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दुनिया मेरे आगेः सभ्यता की सीड़ियां

आज हर माता-पिता अपने बच्चों को आसमान पर पहुंचाना चाहते हैं। इसके लिए माता-पिता क्या से क्या नहीं करते हैं! वे माता-पिता शिक्षित हों या फिर अशिक्षित हों। इन दोनों का एक ही सपना रहता है कि उनके बच्चे पढ़-लिख कर कुछ अपना और अपने खानदान का नाम सितारों की तरह रोशन कर सकें।

Author December 21, 2017 2:39 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

बृजमोहन आचार्य

किसी कवि की ये पंक्तियां आज के समाज में सटीक बैठ रही हैं- ‘मत शिक्षा दो इन बच्चों को चांद-सितारे छूने की/ चांद- सितारे छूने वाले छूमंतर हो जाएंगे/ अगर दे सको, शिक्षा दो तुम इन्हें चरण छू लेने की/ जो मिट्टी से जुड़े होंगे, रिश्ते वही निभाएंगे।’ आज हर माता-पिता अपने बच्चों को आसमान पर पहुंचाना चाहते हैं। इसके लिए माता-पिता क्या से क्या नहीं करते हैं! वे माता-पिता शिक्षित हों या फिर अशिक्षित हों। इन दोनों का एक ही सपना रहता है कि उनके बच्चे पढ़-लिख कर कुछ अपना और अपने खानदान का नाम सितारों की तरह रोशन कर सकें। इसके लिए मां रात-रात भर जाग कर परीक्षा के दिनों में बच्चे का ध्यान रखती है कि उसके लाल के किसी भी विषय में अंक कम न आ जाएं। इसके लिए वह हर तरह बच्चे का पूरा खयाल रखती है। उसके उठने-बैठने, सोने और खानपान का सारा समय निर्धारित करती है और उसका पालन करती है।

लेकिन मां ने कभी यह नहीं सोचा होता है कि जिस पौधे को वे सींच रही हैं, उसमें सभ्य और मानवीय भावनाओं-संवेदनाओं की शाखाएं भी कभी पल्लवित हुर्इं या फिर उलटे उसकी जड़ें खोखली हो रही हैं! आज अगर देखा जाए तो ऐसी भावनाओं और सोच की जड़ें तो जन्म से ही खोखली हो रही हैं। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि सुबह उठते ही अगर मोबाइल हाथ नहीं लगे तो बच्चे चिल्लाना शुरू कर देते हैं। बड़े-बुजुर्गों के सामने से बिना अभिवादन या नमस्कार किए आगे निकल जाना और बेढंगे कपड़े पहन कर समाज में अपने आपको अलग दिखाना ही जैसे फैशन हो गया है।

हालांकि इसके लिए युवा वर्ग को ही पूरी तरह से दोषी ठहराना गलत होगा। समाज में संयुक्त परिवार की प्रथा का जब से लगभग अंत हो गया है और एकल परिवार की प्रणाली चलन में आ चुकी है, तभी से बच्चों में अच्छी बातों और व्यवहार की नींव कमजोर हुई है। संयुक्त परिवार प्रथा में दादा-दादी और नाना-नानी के पास बच्चे रहते थे तो वे बच्चों को अच्छी-अच्छी पुस्तकों और कहानियों के बारे में बताते रहते थे। ये पुस्तकें परिवारों में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और श्रद्धा के भाव का बोध कराते थे। इससे बालमन में ही बच्चों में सभ्य व्यवहार और बात से लैस भावनाएं उत्पन्न हो जाती थीं। नानियां कहानी सुना कर भोले-भाले बालमन को स्वच्छ और निर्मल बना देती थीं।

लेकिन अब ये सब इतिहास के पन्नों में दफ्न हो गई लगती हैं। इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी अगर मानें तो टीवी चैनल हैं, जिनके बाजार ने समाज को विखंडित कर दिया है। इसके बाद हर हाथ में आए मोबाइल ने समाज के विखंडन को और चौड़ा कर दिया। एक कमरे में अगर पति और पत्नी भी होते हैं तो वे आपस में बतियाते कम हैं और मोबाइल पर फेसबुक या वाट्स ऐप पर ज्यादा व्यस्त रहते हैं। उनके पास वाले कमरे में उनके बच्चे मोबाइल पर क्या देख रहे हैं और क्या सीख रहे हैं, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता।

मसलन, जानलेवा ब्लू ह्वेल के खेल के परिणाम सबके सामने हैं। अगर अभिभावक अपने बच्चों की सारी गतिविधियों पर ध्यान देते तो इस खेल से बच्चों की जान नहीं जाती। लेकिन बच्चों के हाथों मे महंगे मोबाइल देकर अभिभावक अपने आपको ऐसे आजाद मान रहे हैं, जैसे वे किसी बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हों। सभ्य, सुशिक्षित व्यवहार और सहायता ही ऐसे गुण हैं जो किसी बच्चे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन आज की स्थिति में इन दोनों ही गुणों से बच्चों को कोई लेना-देना नहीं है। अगर बच्चों के मन में शुरू से ही सभ्य और नैतिक शिक्षा से लैस विचार और व्यवहारों के बीज बो दिए जाएं और उसे सामूहिकता की भावना से अवगत कराया जाए तो क्यों नहीं वह भी बड़ा होकर समाज को सही दिशा बताने वाला मार्गदर्शक बन सकता है।

आगे बढ़ने के लिए अच्छे व्यवहारों और विचार के स्तर पर सभ्य और बराबरी के सिद्धांतों का पालन करना जरूरी है। अगर मिस वर्ल्ड बनी मानुषी छिल्लर में हौसला नहीं होता तो वह इस खिताब को कभी नहीं हासिल कर सकती थीं। जब मानुषी से यह सवाल पूछा गया कि किस व्यवसाय में सबसे ज्यादा तनख्वाह मिलनी चाहिए और क्यों, तो इसके जवाब में मानुषी ने कहा कि मां को सबसे ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए उसे नकद तनख्वाह नहीं, बल्कि सम्मान और प्यार मिलना चाहिए। यह जवाब वही बच्चा दे सकता है जो रिश्तों की गहराई और उसकी संवेदनाओं को ठीक से समझता हो।

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