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दुनिया मेरे आगेः ओ री गौरैया

तब हमारे दिल्ली वाले मकान में मात्र दो कमरे, रसोई, गुसलखाना, शौचालय और एक बरामदा था। बाहर अमरूद के नीचे आंगन में खाना खाते तो एक चिड़ा और कई चिड़िया नियम से हमारे इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे।

birds, ecosystem, climateगुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार का जंतु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग गौरैया को लेकर विशेष शोध कार्य कर रहा है।

तब हमारे दिल्ली वाले मकान में मात्र दो कमरे, रसोई, गुसलखाना, शौचालय और एक बरामदा था। बाहर अमरूद के नीचे आंगन में खाना खाते तो एक चिड़ा और कई चिड़िया नियम से हमारे इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे। हमें खाना देने के लिए तरह-तरह से आकर्षित करते। इसके लिए उनमें कभी झगड़ा या यों कहें कि कुछ प्रतियोगिता जैसी होती। अक्सर चिड़ा भारी पड़ता। हम उन्हें रोटी के टुकड़े तोड़ कर देते, जिसे लेकर वे फुर्र से उड़ जाते। वे हमसे इतने हिले-मिले थे कि फुदकते-फुदकते कभी-कभी वे हमारी थाली की कोर पर ही आ बैठते।

वे अक्सर आंगन में बीट कर देते। हमें कभी बुरा नहीं लगता। बल्कि मेरी बहन तो उन्हें रोटी-दाना चुगाने के चक्कर में अक्सर इतनी मगन हो जाती कि खुद ही खाना भूल जाती। वह गाना गुनगुनाती और मस्त रहती- ‘आ मेरी गौरैया आ/ चीं-चीं फुदक चिरैया आ/ मैं भी खाऊं, तू भी खा/ चोंच में दाना लेती जा/ हंसी-हंसी कुछ कहती जा…!’ मैं भी रोज सुबह मिट्टी के बड़े से कटोरे में भर कर उनके लिए साफ पानी रख आता।
जब अम्मा चावल बीनतीं, पछोरती या गेहूं साफ करतीं, तब भी गौरैया न मालूम कहां से बिन बुलाए फुर्र से पहुंच जाती। अम्मा अक्सर उन्हें दाना फेंकती और गुनगुनाती रहती- ‘राम जी की चिरिया, रामजी का खेत। खाय ले चिरिया, भर-भर पेट…!’ कभी गुस्सा भी हो जातीं तो कभी बुआ को छेड़ देतीं- ‘ननद रानी! इ चिरैया तुम्हरे ससुराल से आई है!’

यह रिश्ता सिर्फ गौरैया के साथ था और किसी चिड़िया के साथ नहीं। वही एक ऐसी चिरैया थी, जो हमें अपनी-सी लगती थी… जिसे घर में आने-जाने की तब पूरी आजादी थी। उसने हमारा कभी नुकसान नहीं किया। 2012 में पंद्रह अगस्त की पूर्व संध्या पर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने गौरैया को राज्य पक्षी का दर्जा दे दिया था। 2010 में बीस मार्च के दिन को ‘विश्व गौरैया दिवस’ घोषित कर दिया गया था। लेकिन अब गांव जाकर ही मेरी बेटी इस आनंद को हासिल कर पाती है। हालांकि अब हमारा दिल्ली का घर पहले से ज्यादा बड़ा है, लेकिन अब इसमें गौरैया के लिए कोई जगह नहीं है। एक दिन मेरी बेटी पूछ ही बैठी- ‘क्यों पापा! अब क्यों नहीं आती गौरैया हमारे घर? गांव में तो आती है!’ मैंने कहा- ‘शहर में उसका दम घुटता है न, इसीलिए!’ एक बात तो सच है कि गौरैया बहुत नाजुक चिरैया होती है। अब हमारे घर में हरे पेड़-पौधे नहीं रहे।

बिजली-टेलीफोन के तारों के फैले जाल में फंस कर घायल होने से उसे डर लगता है। हमारे मोबाइल फोन और इसके लिए लगे ऊंचे-ऊंचे टावरों से कुछ ऐसी तरंगे निकलती हैं, जो हमारे साथ गौरैया को भी नुकसान पहुंचाती हैं; बच्चे पैदा करने की उनकी क्षमता घटाती है; उन्हें बीमार बनाती है। अब वह बिजली के मीटर-बक्से की खाली जगह में भी घोंसला नहीं बनाती। पहले वह कहीं भी थोड़ी ऊंची जगह देख कर घोंसला बना लेती थी। अब शायद डरती है कि कोई उजाड़ न दे। दिल्ली में इतने बड़े क्षेत्रफल में पेड़ के नाम पर अगर कुछ बचा है तो बस कीकर! अब न खाने को कीट-पतंगे, फल-फूल उतनी संख्या में है और न हवा उतनी माकूल है कि पक्षी वहां रहना चाहे। पानी पीने को कोई देता नहीं। ताल-तलैया बचे नहीं। यमुना का पानी भी ऐसा नहीं कि नन्ही गौरैया पीना चाहें।

मैं बिटिया से कैसे कहता कि अब पानी तो बोतलों में बंद होकर बिकने चला गया है। खैर, उसे यह जान कर थोड़ी तसल्ली हुई कि कोई है, जो चौदह से सोलह सेंटीमीटर लंबी इस घरेलू चिरैया को बचाने की कोशिश कर रहा है। मध्य यूरोप, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के अलावा भारत जैसे देशों में कभी बहुतायत में पाई जाने वाली इस गौरैया की संख्या में साठ से अस्सी फीसद की कमी आई है। गौरैया अब विलुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में दर्ज है। इसके अस्तित्व पर मंडराते खतरे को देखते हुए ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसाइटी आॅफ प्रोटेक्शन आॅफ बर्सड’ ने इसे लाल सूची में दर्ज किया है।

मशहूर पर्यावरणविद् दिलावर की पहल पर अब दिल्लंी में ‘राइज फॉर द स्पैरोज’ यानी ‘गौरैया के लिए जागो’ अभियान शुरू हुआ है। अब जल्दी ही इसके बारे में दिल्ली के बच्चे अपनी स्कूल की किताबों में पढ़ सकेंगे। उत्तर प्रदेश शासन ने भी इस वर्ष गौरैया को लेकर जागरूकता की दृष्टि से अच्छी पहल की है। लेकिन गौरैया का जीवन घोंसले बनाने से नहीं, बल्कि उसके लिए शुरू पानी, कृत्रिम रसायनमुक्त फसल मुहैया कराने से संभव होगा। शुरुआती दस से पंद्रह दिन गौरैया के बच्चे मां द्वारा लाए कीड़ों पर ही जिंदा रहते हैं। लेकिन घरों के गमलों में भी कीटनाशकों के प्रयोग के कारण मां गौरैया को बच्चों के लिए कीड़े ढूंढ़ने की मुश्किल रहती है। जब भोजन या पानी नहीं, हमारे घर के रौशनदान में उनके लिए जगह नहीं, तो गौरैया हमारे पास क्यों आए!

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