ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः हिंदी की जगह

हाल ही में एक मित्र की शादी का आमंत्रण पत्र मिला। मेरे सहित कई मित्र नियत दिन विवाह स्थल पर पहुंचे तो उनके साथ कुछ अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला भी चला। कुछ मित्रों से मैं काफी सालों बाद मिली थी।

Author June 9, 2017 3:04 AM
सांकेतिक फोटो

प्रेरणा मालवीया

हाल ही में एक मित्र की शादी का आमंत्रण पत्र मिला। मेरे सहित कई मित्र नियत दिन विवाह स्थल पर पहुंचे तो उनके साथ कुछ अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला भी चला। कुछ मित्रों से मैं काफी सालों बाद मिली थी। मेरे काम से उनका कोई परिचय नहीं था तो किसी ने पूछा। मैंने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी संस्था के काम और प्रयोग के बारे में भी बताना शुरू किया तो एक साथी को इस बात पर हैरानी हुई कि मैं शिक्षकों को प्रशिक्षित भी करती हूं। मेरा विषय हिंदी है और मैं शिक्षकों से बातचीत करती हूं कि इस विषय को कैसे बेहतर पढ़ाया जाए। उनसे मिल कर नए तरीके भी निकाले जाते हैं। शायद इस मसले पर ज्यादा काम नहीं हुआ है।

अपने पिछले दस वर्षों के अनुभवों के आधार पर मैं कुछ बातें बता रही थी। मगर इस बीच एक सवाल यह आया कि हमारा जन्म हिंदी प्रदेश में ही हुआ है तो इस कारण यह भाषा तो हमें पहले से ही आती है। इसमें नया क्या है और इस पर अलग से मेहनत करने का क्या फायदा है! अंग्रेजी का जमाना है। हिंदी नहीं आए तो चलेगा, मगर अंग्रेजी नहीं आए तो कितनी मुश्किल होती है और ढंग की नौकरी भी नहीं मिलती! इसके बाद तेज हंसी के ठहाके ने आसपास खड़े लोगों का ध्यान हमारी ओर खींचा। व्यावहारिक रूप से उस साथी की बात सही थी। लेकिन उनकी ही बात के सिरे से कहूं तो यह कि जिस तरह अंग्रेजी एक भाषा है वैसे ही किसी भी भाषा और खासतौर पर अपनी भाषा को इतने हेय नजरिए से देखने की क्या जरूरत है!

यह घटना मेरे जेहन में कई दिनों तक ताजा रही और मुझे बैचेन करती रही। हिंदी को लेकर आम जनमानस के बीच यह धारणा आखिर कैसे बनी और फैल रही है? अफसोस की बात यह है कि कई बार इस तरह की बातें शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले साथियों की तरफ से भी आती हैं। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ होगा जब इस भाषा को लेकर मुझे ऐसी बातें सुनने को मिली हों। सवाल है कि हम किसी भी भाषा को छोटी या बड़ी और कम या ज्यादा महत्त्व की भाषा के तौर पर क्यों देखते हैं! क्या इस धारणा और सोच के साथ समाज और व्यवस्था में किसी भाषा के सामाजिक वर्ग के तार भी जुड़े हैं। मौजूदा समय में सत्ता की भाषा क्या है और वह कैसे सत्ता की भाषा बन गई या बन जाती है, यह शायद एक अलग लंबी बहस का मुद्दा है। दूसरी ओर बड़ी बात यह लगती है कि अगर हिंदी इतनी ही आसान है तो फिर क्यों कई बच्चे लिखने-पढ़ने के कौशल से ही जूझ रहे होते हैं, वह भी स्कूली यात्रा में कई साल गुजारने के बाद भी? बल्कि यह कई बार बच्चों के स्कूल छोड़ने का कारण भी बन जाता है। क्या हमें इसके कारणों की बारीकी से पड़ताल नहीं करनी चाहिए? क्या यह विमर्श का विषय नहीं होना चाहिए?

कम से कम हिंदी भाषी इलाकों और सरकारी स्कूलों की बात करें तो जब हिंदी नहीं आएगी तो अन्य विषयों में क्या होगा। मसलन, गणित, सामाजिक विज्ञान जैसे अन्य विषय भी तो हिंदी में ही पढ़ाए जाते हैं। हिंदी ही अन्य विषयों को सीखने में आधार का काम करती है। क्या यह कोई ऐसी बात है, जिसकी अनदेखी की जानी चाहिए? बच्चे क्यों खास सवाल देने पर पूछते हैं कि इसमें करना क्या है? जोड़ना है या घटाना है? यह छोटा-सा उदाहरण शायद बहुत कुछ समझने के लिए काफी है। वास्तविक मुश्किल भाषा की है या विषय की और इस पर किस तरह काम किया जाए, हमें यह समझने की जरूरत है।

यह बात स्कूलों में तो और भी बहुत साफ तौर पर दिखाई देती है। हिंदी के शिक्षक और विज्ञान या गणित के शिक्षक के ओहदे में फर्क से हम सभी परिचित हैं। व्यवहार में सच यह है कि जो हिंदी के शिक्षक हैं, उन्हें गणित और विज्ञान के शिक्षक के मुकाबले कम सम्मान की निगाह से देखा जाता है। जबकि हर विषय का अपना महत्त्व है। हर विषय के अपने कौशल होते हैं जो इनकी पढ़ाई के जरिए बच्चों में विकसित होते हैं। फिर भाषा में यह ‘भेदभाव’ का मामला कहां से आ गया? क्या इसे बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव का नतीजा माना जाए? लेकिन क्या पुराने वक्त में संस्कृत और बाकी भाषाओं को लेकर यही भाव नहीं रहे हैं? इसकी गिरफ्त में हम सभी लोग बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। एक पालक या शिक्षक के रूप में हम बच्चों पर कई तरह के दबाव बनाने की कोशिश करते रहते हैं। इस धारणा और विचार का असर बच्चों पर भी दिखता है। लेकिन इसके जो नतीजे होते हैं, उनसे हम अनभिज्ञ होते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App