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दुनिया मेरे आगे: कहने का सलीका

न कहने के अपने तर्क हो सकते हैं। पर देखने की बात यह है कि न कैसे और क्यों कहा गया। इसके लिए स्थान विशेष का भी ध्यान रखा जाता है। जिसने स्थान और समय नहीं देखा, सामने वाले का सामाजिक रुतबा नहीं देखा, उसको विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। हम अपने समाज पर लाख गर्व करें, यही निकृष्ट सोच हमारी सामाजिक हकीकत है।

जीवन में हर चीज के लिए हा. कहना खतरनाक हो सकता है, इसलिए मना करने की कला भी आनी चाहिए।

विप्रम

पहली नजर में ‘न’ कहना जितना सरल लगता है, उतना यह है नहीं। बल्कि कह सकते हैं कि इसके लिए बड़ी हिम्मत जुटानी पड़ती है। न कहने के बाद इससे उपजने वाली परिस्थितियों को बड़ी गहराई से समझना पड़ता है। दूरदर्शी और बुद्धिमान लोग न कहने से पहले बड़े ही सलीके से एक अच्छी-सी भूमिका बनाते हैं। बड़ी ही लाग-लपेट का मुलम्मा लगा कर ही न कह पाते हैं। न कहना अगर सीखना हो तो आज के नेताओं से सीखा जा सकता है। बड़ी ही चतुराई से वे न कह देते हैं। एक आम आदमी समझता है- ‘हां’। शुरुआती ‘हां’ न जाने कब उनकी न बन जाती है, पता ही नहीं चलता। शायद यही असली नेता की गहरी पहचान होती है और पहली भी।
उधर जिसने भी न कहने में जल्दबाजी की, उसे इसके कुपरिणाम भुगतने पड़े हैं।

इस क्रम में मारपीट के किस्से तो आम सुनने को मिल ही जाते हैं। वर्षों की दुश्मनी भी झेलनी पड़ती है, सो अलग। कहीं बलात्कार की वारदात देखने-सुनने में आती हैं तो आए दिन तेजाबी हमला या फिर ब्लेडबाजी के खतरनाक हादसे भी इसके उदाहरण होते हैं। हालत यह है कि गलत नहीं सहने और न कहने की वजह से एक लड़के की बुरी तरह पिटाई कर दी गई। पहले लड़के को अगवा कर लिया गया था। ऐसे युवाओं को शायद कानून का कोई भय नहीं रहता, न ही अपने घर-परिवार की कोई चिंता। लगता है ऐसे युवा किसी सामाजिक बंधन या उसके नियम-कायदों को नहीं मानते, न ही समझना चाहते हैं। अगर सब समझ गए तो फिर उल्टी-सीधी ‘न’ कैसे कर सकेंगे?

ऊपर से लोग तोहमत और देने लग सकते हैं। कहते भी हैं कि पढ़ा-लिखा न करने से पहले लाख बार सोचेगा। कुछ समय पहले एक फिल्म आई ‘छपाक’। एक तेजाबी हमले पर आधारित इसकी कहानी है, बिल्कुल सच्ची। देखने के बाद कोई भी बता सकता है कि ‘गलती’ कहां हुई होगी। यहां हमारा मकसद फिल्म की बात नहीं, बल्कि न कहने की महत्ता का है, उसकी उपयोगिता का है।

दरअसल, न कहने के लहजे और तर्ज का भी महत्त्व होता है। अगर लड़की समय पर तर्कसंगत सूझ-बूझ का परिचय दे तो भविष्य में होने वाली किसी भी अपराध या अचानक आने वाली विकट परिस्थिति से बचा जा सकता है। बेलगाम युवा मन जब अपनी करनी पर आता है तो वह हर हालत में मनचाही मुराद पा लेना चाहता है। राह में आने वाले रोड़े को हटाने के लिए वह बुरे से बुरे तरीकों को इस्तेमाल करने से नहीं चूकता। फिर उसके दिमाग में प्रतिशोध की जो आग लग चुकी होती है, तब उसका यह कथन होने वाले अपराध की मंशा का भी खुलासा कर देता है कि ‘जो मेरी न हो सकी, वह किसी और की कैसे हो सकती है… मुखड़ा न बिगाड़ दिया तो…!’

ऐसे में लड़की को थोड़ी समझदारी से काम लेना चाहिए, उसके मां-पिता और परिवार को भी कोई परिपक्व रास्ता अपना कर लड़के से संवाद बना कर उसे समझाना या फिर समय रहते उसे पुलिस के हवाले करवाने की व्यवस्था करनी चाहिए। लेकिन यहां बहुत समझदारी और संवेदनशीलता की जरूरत होती है। लड़कों को हमारे समाज में जिस तरह बेलगाम होने का सांस्कृतिक प्रशिक्षण दिया जाता है, वह हम सब जानते हैं। यह बेलगाम होना कब उसे अपराधी बना दे, कहा नहीं जा सकता। इसलिए जान और जीवन की सुरक्षा के साथ ‘न’ कहने के अपने अधिकार को सुरक्षित रखने की कोशिश करी चाहिए।

न कहने के अपने तर्क हो सकते हैं। पर देखने की बात यह है कि न कैसे और क्यों कहा गया। इसके लिए स्थान विशेष का भी ध्यान रखा जाता है। जिसने स्थान और समय नहीं देखा, सामने वाले का सामाजिक रुतबा नहीं देखा, उसको विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। हम अपने समाज पर लाख गर्व करें, यही निकृष्ट सोच हमारी सामाजिक हकीकत है।

बात सिर्फ कहने के तरीके की है। आमतौर पर होता यह है कि कहने वाले ने न कह दिया। यह नहीं सोचा जिसे कहा गया है, वह शहर से आया है या गांव से। हालांकि इस मामले में शहरी लोग कम असभ्य नहीं होते। एक लड़का अपने शहरी मित्रों के साथ लड़की देखने आया। वह भूल गया कि गांव के संस्कार, लोकलाज और रीति-रिवाज शहर की चमक-दमक के आगे बहुत अलग होते हैं। न कहने वाले शहरी का उसके शहर तक नहीं छोड़ते। बल्कि कह सकते हैं कि कहीं का नहीं छोड़ते।

एक बार होने वाले एक दामाद ने न कहने के अंदाज में एक महंगी कार की फरमाइश कर डाली। लड़की का पिता समझदार ही नहीं, बुद्धिमान भी था। अपनी हां में उसने कहा- ‘बेटे, तुम अभी किराए के मकान में रहते हो। कार रखने की जगह कर लोगे तो कार भी मिल जाएगी।’ लड़का काफी दिनों तक अपना सिर खुजलाता रह गया। न को हां समझ कर रह गया।

कह सकते हैं कि न को तरीके से और एक सलीके से कहने की एक कला होती है, जिसे हर घर में माता-पिता को सिखाने आना चाहिए। बच्चों को स्कूल-कॉलेज आदि संस्थानों में भी इस ओर विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि आए दिन होने वाली छोटे-बड़े अपराधों से बचा जा सके।

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