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दुनिया मेरे आगे: रब सब भला करेगा

देश यथास्थिति-वाद का आदी हो गया है और यहां आपको सब कुछ बदल जाने का आभास दिया जाता है। परिवर्तन की राह पर चलते हुए जमाना कयामत की चाल चल गया

वैश्वीकरण के दौर में मध्यवर्ग के सामने हालात हमेशा विपरीत ही होते हैं।

सुरेश सेठ

‘भाई जान, ऐसे दिन हम पर गुजरे हैं कि आपको क्या बताएं। सब ठीक-ठाक चल रहा था। देश में काम नहीं चल रहा था, लेकिन रोज मीडिया में घोषणा हो जाती कि हमने नई उपलब्धियों के मीनार विजय कर लिए। तय वक्त पर काम हो जाने के वादों के साथ हर शहर में सुविधा केंद्रों की इमारतें खड़ी कर दी गई थीं, जहां चुटकी बजा कर आपका काम करवा देने वालों के झुंड खड़े रहते। जी हां, इन्हीं लोगों को मध्यजन कहते हैं। ये वही लोग थे, जिनके बारे में किसी पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था कि अपने देश में आम जनता के कल्याण के लिए एक रुपया खर्चें तो सत्तासी पैसे इनकी जेब में जाते हैं। वक्त बदल गया है और इनका तेवर भी। आज के प्रधानमंत्री फरमाते हैं कि एक रुपया खर्च करें तो नब्बे पैसे आम आदमी तक पहुंच जाते हैं। बीच के इन लोगों के तावान से आमजन को छुटकारा मिल गया। भ्रष्टाचार की महामारी से लोगों को छुटकारा मिल गया।’

साब को घोषणा ही तो थी, सो कर दी। विश्व का भ्रष्टाचार सूचकांक चिल्लाता रहा, साब क्या बात करते हो। विश्व के सबसे दस महाभ्रष्टाचारी देशों में अब भी आपका स्थान सुरक्षित है और ये मध्यजन अब भी श्रीमंत बन कर अपनी-अपनी मेज-कुर्सी इन सुविधा केंद्रों के प्रांगण में डाल साइकिल से मोटरसाइकिल और मोटरसाइकिल से कार बन रहे हैं।

विश्व भ्रष्टाचार तालिका में आपका देश वहीं खड़ा है, आपकी सब कुछ बदल जाने की घोषणाओं के बावजूद। ये घोषणाएं कैसी लुकमान अली की दवाएं होती हैं। देश यथास्थिति-वाद का आदी हो गया है और यहां आपको सब कुछ बदल जाने का आभास दिया जाता है। परिवर्तन की राह पर चलते हुए जमाना कयामत की चाल चल गया और आप फरमा रहे हैं, आह! हमारी यह देव धरा! आओ अपने अतीत का पूजन करें।

ऐ दुनिया वालो, जिस तरक्की पर तुम इतराते हो, इसका आविष्कार तो हमने हजारों-लाखों वर्ष पहले कर लिया था। रामायण और महाभारत युद्ध में चले अग्निबाण आज के एटम बम ही तो थे। रावण का पुष्पक विमान आज के सुपरसोनिक जेट से तेज उड़ता था। धन्वंतरी की उपचार विद्या का अंत नहीं है। आज के इबोला से लेकर कोरोना वायरस की हिम्मत ही क्या, जो इनकी उपचार विद्या के करीब फटक जाएं।

लेकिन मेरा भारत महान के नारों भरे माहौल में यह कोरोना नाम का अदृश्य विषाणु कहां से हमारी हवा में उतर आया? पश्चिमी देश तो इसके आघात से त्राहिमाम कर रहे थे, लेकिन यह हमारी पुण्य धरती पर भी उतर आया। पूरा भयाक्रांत देश घरों में बंद हो गया। सड़कें सूनी हो गईं। गली मोहल्ले इसकी आमद के भय से भयभीत हो गए। कल-कारखानों और मिलों के भोंपुओं ने चुप्पी साध ली। मीडिया की यह फुसफुसाहट मरीजों के बढ़ते आंकड़ों का क्रंदन बन गई। घरों में बंद लोग अचानक बेकाम हो गए।

भुखमरी उनके दरवाजों पर दस्तक देने लगी। देश भर में काम-काज की प्राण वायु निष्क्रियता के पक्षाघात का शिकार हो गई। दुनिया भर में इस मर्ज का कोई इलाज नहीं है। अपना देश तो है ही इस मामले में शुरू से फिसड्डी। अपने यहां भी निर्बल से स्वर में दवाई तलाश उद्यम की घोषणा होती रहती। लेकिन फिलहाल इससे छुटकारा पाने के लिए काढ़ा पीने और गर्म पानी के गरारों की सलाह के सिवा कुछ नहीं था। गलबहियों की जगह छह हाथ दूर रहने की सलाह मिली। प्रेमालाप में आलिंगन, चुंबन की जगह फ्लाइंग किस का जमाना आ गया। लेकिन पूर्णबंदी या घरबंदी के इन दिनों में औरतों के गर्भाधान का प्रतिशत कैसे बढ़ गया? इन विषाणुओं के मारक प्रभाव का रहस्य जान लेंगे तो इस पर भी शोध की जाएगी, बंधु!

लेकिन कब तक यों सब चलता रहता। दो महीने का यह मौन अलगाववास गुजर गया। अब देश में भुखमरी और भविष्य-हीनता के अंधेरे उन करोड़ों लोगों को सताने लगे, जो रोज कुआं खोदते थे और रोज पानी पीते थे। हम नहीं कहते कि सरकार ने इनकी समस्या का समाधान नहीं किया। लोगों की भूख से आंतें झुलसने लगीं, करोड़ों लोग अपना परिवार कंधों पर लाद कर पांव-पांव गांव-घरों की ओर चल दिए तो उनमें रोटी की जगह साख-पत्र बंटने लगे।

लेकिन बेकाम हाथों को काम चाहिए। इसलिए अब देश खोल दिया गया है। कल-कारखानों के शोर-शराबे और फैक्टरियों के भोंपू बजाने की इजाजत मिल गई। घर लौटते कामगारों को प्रेरणा मिली, मत जाइए। यहीं काम शुरू हो गया है। वे पूछते हैं, ‘लेकिन संकट तो टला नहीं। रोज इसके संक्रमण में आए लोगों के आंकड़े बेतहाशा बढ़ रहे हैं।’ लोग बीमार हो रहे हैं, मर तो नहीं रहे। मरने वालों का अनुपात दूसरे देशों से कम है।’ ठीक होने वालों की संख्या बढ़ रही है। आप मास्क, दस्ताना पहनिए, खुदा सब ठीक कर देगा। हमसे उधार लेकर काम शुरू कीजिए। रब सब भला करेगा।

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