दुनिया मेरे आगेः नए जमाने के पात्र - Dunia mere Aage: Modern characters And Lifestyle - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः नए जमाने के पात्र

समय के साथ-साथ कई चीजें बदलती हैं। मनुष्य का रहन-सहन, उसके आचार-विचार से लेकर खानपान, परिधान, पात्र और भी बहुत कुछ।

Author June 2, 2017 3:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अशोक कुमार

समय के साथ-साथ कई चीजें बदलती हैं। मनुष्य का रहन-सहन, उसके आचार-विचार से लेकर खानपान, परिधान, पात्र और भी बहुत कुछ। इतिहास में पढ़ा कि प्रागैतिहासिक काल में लोग पत्थरों का उपयोग औजार और बर्तन के रूप में करते थे। समय बदला, लोगों ने ताम्र और कांस्य युग में इसका प्रयोग किया। इसके बाद का दौर एल्युमीनियम और स्टील का भी आया। आजकल इस युग से पड़े ‘पॉली’ युग में हम जी रहे हैं। हालांकि इस युग में भी तांबे और कांसे के पात्रों का महत्त्व कम नहीं हुआ। शादी-विवाह से लेकर किसी के मरने के बाद होने वाले श्राद्ध कर्म में तांबे और कांसे के बर्तन ही चलन में हैं। किसी जमाने में अतिथि सत्कार का भी बड़ा महत्त्व था। किसी के घर कोई जान-पहचान का या अजनबी भी पहुंचता तो सबसे पहले कांसे के लोटे या जग में पानी लेकर घर के लोग उसके सामने खड़े रहते। उसके पांव धुलवाते और तब आराम से बैठने को कह कर ठंडा पानी देते। अतिथि की थकावट दूर हो जाती। तब आगे की बात होती।
कुछ दिनों पहले मैं अपने एक जान-पहचान के व्यक्ति के घर गया। गरमी काफी थी। पहुंचते ही सबसे पहले तेज प्यास का अहसास हुआ। इसलिए मैंने घर के भीतर से निकले एक किशोर को अपने पापा को बुलाने के लिए कहा और पानी पीने की इच्छा जताई। लगभग पंद्रह वर्ष का वह बच्चा कुछ देर में एक बोतल में पानी लेकर आया और मुझे थमा दिया। मैं कुछ असमंजस में पड़ गया कि क्या बोतल से ही पानी पी लिया जाए या ग्लास लाने को कहूं! कुछ देर मन में विचार करते हुए बोतल को खोल कर मुंह और बोतल के बीच कुछ दूरी बनाते हुए पानी के कुछ घूंट पी गया। हलांकि इससे मुझे संतुष्टि नहीं मिली। लेकिन चिलचिलाती गरमी में हलक को कुछ राहत महसूस हुई। अक्सर रास्ते में, रेलवे स्टेशनों पर या फिर होटलों में नौजवानों को देखता हूं कि बोतल का ढक्कन खोला और पानी हो या और कोई शीतल पेय पदार्थ, एक मिनट के अंदर गटक लिया। ऐसे युवाओं को देख कर कभी बेतरतीब भी लगता है।

इसके संबंध में मैंने जब कुछ नौजवानों से बात की तो सरलता के साथ उनका जवाब था कि पहले लोटे और ग्लास का झंझट रहता था। कभी लोटा मिले तो ग्लास नहीं, ग्लास मिले तो लोटा नही। अब इन झंझटों से राहत मिली है। और तो और, आने-जाने में पानी लेकर चलना काफी कठिनाई भरा होता था। अब इन सबसे मानो छुटकारा मिल गया। मैंने उनकी यह बात मान ली। लेकिन यह केवल पानी की बोतलों तक सीमित नहीं है। आधुनिकता से भरे आजकल के समारोहों में कुछ भी खाने के लिए थर्मोकोल की प्लेट और प्लास्टिक के ग्लास आदि से काम चलाए जाते हैं। एक बार कुछ खाने या पीने के लिए उनका उपयोग किया और फेंक दिया। जिस दौर में प्लास्टिक की उपयोगिता इतनी नहीं थी, उस समय सामूहिक भोज में कागजों और पत्तों से निर्मित बर्तनों का उपयोग किया जाता था। झोला या थैला लेकर बाजार जाने की आदत आमतौर पर लोग भूल गए हैं। सब्जी से लेकर अन्य जरूरतों के सामान लोग पॉलीथीन के बैग में पैक कराते हैं और चल पड़ते हैं। घर पहुंच कर उस थैले को जहां-तहां फेंक कर हम अपने को मुक्त समझ लेते हैं।

इस तरह के नए जमाने के इन बर्तनों या पात्रों के फायदे और नुकसान से अलग एक महत्त्वपूर्ण विमर्श का बिंदु यह भी है कि लोगों के पास इतनी जल्दी है कि वे घर आए लोगों की खातिरदारी करने का तरीका और औपचारिकता निबाहने तक को भी नजरअंदाज करने लगे हैं। जबकि योगाचार्यों से लेकर चिकित्सकों तक का मानना है कि स्थिर तन और मन से खाना और पीना चाहिए। आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। लेकिन अब आविष्कार ही आवश्यकता बना दिया गया है। पहले वस्तुओं का आविष्कार करो और उसे इस तरह प्रचारित करो कि लोगों को लगे कि इस उत्पाद के बिना आपकी आवश्यकता अधूरी है। फिलहाल प्लास्टिक के इस युग में लोग उसके साथ जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं। लेकिन आने वाले गंभीर खतरों को भांप नहीं पा रहे हैं। आमतौर पर किसी समारोह में खानपान के आयोजनों के बाद आसपास के क्षेत्रों में जिस तरह से गंदगी फैलती है, उससे कई दिनों तक उस मोहल्ले और उसकी गलियों में रहना कष्टकर होता है। नए जमाने के खाने-पीने के पात्रों को अभी कोई चुनौती नहीं मिल रही है। इसलिए लोगों को यह सुविधाजनक और सस्ता मालूम पड़ता है। लेकिन आने वाले समय में इसके कई गंभीर परिणाम होंगे। जरूरत है किसी ऐसे आविष्कार की, जिससे सेहत बनी रहे और वह सुविधाजनक भी लगे।

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