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दुनिया मेरे आगेः अंधेरे का सफर

मन रे... तू काहे न धीर धरे...! अचानक इस गीत को सुन कर मन अधीर हो गया और पिछले दिनों की कुछ घटनाओं और लोगों की प्रवृत्ति के बारे में सोचने लगी।
Author April 7, 2017 03:12 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

कविता भाटिया

मन रे… तू काहे न धीर धरे…! अचानक इस गीत को सुन कर मन अधीर हो गया और पिछले दिनों की कुछ घटनाओं और लोगों की प्रवृत्ति के बारे में सोचने लगी। अब तक परंपरा और महापुरुषों के विचारों से यही जाना-समझा कि धैर्य मनुष्य के छह विशेष गुणों में से एक है। सहनशील का अर्थ सहनशक्ति और शील स्वभाव का होना है और इसी शील स्वभाव में धैर्य, त्याग, संतोष और सहजता समाई हुई है। सहनशीलता व्यक्ति को सोचने-समझने का सही विवेक प्रदान करती है। महान लोगों के जीवन का इतिहास साक्षी है कि उनकी सफलता का महत्त्वपूर्ण कारक धैर्य और स्थिरता ही रही है। थॉमस एडीसन ने बल्ब के आविष्कार के लिए वर्षों प्रयास किया तो हेलन किलर ने उन कार्यों को सीखने के लिए, जो दूसरों के लिए आसान थे, धैर्यपूर्वक लंबा संघर्ष किया। उदाहरण अनेक हैं। पर आज की भागती-दौड़ती जिंदगी में उतावलापन बढ़ता जा रहा है। बच्चा कोई गलती कर दे तो तुरंत उसे डांट पड़ती है। पति-पत्नी में किसी बात पर अनबन हो जाए तो बात झगड़े से बढ़ कर घर छोड़ने और तलाक तक पहुंच जाती है। पिता-पुत्र, सास-बहू के रिश्तों में भी यही देखने को मिलता है। किसी लड़की के प्रेम संबंध को ठुकरा देने पर अपनी भावनाओं से बेकाबू होकर उन पर किए जाने वाले शारीरिक हमले और सरे बाजार कोई विवाद छिड़ जाने पर चाकू निकाल लेना इसी स्वभाव की श्रेणी में आते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं, बिजनेस आदि में नाकामी मिलने पर और जीवन में आए अन्य उतार-चढ़ावों में भी हम तुरंत धैर्य खो देते हैं। जबकि धैर्य हमें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है और चारित्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। इसके विपरीत हम अधीर होकर अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं।
पिछले दिनों कई ऐसी घटनाओं से हम रूबरू हुए जिनमें अधैर्य, मानसिक असंतुलन, असहनशीलता आदि स्पष्ट रूप से दिखते हैं। अपने शहर को स्वच्छ बनाने के लिए संवेदनशील कवि देवीप्रसाद मिश्र द्वारा एक बस कंडक्टर को दी गई उनकी सीख उन्हीं पर भारी पड़ गई। एक ओर अमेरिका में नस्ली भेद के आधार पर घृणा अपराध बढ़ रहे हैं, जिस कारण वहां रह रहे भारतीयों का जीवन संकट में है तो दूसरी ओर अपने देश में अफ्रीकी मूल के लोगों पर सिर्फ रंग देख कर हमला हमें उसी नस्लवादी की श्रेणी में खड़ा कर डालता है। कभी हम मूलत: युद्ध के विरुद्ध खड़ी गुरमेहर कौर की टिप्पणियों से आहत और विचलित हो जाते हैं तो कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जायज ठहरा कर अपनी गतिविधियों से अभिव्यक्ति को दबाने के अभियान में लग जाते हैं।

यह सच है कि किसी भी समाज में गलत या अनैतिक का विरोध जायज है और जरूरी भी। लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर कुछ भी राय देने से पहले विवेक और संयम से काम लेकर हमें उसकी सकारात्मकता की जांच अवश्य कर लेनी चाहिए। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर की गई अभिव्यक्तियों के नतीजे में आपत्तिजनक और हैरतअंगेज टिप्पणियां सामने आर्इं, जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अस्मिता और अपमान जैसे प्रश्नों को केंद्र में ला खड़ा किया। यों देखा जाए तो अभिव्यक्ति जैसे सशक्त हथियार का इस्तेमाल सामाजिक, राष्ट्रीय बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए किया जाना तो जायज है, पर लोगों की भावनाओं और उनकी निजता पर हमला करने के लिए किया जाए तो इसे कतई सही नहीं कहा जा सकता। सच तो यह है कि रचनात्मक आलोचना और अपमान के बीच कोई लकीर अवश्य होनी चाहिए। भारतीय किक्रेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी ने सोशल मीडिया पर अपनी बीवी और बच्ची की तस्वीर साझा की तो कुछ कट्टरपंथी सोच के लोगों ने उन्हें उनकी पत्नी की पोशाक को लेकर नसीहतें देते हुए अभद्र टिप्पणियां भी कर डालीं। उधर बंगाल में एक कवयित्री को महज कविता की कुछ लाइनों के लिए बलात्कार तक की धमकी दे दी गई। यह किस तरह का समाज बन रहा है और इसमें कैसी प्रवृत्तियां पल रही हैं।

सच है कि आज की भागती-दौड़ती जिंदगी में असहिष्णुता और अधैर्य में तेजी आई है। हम छोटी-छोटी बातों पर अपना धैर्य और विवेक खोकर उत्तेजित हो जाते हैं। यही नहीं, अपने से ज्यादा दूसरों के मामले में ताकझांक और हस्तक्षेप की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ रही है। ऐसे में किसी भी मसले पर हमारे द्वारा बिना सोचे-समझे की गई तात्कालिक टिप्पणी हमारी बौद्धिकता, वैचारिकता और रचनात्मकता का पैमाना कतई नहीं हो सकती। समय के साथ गतिशील रहना एक जागरूक नागरिक की पहचान है और यदि हमें वैचारिकता दिखानी ही है तो किसी भी मुद्दे या घटना के हर पहलू को पहले समझना होगा। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर ऐसी घटनाओं को देख कर मन विचलित हो जाता है कि आखिर कैसा समाज बना रहे हैं हम, जहां शांति, सुकून, भाईचारा, परस्पर समन्वय जैसे मूल्य के बजाय वाकपटुता, अधैर्य और हिंसा जैसी चीजें सामने आ रही हैं। समाज में मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए मनुष्य का धैर्यवान बने रहना जरूरत भी है।

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