ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: स्वानुशासन की राह पर

वक्त ने हमें सुनहरा मौका दिया है सुधरने का, तो अपना जीवन संपादित किया जाए, ताकि अच्छे परिणाम जारी रहें। सुधार का यह अवसर दरअसल स्वानुशासन की तरफ खुली खिड़की है, जहां से बदली हुई प्रकृति की स्वास्थ्यवर्धक रोशनी आ रही है। कुदरत ने मानव जीवन में अपने परिवार सहित फिर से प्रभावी प्रवेश किया है। वे हमें खबरदार कर रही हैं कि इंसान ने कुदरत को मात्र एक वस्तु बना डाला था, असली मायनों में तो वही हमारी जीवनदायिनी है।

Author Published on: June 3, 2020 5:10 AM
स्वानुशासन में रहकर प्रकृति से जुड़कर अपना सुधार करने का अवसर है।

संतोष उत्सुक
आम जनता को अनुशासन में रखना शासक और प्रशासकों की जिम्मेदारी होती है। इस संबंध में कानून उनके बहुत काम आता है। लेकिन कानून और व्यवस्था के निष्पादन में निरंतर लापरवाही के कारण अनुशासन बिगड़ता रहा है और शायद यही वजह है कि हमारे समाज में बहुत लोग हैं, जिन्हें नियम और अनुशासन पसंद नहीं आते। ऐसे लोग मनमाने तरीके से जीते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं। व्यवस्था बिगाड़ने का ज्यादा श्रेय हमारे कुछ स्वप्रचारित राजनीतिकों और अधिकारियों को जाता है जो खुद अनुशासन तोड़ते हैं और आम जनता से उम्मीद करते हैं कि वे स्वानुशासन में रहें। कुदरत का नुकसान करने में भी आमतौर पर यह लोग सबसे आगे रहे हैं। आने वाली पीढ़ियां अगर गलत आदतों में ढलती गईं, तो यह हैरानी की बात नहीं है।

हम विदेश जाकर घूम आते हैं और वहां के उम्दा अनुशासन की प्रशंसा करते नहीं अघाते, लेकिन स्वच्छता पर करोड़ों खर्च होने के बावजूद लुप्त हुए स्वानुशासन के कारण ही अनगिनत जगहों को हमने कूड़ा-घर बना दिया। कुदरत के जंगल, जल और जमीन का मनमाना प्रयोग कर तहस-नहस करना जारी है। आधुनिक जीवन में स्वार्थ और लिप्सा की सक्रिय भूमिका रही, तभी भ्रष्टाचार भी खूब जलवागर रहा। विडंबना यह है कि व्यापक संकट के दौर में भी बहुत सारे लोग अपना स्वार्थ नहीं छोड़ते।

विश्व स्तर पर प्रकृति का संतुलन बिगड़ने के कारण पिछले कई महीनों से महामारी ने विकट समय ला दिया है। शासन और प्रशासन दोनों दिन-रात प्रयास कर रहे हैं कि बचाव के लिए आवश्यक अनुशासन लागू रहे और जनता खुद ही अपने को अनुशासन में रखे। वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि वे शीघ्र इलाज का रास्ता निकाल सकें। डर के माहौल के बीच पैदा हुई स्थिति ने इंसान को मजबूरन घर में बंद कर दिया है। इस बंद के बीच मजबूरीवश वह अपने काम, खाने-पीने, व्यायाम और मनोरंजन की आदतें संपादित कर रहा है।

दरअसल, वह आपाधापी के जीवन से स्वानुशासन की तरफ जा रहा है। उसे पता लग रहा है कि वास्तव में उसे वाहन की कितनी जरूरत है! अगर वह कुछ देर रोज पैदल चले तो उसका व्यायाम भी हो जाएगा और पेट्रोल बचेगा और पर्यावरण को सुधारने में उसका योगदान भी हो जाएगा। संयमित जीवन उसे मितव्ययी भी बना रहा है।

पूर्णबंदी खत्म होने के बाद कौन-कौन से नए व्यवसाय हो सकते हैं, इस पर भी इंसान के दिमाग ने काम करना शुरू किया है। वह मान कर चल रहा है कि महामारी जब चली जाएगी तो व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक दुनिया में जो बदलाव आने वाले हैं, उस बारे में उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि दूसरे क्या कर रहे हैं। उसे केवल यह सोचना चाहिए कि वह अपना कितना योगदान दे सकता है।

हम सभी स्वानुशासन को अपनाएं, अपनी जरूरतें कम रखें, पूरा परिवार एक दूसरे को प्रेरित करे, ताकि सामूहिकता को प्रोत्साहन मिले और जीवन सुधरे। इस दौरान समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो स्वार्थ के नाम पर महामारी से ग्रस्त या ठीक हो चुके लोगों से नफरत भरा व्यवहार कर रहे हैं। यहां उन्हें समझना चाहिए कि ऐसी स्थिति में उनके साथ अच्छा व्यवहार न किया जाए तो उन्हें कैसा लगेगा! क्या हम बेताबी से इंतजार कर रहें हैं कि सब कुछ जल्दी सामान्य हो जाए। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि हमें यह गौर करना होगा कि गलती हमसे कहां हुई!

अब जब वक्त ने हमें सुनहरा मौका दिया है सुधरने का, तो अपना जीवन संपादित किया जाए, ताकि अच्छे परिणाम जारी रहें। सुधार का यह अवसर दरअसल स्वानुशासन की तरफ खुली खिड़की है, जहां से बदली हुई प्रकृति की स्वास्थ्यवर्धक रोशनी आ रही है। कुदरत ने मानव जीवन में अपने परिवार सहित फिर से प्रभावी प्रवेश किया है। वे हमें खबरदार कर रही हैं कि इंसान ने कुदरत को मात्र एक वस्तु बना डाला था, असली मायनों में तो वही हमारी जीवनदायिनी है।

बदला हुआ समय उनकी बात करने का है जो सही रास्तों पर चलना चाहते हैं, वे बच्चों को भरपूर समय, बुजुर्गों की देखभाल, नानी-दादी की कहानियां और पति-पत्नी की आपसी बातचीत को जिंदगी में शामिल करेंगे। दिल की बात सुन कर अपने मित्रों परिचितों को पत्र लिखना शुरू करेंगे ताकि सकुचाई हुई आत्मीयता अपने पंख फैला दे। हमारे शौक नाच, गाना, पढ़ना, लिखना, कलाकृतियां बनाना, पेंटिंग, बागवानी, घर के भीतर पुराने खेल बरकरार रहें और दिनचर्या का आवश्यक हिस्सा बन जाए।

उनकी इस कोशिश से सामूहिकता लौट आएगी। कुदरत तेजी से इंसान के साथ खुद संतुलन कायम करना चाहती है, उसका स्वागत कर अपनाना जरूरी होगा। निस्संदेह मकानों के बीच बसे घरों में स्वानुशासन उग आया है। लेकिन क्या सार्वजनिक जीवन में भी ऐसा होने जा रहा है? दरअसल, जो व्यक्ति एक सांचा अपना लेते हैं, उन्हें कभी ज्यादा दिक्कत नहीं होती। कहा भी गया है कि दुख सब को जोड़ता है, परेशानी ही इंसान को आदमी बना देती है। अभी भी देर नहीं हुई है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: बदलाव की खुशबू
2 दुनिया मेरे आगे: नए दौर का पाठ
3 दुनिया मेरे आगेः बदलती दुनिया में बच्चे