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दुनिया मेरे आगेः शौक अपना अपना

हमारे एक मित्र कवि-शायर तो नहीं हैं, मगर उन्हें शेरो-शायरी, कविताएं जमा करने का शौक है। अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताओं-गजलों को वे अपनी सुंदर लिखावट के साथ अपनी नोटबुक में सहेज लेते हैं।

Author Updated: February 28, 2020 3:13 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

राजेंद्र वामन काटदरे

पिछले दिनों अखबार में पूना में रहने वाले एक सज्जन का परिचय प्रकाशित हुआ, जिन्हें तरह-तरह की गणेश जी मूर्तियों के संग्रह का शौक है। उनके पास ऐसी कई सौ मूर्तियां हैं। उनके इस शौक के कारण उनके रिश्तेदार और मित्रमंडल उन्हें किसी प्रसंग विशेष पर उपहार में गणेश की मूर्ति ही देते हैं। उनके घर का एक कमरा इन मूर्तिर्यों सहेजने के लिए ही रखा गया है। इसी तरह हमारे एक मित्र को साबुन के रैपर इकट्ठा करने का शौक है और इनके संग्रह में भी देश-विदेश के कई साबुनों के रैपर हैं। फिर ‘फिलाटेली’ के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यानी डाक टिकिटों का संग्रह। इन सबको शौक कह लें या ‘हॉबी’ कह लें, ये महंगी हैं, क्योंकि गणेश जी की मूर्र्ति या डाक टिकट खरीदने और सहेजने में काफी धन और समय खर्च करना पड़ता है। फिर साबुन के रैपर जमा करना भी कम खर्चीला नहीं है, क्योंकि बाजार में कभी नीम, कभी तुलसी, कभी अदरक, दूध-मलाई, शहद आदि न जाने क्या-क्या मिला कर नित नए साबुन आते रहते हैं।

हमारे एक मित्र कवि-शायर तो नहीं हैं, मगर उन्हें शेरो-शायरी, कविताएं जमा करने का शौक है। अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताओं-गजलों को वे अपनी सुंदर लिखावट के साथ अपनी नोटबुक में सहेज लेते हैं। जिस दौर में लोगों के हाथ में मोबाइल इस तरह अभिन्न हो गया है कि कुछ पढ़ने-लिखने तक के लिए वे उस पर निर्भर हो चले हैं, उसमें एक व्यक्ति अगर नोटबुक में सुंदर लिखावट दर्ज करता है तो यह मेरी नजर में खास है। खासतौर पर अक्षर और अंगुलियों के नाजुक रिश्तों के लिहाज से, जो पिछले कुछ सालों से लगातार कमजोर होता गया है। कवि सम्मेलन हो या फिर मुशायरे का आयोजन, उसमें वे बिना चूके हाजिरी देते हैं और वहां से पसंदीदा शेरो-शायरी सहेज लाते हैं। इनका शौक इनके बड़े काम आता है, क्योंकि घर-परिवार और मित्र मंडली के कार्यक्रमों में ये सुविख्यात शायरों-कवियों की रचनाएं सुना कर माहौल बना देते हैं। हर प्रसंग के लिए इनके पास शेर या कविता निकल ही आते हैं। मौका कोई भी हो, उसके अनुकूल रचना को अपनी यादों से निकाल कर ये कहते हैं- ‘नीरज जी ने क्या खूब कहा है… या गालिब का शेर यहां मौजू है’। इसके साथ ही ये उनकी कोई रचना सुना ही देते हैं।

इसी तरह, हमारे एक मित्र महोदय को खाना पकाने का शौक है। हालांकि हमारे जमाने में ‘शेफ’ या रसोइया के रूप में कॅरियर बनाया जा सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था। इसलिए हमारे वे मित्र महोदय अपने रसोई घर के राजा बन कर रह गए। अगरचे हमारे समय में खाना पकाने की कला का प्रदर्शन या पाठ्यक्रम होते तो हमारे ये मित्र निश्चित ही आज के सुविख्यात ‘शेफ’ होते। लेकिन ये जरा भी निराश नहीं दिखते हैं और रविवार या किसी भी दिन समय मिलते ही किचेन में जाकर नए-नए तरीके से खाने के सामान या व्यंजन तैयार करते हैं और खुद के साथ अपने परिवार को भी आनंदित कर देते हैं। हालांकि इनका मजाक बनाने वाले लोग भी कम नहीं हैं, जो इन्हें ‘जोरू का गुलाम’ की संज्ञा देते हैं। मगर ये अपने इस शौक को बनाए हुए हैं और इसका पूरा आनंद लेते हैं। यों यह समझना मुश्किल है इनका मजाक बनाने वाले लोगों का ध्यान इस पर क्यों नहीं जाता है कि उन्हें किसी पुरुष के किचेन में काम करने की बात अजूबी क्यों लगती है! लैंगिक समानता के लिहाज से यह सामान्य या सहज होना चाहिए कि घर में किचेन है तो उसमें पुरुषों की भागीदारी बराबर की या फिर मुमकिन हो तो महिला से ज्यादा होनी चाहिए।

हमारे मुहल्ले की एक बिटिया कॉलेज में पढ़ रही है। उसे पढ़ाने का शौक है और पूरे मुहल्ले के बच्चे और बच्चियां अपनी इस दीदी के पास अपनी गणित या विज्ञान की समस्याएं लेकर पहुंचते रहते हैं और ये भी लगन से उन समस्याओं का निदान कर अपना पढ़ाने का शौक पूरा करती है। टीवी या नेटवर्किंग वेबसाइटों पर पैसा और वक्त बर्बाद करने की जगह अपना पढ़ाने का शौक पूरा करना इसे भाता है। सुविख्यात शायर फिराक ने क्या खूब कहा है कि ‘पाल ले इक रोग नादां जिन्दगी के वास्ते/ सिर्फ सेहत के सहारे जिंदगी कटती नहीं।’
तो ‘हॉबी’ या शौक कैसा भी हो, कुछ भी हो, लेकिन होना जरूर चाहिए, क्योंकि हम आम जन हैं और हममें से कोई कितना ही व्यस्त क्यों न हो, दिन में कुछ समय तो ऐसा निकलता ही है जब हमारे पास करने को कुछ नहीं होता। अगर इस समय का सदुपयोग हम अपने किसी शौक, किसी हॉबी को पूरा करने में लगाएं तो दिल भी लगा रहेगा और फिजूल के विचारों से भी हम बचे रहेंगे, क्योंकि किसी ने कहा भी है कि खाली दिमाग शैतान का घर!

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