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दुनिया मेरे आगेः शोर बनाम आस्था

दिनोंदिन लगातार बढ़ते जा रहे ध्वनि प्रदूषण से सभी परेशान हैं। अखबारों और टेलीविजन से कहीं ज्यादा सोशल मीडिया पर लोग अपने विचार जाहिर करते हैं।

Author June 16, 2017 2:36 AM

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

दिनोंदिन लगातार बढ़ते जा रहे ध्वनि प्रदूषण से सभी परेशान हैं। अखबारों और टेलीविजन से कहीं ज्यादा सोशल मीडिया पर लोग अपने विचार जाहिर करते हैं। इसलिए ये माध्यम ही अधिक प्रभावी बनते जा रहे हैं। किसी धार्मिक कार्यक्रम या पद्धति के जरिए होने वाले ध्वनि प्रदूषण को लेकर जब कोई मशहूर हस्ती टिप्पणी कर देती है तो वह बहस का मुद्दा बन जाता है, लेकिन अपनी ओर से शायद ही कभी कोई इस पर गौर करने की जरूरत समझता है। सवाल हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई का नहीं है। न ही मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारों और चर्च का है। इन सभी धर्मस्थलों की अपनी अहमियत है। मगर इनमें या किसी धार्मिक कार्यक्रम में की जाने वाली प्रार्थना या भक्ति गीतों से लाउडस्पीकर के शोर के जरिए आसपास के लोगों को परेशान करने, उनकी नींद उड़ाने का भला क्या औचित्य है!

सवाल किया जा सकता है कि पूजा-अर्चना तो आदिकाल से की जाती रही है। जब लाउडस्पीकर नहीं थे, तब भी सब कुछ होता ही था। आज विज्ञान के कारण ये लाउडस्पीकर से लेकर डीजे जैसे तेज शोर करने वाले यंत्र उपलब्ध हैं। इनका सभी धर्मों के कार्यक्रमों में मनमाना इस्तेमाल होता है। अक्सर रात भर चलने वाले जागरण जैसे कार्यक्रमों के चलते कितने लोगों की नींद या कितने बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है, इस पर न किसी को सोचना जरूरी लगता है, न किसी को रोक-टोक लगाने के लिए पहल करने की जरूरत महसूस होती है। आसपास के लोग धर्म के नाम पर बढ़ते जा रहे ध्वनि प्रदूषण को चुपचाप सहन करने के लिए अभिशप्त हैं। अगर वे शिकायत करते भी हैं तो या तो उन्हें धर्म विरोधी करार दिया जाता है या फिर उनकी उपेक्षा की जाती है। प्रशासन भी उन्हें धैर्य रखने और सहन करने की सीख देता है। आखिर हम जबर्दस्ती उन लोगों तक अपनी आवाज और अपना शोर क्यों पहुंचाना चाहते हैं जो उसे सुनना नहीं चाहते? यह तो अपने चंद पलों के सुख के लिए दूसरों के निजी जीवन में दखलंदाजी हुई! यह किस तरह की आस्था का निर्वाह है?

बढ़ता ध्वनि प्रदूषण सिर्फ धर्म-स्थलों तक सीमित नहीं है। जुलूस, राजनीतिक प्रदर्शन, शादी या फिर किसी भी पूजा के लिए सजधज कर मंदिर जाने वाले चार या छह लोगों के साथ तेज ध्वनि में बजाते पंद्रह या बीस बैंड वालों का समूह होना भी आज शान का मामला है। धार्मिक या राजनीतिक जुलूस और शादी में आमतौर पर दस से पंद्रह फुट लंबी ट्रॉली चलती है। उसमें कभी छह तो कभी आठ बड़े-बड़े साउंड बॉक्स लगे होते हैं जो बैंड की धुन या साथ चलते हुए ढोलक या दूसरे वाद्ययंत्र बजाने वालों की आवाज को कई गुना तेज कर प्रदूषण बढ़ाते हैं। यातायात को बाधित करना तो जैसे एक अनिवार्य पहलू हो गया है। शादी है, खुशी का वातावरण है, ठीक है। लेकिन आपकी खुशी दूसरों के लिए परेशानी का कारण क्यों हो?
सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि रात में दस बजे से लेकर सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर का उपयोग वर्जित है। लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं होता। करीब बीस साल पहले केरल के एक वृद्ध और गरीब व्यक्ति ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, क्योंकि वह एक धर्मस्थल में बजने वाली घंटियों के कारण परेशान था। उसने सुप्रीम कोर्ट में जीत हासिल की, उसके बाद आदेश आया था। तब से अब तक ध्वनि प्रदूषण करीब तीस गुना बढ़ गया। कोर्ट के आदेश का पालन राज्य सरकारों को ही करवाना है, लेकिन उन्हें यह काम जरूरी नहीं लगता।
दरअसल, मान लिया जाता है कि धार्मिक आयोजन में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल एक संवेदनशील मामला है और इसकी मनाही पर तीखी प्रतिक्रिया उभर सकती है। हमारा कोई भी आयोजन आखिर क्यों बिना शोर-शराबे के नहीं होता? फिर भले ही वह धार्मिक हो, राजनीतिक, सामाजिक या फिर पारिवारिक। ऐसा लगता है जैसे शोर मचाने की कोई प्रतिस्पर्धा हो रही हो।
कभी कबीरदास ने धार्मिक दिखावे की गतिविधियों पर तीखा सवाल उठाया था। लेकिन आज के लोग इतने लापरवाह और असंवेदनशील हैं कि उन्हें न तो अपने कम सुन पाने के रोग की परवाह है, न ही इस बात की कि अगर शोर का प्रदूषण इसी तरह बढ़ता रहा तो आगामी नस्ल के लोग शायद सुनने की ताकत से लाचार पैदा हों!

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