दुनिया नेरे आगेः अंतहीन निगरानी - Dunia mere Aage Opinion on endless surveillance - Jansatta
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दुनिया नेरे आगेः अंतहीन निगरानी

सोलहवीं शताब्दी के एक विचारक फ्रांसिस बेकन ने कहा था- ‘नॉलेज इटसेल्फ इज पॉवर’।

Author June 10, 2017 2:25 AM
सांकेतिक फोटो

ऋचा डंग

सोलहवीं शताब्दी के एक विचारक फ्रांसिस बेकन ने कहा था- ‘नॉलेज इटसेल्फ इज पॉवर’। यानी ज्ञान अपने आप में एक ताकत है। इसके जरिए ‘ज्ञान’ और ‘शक्ति’ के विषय पर गहन चर्चा की जा सकती है। लेकिन यहां मेरा मकसद इस एक पंक्ति के मायने से निजी दायरे में बढ़ते हस्तक्षेप को समझने से है। यह दखल इंसानी नहीं, मशीनी है। लेकिन मशीनों से निगरानी का फैसला पूरी तरह इंसानी है। हर जगह मौजूद सीसीटीवी कैमरे घर से निकलते ही हम पर नजर रखने लगते हैं। हर गतिविधि पर नजर रखते इन कैमरों में हर पल कैद होते वीडियो के उस ओर हमें कौन देख रहा है, आमतौर पर हम इससे अनभिज्ञ रहते हैं। पहली नजर में इस व्यवस्था में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इसका घोषित मकसद सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करना है, जिसका फायदा आम नागरिकों को ही होना है। लेकिन निगरानी सुरक्षा के मकसद से करने और सबके लिए डर का माहौल बनाने में अंतर है। पोस्टरों पर ऐसी चेतावनी अब कहीं भी दिख जाती है- ‘सावधान! आप सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में हैं।’ हमें यह सोचना होगा कि यह चेतावनी पढ़ने वाले को महफूज और सुरक्षित महसूस करवाने के लिए है या डरा कर उस पर नियंत्रण पाने के लिए है। किसी पर भी यह निगरानी ऐसे तिलस्मी जीव की है, जिसके विषय में हम कुछ नहीं जानते।

अंग्रेजी के मशहूर लेखक जॉर्ज आॅरवेल के उपन्यास में एक ऐसा ही पात्र ‘बिग ब्रदर’ है, जो निगरानी से ही सब कुछ का संचालन करता है। ‘बिग ब्रदर’ एक ऐसा ही अदृश्य जीव है, जिसका अस्तित्व असल है या सामान्य नागरिक के मानस में वह गढ़ा गया है, यह हम अपनी समझ से जान सकते हैं। सीसीटीवी के व्यापक प्रयोग का मुख्य कारण आसपास नजर रख कर सुरक्षा प्रदान करना है। इसमें कोई शक नहीं कि सुरक्षा सचमुच आज एक बड़ा मुद्दा है। यह एक विचारणीय बिंदु है कि सुरक्षा किसकी करनी है और किससे करनी है! सार्वजनिक जगहों पर सीसीटीवी होने से हममें से काफी लोग सुरक्षित महसूस करते हैं। इससे यह विश्वास बना रहता है कि कुछ गड़बड़ी हो जाने पर कैमरे में कैद घटनाओं के जरिए उसे अंजाम देने वालों को पकड़ा जा सकता है। असामाजिक तत्त्वों को कैमरे में रिकार्डेड वीडियो की मदद से खोजना थोड़ा आसान हो जाता है। ऐसे तमाम मामले सामने आते रहते हैं जिसमें सीसीटीवी कैमरे की वजह से कोई अपराधी पकड़ा जा सका। इस लिहाज से इसकी उपयोगिता पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन इसका इस्तेमाल कैसे और कहां हो, यह एक बड़ा सवाल है। कैमरा लगा देने भर से सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती तो चौबीसों घंटे कैमरे के पहरे में रहने वाले बैंक, एटीएम, टोल बूथ आदि जगहों पर होने वाली आपराधिक घटनाएं खत्म हो जातीं। लेकिन रोजाना खबरों की सुर्खियां बताती हैं कि ऐसा नहीं है। यह घटनाओं पर काबू पाने नहीं, उन पर निगरानी का जरिया है।

जिन जगहों पर नागरिक गढ़े जाते हैं, विश्वविद्यालय वैसी ही संस्थाएं हैं। सामाजिक बुनावट को समझने, उससे जूझने, उस पर सवाल करने का एक खुला दायरा देना विश्वविद्यालयों का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है। इसके विपरीत हर पल कैमरे की निगरानी एक ऐसे माहौल की रचना करती है, जिससे हममें ‘दूसरों’ या अपरिचित लोगों के प्रति डर और संदेह गहराता जाता है। यहां समझना थोड़ा मुश्किल है कि इन स्वतंत्र स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे का होना किस तरह विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे को मजबूती प्रदान करता है! यहां कैमरे दो वजहों से ही हो सकते हैं। शासन या प्रबंधन का विद्यार्थियों के प्रति गहरा अविश्वास या फिर खुद को प्रौद्योगिकी के आयामों से लैस दिखाने की कोशिश। उच्च शिक्षा के वे संस्थान जो नागरिक की रचना में अहम भूमिका निभाते हैं, वहां निगरानी की चेतावनी, कैमरों में चलती निरंतर रिकॉर्डिंग का डर कृत्रिम अनुशासन तो पैदा सकता है, लेकिन आदर्श और जिम्मेदार नागरिक नहीं बना सकता। वह केवल निगरानी में अनुशासित रहने वाले डिग्रीधारकों का निर्माण करता है।

जहां तक बेहतर तकनीक का सवाल है तो उसका परिचय देने के लिए विद्यार्थियों को तमाम सुविधाएं, जैसे इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी, अच्छे सॉफ्टवेयर आदि मुहैया करवाना एक बेहतर विकल्प है। कैमरों की मदद से होती निरंतर निगरानी, नजर रखने वाले और जिस पर नजर रखी जाती है, उनके बीच के संबंध का संतुलन बिगाड़ देती है। रिकॉर्डिंग के जरिए इकट्ठा अतिरिक्त ‘ज्ञान’ बड़े सामाजिक स्थानों के दायरों को नहीं, सीमित दायरे में ताकत का संतुलन बिगाड़ता है। उदाहरण के तौर पर, विद्यार्थियों की दिनचर्या, उनकी आदतें, आपसी संबंध जैसी तमाम निजी गतिविधियां कमरों में कैद कर प्रशासन इस ज्ञान को कभी भी अपना हथियार बना सकता है। ऐसे में एक संस्था के रूप में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता खंडित होती है। यह समझने की जरूरत है कि किस हद तक निगरानी हमारी सुरक्षा के लिए है और कब वह हमारे सोचने, विचार करने और निजी अधिकारों का हनन करने लगती है।

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