Dunia mere Aage Opinion on a photo viral on Social Media against amazon - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः कुंठा का कारोबार

हाल ही में आॅनलाइन शॉपिंग की वेबसाइट ‘अमेजन’ पर बिक्री के लिए लगाए गए एक उत्पाद की फोटो किसी ने फेसबुक पर साझा की।

Author June 17, 2017 3:40 AM

विजय जायसवाल

हाल ही में आॅनलाइन शॉपिंग की वेबसाइट ‘अमेजन’ पर बिक्री के लिए लगाए गए एक उत्पाद की फोटो किसी ने फेसबुक पर साझा की। यह उत्पाद एक एशट्रे था, जिसमें सिगरेट बुझा कर रख दिया जाता है। एशट्रे नग्न महिला का प्रतिरूप था और सिगरेट को टिकाने के लिए महिला के निजी अंग को डिजाइन किया गया था। सोशल मीडिया के मंच फेसबुक पर कुछ लोगों द्वारा साझा की गई उस फोटो को देखने के बाद भी मेरा ध्यान इस ओर नहीं गया। लेकिन अगले दिन मेरी एक मित्र ने न केवल सार्वजनिक रूप से ‘अमेजन’ के इस उत्पाद की निंदा की थी, बल्कि सोशल मीडिया के जरिये उसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। इसके बाद मुझे अहसास हुआ जिस आपत्तिजनक उत्पाद को मैंने बहुत सहजता से नजरअंदाज कर दिया था, उसके प्रति एक महिला किस हद तक संवेदनशील थी। इसके बाद इस उत्पाद के खिलाफ फेसबुक पर मौजूद महिलाओं में एक आक्रोश ने जन्म ले लिया और सबने मिल कर न केवल फेसबुक पर, बल्कि ‘अमेजन’ वेबसाइट पर जाकर उस उत्पाद के विरोध में अपनी राय और शिकायत दर्ज कराई। इस अभियान में फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर मौजूद पुरुषों के एक बड़े तबके का भी भरपूर सहयोग मिला। इस संगठित विरोध का व्यापक असर हुआ और दिन बीतते-बीतते ‘अमेजन’ ने उस उत्पाद सहित उस तरह के सभी उत्पादों को अपनी वेबसाइट से वापस ले लिया। इस उदाहरण से दो चीजें साफ हैं। पहली, महिलाओं ने सोशल मीडिया पर केवल उपस्थिति नहीं दर्ज कराई है, बल्कि विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक बहसों समेत अपने मुद्दों और भावनाओं के प्रति मुखर हुई हैं। दूसरी, आॅनलाइन बाजार को धीरे-धीरे समझ में आ रहा है कि उत्पादों को बेचने के बारे में उसकी मनमानी अब नहीं चलेगी, क्योंकि आॅनलाइन स्टोर पर करोड़ों निगाहों की पहरेदारी है कि वह कब और क्या बेच रहा है!

इन सबसे अलग महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि वह कौन-सी कुंठा और मानसिकता है, जो ऐसे उत्पादों के विचार को जन्म देती है। यह भी बड़ा सवाल है कि कोई खुदरा बाजार या आॅनलाइन मार्केट कैसे इसे खुले और सार्वजनिक तौर पर बेचने में जरा-भी संकोच नहीं करता है! यह भी खोज का विषय है कि ऐसे कौन-से लोग हैं जो इस तरह के उत्पादों के उपभोक्ता हैं। यह किस तरह के समाज और संस्कृति का विकास हो रहा है, जिसमें यौन पिपासा इस तरह प्रतीकात्मक कुंठा का रूप ले रही है? क्या यह वही कुंठा है, जो आजकल समाज में बढ़ रहे बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की वजह है? सहमति से दो लोगों के बीच किसी भी तरह के संबंध और निजी अंगों के प्रति इस तरह की कुत्सित मानसिकता में बहुत भारी अंतर है। शायद यही कारण है कि बलात्कार के दौरान महिलाओं के निजी अंगों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें भी आती हैं। ऐसे में निश्चित रूप से इस दिशा में सोचने की जरूरत है कि इस तरह की मानसिकता के खिलाफ कैसे लड़ा जाए। यों यह भी सच है कि यौन विषयों से जुड़े खिलौनों या वस्तुओं का एक बहुत बड़ा बाजार भारत में मौजूद है और इसके व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा आॅनलाइन संचालित होता है। इस समय भारत में इसका कारोबार करीब साढेÞ चार सौ मिलियन डॉलर का है।

आमतौर पर छिपे उपयोग के चलते यह तय कर पाना आसान नहीं है कि इसके उपभोक्ता समाज के किस तबके से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन सामाजिक और मानसिक आधार पर यह अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि इस तरह के उत्पाद का उपयोग करने वाले समाज के उस हिस्से से ताल्लुक रखते हैं, जहां मानवीय रिश्ते और संबंध खोखले हो गए हैं और उनके पास बहुत ही ज्यादा एकाकीपन है। इसका मतलब यह है कि विकास की राह में हम एक ऐसी दुनिया को जन्म दे रहे हैं जो अपने जैविकपन को नकार कर, उससे परे सुख की तलाश में भटकने लगी है। ऐश-ट्रे के उदाहरण से देखें तो इस तरह की वस्तुएं रखने की चाह एक तरह की मानसिक विकृति है या फिर इसे सहज मानवीय इच्छा मान कर यों ही छोड़ दिया जाए? क्या बलात्कार करने वालों का भी यही मानसिक स्तर होता होगा? ‘अमेजन’ को खरीद-फरोख्त के आधुनिक और उन्नत माध्यम के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस आधुनिकता के पर्दे में भी आखिर क्यों महिलाओं को वस्तु बनाने वाली ऐश-ट्रे जैसी चीजें पितृसत्तात्मक मानस और स्त्री पर पुरुष वर्चस्व को स्थापित करने के औजार के रूप में बेची जाती हैं? यह केवल कोई वस्तु खरीदने-बेचने नहीं, बल्कि एक सामंती मानसिकता में जीते समाज की कुंठाओं का कारोबार करना है, लेकिन इससे अंतिम तौर पर स्त्री के प्रति एक वस्तुवादी नजरिया मजबूत होगा और यह किसी भी समाज के सभ्य या आधुनिक होने का सूचक नहीं हो सकता!

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