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दुनिया मेरे आगेः अधिकारों की चेतना

छत्तीसगढ़ गांवों का प्रदेश है। गांव का जन-जीवन आज भी अपनी लोक-अस्मिता के साथ धड़कता है। आधुनिकता ने कुछ दस्तक तो दे दी है, फिर भी गांवों में ‘ददरिया’ गाने वाले मिल जाते हैं।

Author May 12, 2017 3:41 AM
छत्तीसगढ़ गांवों का प्रदेश है।

गिरीश पंकज

छत्तीसगढ़ गांवों का प्रदेश है। गांव का जन-जीवन आज भी अपनी लोक-अस्मिता के साथ धड़कता है। आधुनिकता ने कुछ दस्तक तो दे दी है, फिर भी गांवों में ‘ददरिया’ गाने वाले मिल जाते हैं। ‘नाचा-गम्मत’ के कलाकारों की रंजक प्रस्तुतियां मनमोहक हैं। यह और बात है कि गांव की नई पीढ़ी को अब शहर आकर्षित करने लगे हैं। वे उच्च शिक्षा के लिए रायपुर, बिलासपुर और भिलाई-दुर्ग जैसे शहरों में रहना पसंद करते हैं। नतीजा यह होता है कि शहरी-जीवन उन्हें इतना रास आ जाता है कि फिर वे गांव में जाकर काम ही नहीं करना चाहते। न खेती-बाड़ी, न कोई लघु उद्योग। लेकिन इन सबसे अलहदा है गांव में स्त्री का मन। वह गांव में रमी रहती है और अपनी दिनचर्या में गांव की आबोहवा के साथ ही मगन रहती है। बेशक वह बहुत अधिक पढ़ी-लिखी नहीं है, लेकिन उसकी अंतस-चेतना पढ़े-लिखे लोगों से अधिक मुखरित है। इसका प्रमाण यह है कि गांवों में शराबबंदी के विरुद्ध जितने भी आंदोलन हो रहे हैं, वे सब महिलाओं के द्वारा ही संचालित होते हैं।

छत्तीसगढ़ में शराबखोरी एक बड़ी समस्या है। सर्वाधिक राजस्व शराब से प्राप्त होता है इसलिए सरकार खुद शराब बेचने पर आमादा है। अनेक गांव ऐसे मिल जाएंगे जहां विद्यालय नहीं होंगे, लेकिन मदिरालय जरूर होंगे। गांव में घुसते ही अगर किसी कोने में भीड़ नजर आए, साइकिलों की भरमार दिखे तो समझ जाइए, वहां शराब की दुकान है। शराब का ऐसा अजीब-सा नशा अनेक ग्रामीणों में समाया हुआ है कि वे चेतनाशून्य होकर शराब पीते हैं। फिर भले ही घर लौटते वक्त सड़क पर ही गिर जाएं, किसी नाली में लुढ़क जाएं, लेकिन वे शराब नहीं छोड़ पाते। अगर लड़खड़ाते हुए किसी तरह घर पहुंच गए तो पत्नी से गाली-गलौज और मारपीट की स्थिति बनती है। ऐसी स्थिति से दो-चार होने वाली औरतें बिना किसी एनजीओ की मदद के शराब के विरुद्ध झंडा उठा लेती हैं और सड़कों पर निकल जाती हैं। वे न केवल शराब दुकानों का विरोध करती हैं, बल्कि उद्योग-धंधों के नाम पर गांवों की जमीन हथियाने के पूंजीवादी प्रयासों के खिलाफ भी आवाज उठाती हैं।

मुझे अनेक आंदोलनों को नजदीक से देखने का अवसर मिला है। यों एक लेखक को सामाजिक कार्यकर्ता भी होना चाहिए। जब गांवों में जाता हूं तो महिलाओं की चेतना देख कर बहुत खुशी मिलती है। यह और बात है कि हमारी पुलिस शराब के खिलाफ अभियान चलाने वाली महिलाओं के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लेती है। दूसरी ओर जो शराब बेच रहे होते हैं, उन दुकानों को संरक्षण दिया जाता है! जबकि महिलाएं आमतौर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही करती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि पुलिस तिल का ताड़ बना कर उन्हें परेशान कर सकती है। महिलाओं ने मुझे बताया कि शराबबंदी का विरोध करने के कारण पुलिस वाले उनके घर तक धमक जाते हैं और कभी उनके पति को तो कभी बच्चे को पकड़ कर थाने में बिठा देते हैं। जब से सरकार खुद शराब बेचने लगी है, तब से स्थिति और भयावह हो गई है। फिर भी महिलाएं हिम्मत नहीं हार रही हैं।

ये गांव की औरतें हैं, जिन्हें शहरी लोग अनपढ़-गंवार भी कह देते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि गांव की औरतें शहरों की उन महिलाओं से लाख दरजे बेहतर हैं जो पित्जा-बर्गर, चाउमिन खाकर अपना जीवन निकाल देती हैं, समाजसेवा के नाम पर केवल फोटो खिंचवाती हैं और सक्रियता के नाम पर कुछ पार्टियां करती रहती हैं। लेकिन सामाजिक चेतना और बदलाव के लिए कुछ भी करने की दृष्टि उनके पास नहीं होती। दूसरी ओर, गांव की औरतें दिखावे के लिए काम नहीं करतीं। वे सच में बदलाव चाहती हैं। वे चाहती हैं कि उनके घर के लोग शराबखोरी से बाज आएं और खेती-किसानी पर ध्यान दें। पारंपरिक कुटीर उद्योग-धंधे में लगें।

यह सभी जानते हैं कि शराब के कारण गांव के अनेक किसान खेती पर ध्यान नहीं देते। गांव में कुटीर उद्योग खत्म हो रहे हैं। खेती का रकबा भी घटा है और इसके प्रति लोगों की रुचि भी समाप्त होती जा रही है। अनेक ग्रामीण और किसान शराब के ठेके पर पहुंच जाते हैं और शराब पीकर अपने पैसे और अपनी ऊर्जा नष्ट करते हैं। सरकार की कमाई तो हो जाती है, लेकिन गांव का भोलाभाला आदमी अपने पैसे और सेहत को बर्बाद कर बैठता है। ये नया और विकृत होता छत्तीसगढ़ है। इसको बचाने के लिए अगर गांव की महिलाएं आगे आ रही हैं तो उनका स्वागत होना चाहिए, न कि उन पर मामले-मुकदमे ठोंके जाने चाहिए। छत्तीसगढ़ में गांवों की इन जागरूक महिलाओं ने अपने आंदोलन से राज्य की एक विशेष पहचान बनाई है कि यहां की महिलाएं निर्भीक होकर अन्याय का प्रतिकार करती हैं और पुरुषों से आगे हैं।

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