के में लें। नहीं किया, तो कोई आसमान नहीं गिर गया! इस संसार के सबसे सृजनशील, प्यारे, प्रतिभाशाली, प्रज्ञावान लोग वही हुए जो स्कूल तक नहीं गए! ऐसे लोग हर क्षेत्र में मिलेंगे। कुछ तो बहुत ही बड़े काम कर गए और कई लोग भले ही गुमनाम रह गए, पर बहुत खुश हैं, समझदारी और संतुलन के साथ जीवन बिता रहे हैं।

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