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दुनिया मेरे आगेः एकांत का संगीत

सुबह हुई और सूरज की सिंदूरी आभा के साथ पूरब दिशा मुस्करा उठी।

Author November 4, 2017 3:38 AM
हवा के गुलाबी झोंके से पेड़ों की डालियों ने दोस्ती की और शांत वातावरण में पत्तों का संगीत गुनगुनाने लगा।

सुबह हुई और सूरज की सिंदूरी आभा के साथ पूरब दिशा मुस्करा उठी। अलसुबह जो चिड़िया उनींदी होकर अपने पंखों को समेटते हुए घोंसले में दुबक गई थी, उसने पहली किरण के साथ ही अपनी आंखें खोलीं और पंखों को फैला कर उनमें रश्मियों का पुंज भर दिया। हवा के गुलाबी झोंके से पेड़ों की डालियों ने दोस्ती की और शांत वातावरण में पत्तों का संगीत गुनगुनाने लगा। धीरे-धीरे सूरज का साम्राज्य चारों दिशाओं में फैलता गया और धरती का रूप उसकी किरणों के शृंगार से संवर उठा।

प्रकृति का यह अद्भुत और मोहक दृश्य देख मन ने कहा, आज इस सुखद सुबह की शुरुआत भी सुखद कार्य से होनी चाहिए। सुखद कार्य? मगर कौन-सा कार्य सुखद कहा जा सकता है? आज तो इंसानों की भीड़ में खुद को खोजना ही मुश्किल है! अगर घड़ी भर के लिए खुद से मुलाकात हो भी गई तो जब तक यकीन करें कि ये हम खुद ही हैं, तब तक इंसानी भीड़ का एक रेला आता है और खुद को ही धकेल कर दूर ले जाता है। ऐसे में क्षण भर पहले हुई खुद से मुलाकात एक युग का सफर बन कर रह जाती है। आप सोचेंगे, शब्दों का कैसा जाल फैलाया जा रहा है, जिसमें उलझन ही उलझन है! लेकिन यह उलझन नहीं, हमारी जिंदगी की हकीकत है।

आज इंसान के पास सभी के लिए समय है लेकिन खुद के लिए नहीं। जब-जब खुद से बातें करने के लिए मोबाइल पर अपना नंबर लगाया जाए तो वह व्यस्त ही मिलता है। व्यस्तताओं की पैनी धार पर बैठा आदमी धीरे-धीरे समय के साथ कटता चला जा रहा है। ऐसा कोई क्षण, कोई लम्हा नहीं, जब उसे एकांत मिला हो और इस एकांत में उसने अपने आप से बातें की हों। खुद को अपना दोस्त बनाने की बात, खुद को अपना सुख-दुख कहने की साध तो सबके मन में होती है। पर कहां कर पाते हैं हम ऐसा। हम सबके बारे में जानने का दावा भले ही लें, पर अपने आप को जानने का दावा कभी नहीं कर सकते।

आजकल डॉक्टर मरीज को दवाओं के रूप में एक सलाह देने लगे हैं। अखबार, टीवी, मोबाइल से दूर होकर एक सप्ताह के लिए अपनों से इतनी दूर चले जाओ, जहां बिजली तक न हो। यानी सुदूर गांव में। वहां जाकर सुनो एकांत का संगीत। अकेलेपन में भीतर से आवाज आएगी। इस आवाज को पहचानो, यह अपनी ही आवाज होगी, जो हमें पुकारती है। कई बार कोशिश करोगे तो इस आवाज को साफ सुनने लगोगे। फिर शुरू कर देना, अपने आप से बातचीत। बात करते रहना, करते रहना। एक समय ऐसा भी आएगा, जब आप खुद को अजनबी लगने लगेंगे। अरे! यह तो मैं ही हूं, यह तो मेरे बचपन की आवाज है, अब तक कहां थी यह आवाज? इसी आवाज को सुनने के लिए मैं तरस गया था। आखिर कहां थी यह आवाज! मेरे ही भीतर थी तो सुनाई क्यों नहीं दी मुझे!
अक्सर ऐसा ही होता है, जब हम एकांत का संगीत सुनते हैं तब हम अपने बेहद करीब होते हैं। यही क्षण होता है, जब हम अपनी आवाज सुनें। हम क्या कहते हैं, क्या सोचते हैं, हमें क्या करना है, कहां जाना है, हमारी मंजिल क्या है आदि। इन सबका उत्तर मिल जाएगा, जब हम वास्तव में अपनी दुनिया में लौट आएंगे… जहां हमारे अपने हमारा इंतजार कर रहे होते हैं। बहुत ही कम होती है इन अपनों की संख्या। पर हौसला बढ़ाने में इनका कोई सानी नहीं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि एकांत का संगीत सुनो…

आपाधापी में इंसान गुम-सा हो गया है। उसके भीतर का शोर ही इतना अधिक है कि बाहर के शोर का मुकाबला नहीं कर पा रहा है। बाहर का शोर यानी जीवन की समस्याएं, पेचीदगियां इतनी उलझी हुई हैं कि उसे सांस लेने का भी समय नहीं मिलता। इस उलझन में वह इतना अधिक उलझ जाता है कि वक्त हाथ से निकलता जाता है, उसे पता ही नहीं चलता। आज किसी के पास कमी है तो केवल वक्त की। हर कोई भागा जा रहा है। परिवार के लिए तो समय ही नहीं बचता। एक ही छत के नीचे अनजान बन कर रह रहा है इंसान। अब तो जरूरी बातें भी वाट्सएप के माध्यम से होने लगी हैं। कभी-कभी मेल भी हो जाता है। पता ही नहीं चलता कि कब खाना खाने का वक्त हो गया, कब सो गए। सब कुछ इतना अधिक मशीनी हो गया है कि इंसान की औकात एक पुर्जे से अधिक नहीं होती।

अतीत के बारे में कहा जाता है कि वह कभी लौट कर नहीं आता, पर यहां एकांत में वह हमारे सामने होता है, सकुचाता-शरमाता हुआ। धीमे कदमों से वह हमारे करीब आता है, आकर कहता है- मैं वही हूं, जिसे तुम छोड़ आए थे, बरसों पहले, अपने गांव या शहर में। आज आओ हम जी-भर बतियाएं, जी लें अपने अतीत को। एकांत ने जब यह हमें अवसर दिया है तो चूकना नहीं चाहिए।

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