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दुनिया मेरे आगे: समय का चक्र

अस्सी साल पहले पैंतीस करोड़ लोगों के लिए जिस ग्राम्य स्वराज की कल्पना की गई थी, उसे अब एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों के लिए मुफीद नुस्खा मान लिया गया। इन हितैषियों की मेहरबानी से वे अपने गांव पहुंचे तो कई जगहों पर गांव की सीमा पर ही ग्रामीणों ने उनका रास्ता रोक लिया। महानगरों में की गई नकद कमाई से आ गए आत्मविश्वास की चमक की जगह गांव के सामंती ऐंठ में अकड़े भूमिधर उनके चेहरों पर हीनताबोध देखना चाहते थे।

corona, gram swarjaस्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने से शहरों की ओर पलायन रुकेगा।

जन्मजात विपन्नता से पीढ़ी-दर-पीढ़ी लड़ते जाना ही उनकी नियति है। आर्थिक रूप से पिछड़े उनके गांवों से बहुत दूर जिन महानगरों में उनके खून-पसीने से कारखानों की मशीनों को ऊर्जा मिलती है, वहां उन्हें इंसान कम और मशीनी पुर्जे अधिक समझा जाता है। कहीं-कहीं तो वे परजीवी कीटाणु समझे जाते हैं, जो स्थानीय ‘मानुस’ का हक छीनने के लिए आते हैं।

उधर हरित क्रांति से समृद्ध प्रदेशों की उर्वर भूमि उन्हीं के पसीने से सिंचित होकर लहलहाती है। उस सरजमीन पर बिखरे हुए सोने को बटोरने के लिए लाई गई ‘हार्वेस्टर कम्बाइन’ जैसी विशालकाय मशीनों का काम भी सुदूर गांवों से आए इन मेहनतकशों के घट्टे पड़े हुए हाथों के स्पर्श के बिना पूरा नहीं होता। ये नामुराद एक ऐसी अनचाही मजबूरी हैं, जिनके बिना देश का आर्थिक चक्का चल नहीं सकता, लेकिन जिन्हें सामाजिक बराबरी देने में किसी की रुचि नहीं है। मौजूदा त्रासदी ने भी इन्हीं को बेरहमी से लपेटा। जो पूर्णबंदी महामारी का प्रसार तोड़ने के लिए लगाया गया, वही कहर बन कर उनकी झुग्गियों पर टूट पड़ा।

जिन दड़बेनुमा कमरों में छह-छह इंसान रहते हों और सोने के लिए बिस्तर भी दो पालियों में बंट कर नसीब हो पाती हो, उनमें आपस में दूरी की अपेक्षा बेमानी थी। इस सच्चाई से मुंह फेर कर झुग्गी-झोपड़ियों को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करके आशा की गई कि तपती गरमी में इंसान कहे जाने वाले ये लोग अपने उन घरों में घुसे रहेंगे और खुली हवा में सांस लेने के लिए सड़कों पर आकर बैठने की इच्छा का गला घोंट लेंगे।

लेकिन जिसे उनका घर कहा जाता है, उसका भी किराया देना होता है, दड़बों में बंद रहने पर भी पेट की भूख मिटानी पड़ती है। जब स्पष्ट हो गया कि काम-धंधे बंद पड़े रहे तो महमारी मारे, न मारे, पेट की ज्वाला उन्हें जरूर मार डालेगी और मौत भी नसीब होगी तो किराया न दे पाने के जुर्म में फुटपाथ पर फेंके जाकर खुले आसमान के तले। तब एक इच्छा बुझते हुए दीए की लौ की तरह भड़क उठी। मरना ही है तो क्यों न बाप-दादाओं की राख में मिल कर धूल भरी हवाओं में खो जाएं।

फिर क्या था, पैदल, पुरानी साइकिल, हाथगाड़ी और ठेले पर आरूढ़ काफिले गांवों की तरफ चल पड़े। डेढ़-दो हजार किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़े इन दीवानों के पास पाथेय के नाम पर भूजा भी इतना न था कि कुछ दिन साथ दे सके। तब महानगरों में समृद्धि की दीवारों के पीछे छिप कर जिन्होंने तय किया था कि झुग्गियों से आने वाली काम वालियों को अपनी ‘सैनिटाइज्ड’ दुनिया के पास नहीं फटकने देंगे, अचानक द्रवित हो गए।

फटी-पुरानी चप्पलों में कोसों की दूरी तय करते इन अभागों के पैरों में पड़े छालों की तस्वीरें सोशल मीडिया को रुलाने लगीं। ऐसे भी कुछ थे जो बाहरी मानुस को अपने राज्य से बाहर भगाने का मौका सूंघ कर श्रमिक स्पेशल रेलगाड़ियों की मांग उठाने में जुट गए। एकाध खुदाई खिदमतगारों ने फिल्मी दुनिया की गाढ़ी कमाई खुले हाथ से लुटाई, लेकिन उन्हें दो वक्त की रोटी और सिर पर छांव देने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें वापस उनके गांवों में भेजने के लिए, बिना पूछे कि गांव जाकर वे खाएंगे क्या!

अस्सी साल पहले पैंतीस करोड़ लोगों के लिए जिस ग्राम्य स्वराज की कल्पना की गई थी, उसे अब एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों के लिए मुफीद नुस्खा मान लिया गया। इन हितैषियों की मेहरबानी से वे अपने गांव पहुंचे तो कई जगहों पर गांव की सीमा पर ही ग्रामीणों ने उनका रास्ता रोक लिया। महानगरों में की गई नकद कमाई से आ गए आत्मविश्वास की चमक की जगह गांव के सामंती ऐंठ में अकड़े भूमिधर उनके चेहरों पर हीनताबोध देखना चाहते थे।

पर महानगरों में रह कर वे हीनताबोध भूल चुके थे। महानगरों की गुमनामी से उपजी समानता के अभ्यस्त हो जाने के बाद ये अब भूमिधरों के किसी काम के नहीं रह गए थे। उन्हें गांव से बाहर रोक देने का सशक्त बहाना था कि महानगरों से लौटे ये ‘प्रवासी’ महानगरों की महामारी उनके गांव तक ले आएंगे। उधर दो-दो बीघे की खेती पर निर्भर बन्धु-बांधवों को भय था कि वापस आने वाले ये निरुपाय अब मौरूसी जमीन के छोटे-से टुकड़े में भी अपना हक मांगेंगे। यह भय निर्मूल नहीं था। दो-चार दिनों में ही लाठियां चलने की नौबत आ गई।

मगर वाह रे समय का चक्र! महानगरों में पूर्णबंदी खुलते ही उनकी सेवा के अभ्यस्त हो चुके ठिकाने उन्हें बेचैनी से याद कर रहे हैं। उद्योगपति श्रमिक स्पेशल रेलगाड़ियों को महानगरों की तरफ वापस चलाने की मांग उठा रहे हैं। कोई अग्रिम वेतन देकर और कोई हवाई जहाज भेज कर उन्हें वापस बुलाने की पेशकश कर रहा है। उधर गांवों में कुल-गोत्र के झूठे नशे में चूर लोगों से अपमानित होकर वे अब सोच रहे हैं कि उनके बिना जहां उद्योग और हरित क्रांति के चक्के जाम हैं, क्या फिर से वे वहीं लौट न चलें!

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