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दुनिया मेरे आगे: पत्ता पत्ता बूटा बूटा 

यह सच है कि हम फूल-फल देने वाले वृक्षों और पत्तों को अधिक सराहते आए हैं, केवल पत्तों वाले वृक्षों और पौधों की तुलना में। पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जो वृक्ष फलते-फूलते नहीं हैं, उनके पत्ते भी हमें आकर्षक लगते हैं, मोहते हैं और उनमें तो कई ऐसे हैं, जिनमें औषधीय गुण भी होते हैं- पुदीना, तुलसी, करी पत्ता आदि ऐसे ही हैं।

वातावरण की शुद्धता के साथ पत्ते प्रकृति की खूबसूरती भी बढ़ाते है।

फूलों की तरह पत्तों का अपना एक वृहद संसार है। यह सच है कि हम फूल-फल देने वाले वृक्षों और पत्तों को अधिक सराहते आए हैं, केवल पत्तों वाले वृक्षों और पौधों की तुलना में। पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जो वृक्ष फलते-फूलते नहीं हैं, उनके पत्ते भी हमें आकर्षक लगते हैं, मोहते हैं और उनमें तो कई ऐसे हैं, जिनमें औषधीय गुण भी होते हैं- पुदीना, तुलसी, करी पत्ता आदि ऐसे ही हैं। मैंने तीन को हमेशा अपने आसपास रखने की कोशिश की है। इन दिनों भी, गमलों में ही सही, तुलसी, पुदीना और करी पत्तों को बालकनी में देखना अच्छा लगता है। अपनी पूर्वोत्तर की यात्राओं में चाय बागानों में भी अवसर मिलने पर जरूर ही जाता रहा हूं।

यह अकारण नहीं है कि हमारे आंगन वाले घरों में एक तुलसी पौधा भी हुआ करता था। पूजा-अर्चना के लिए औषधीय लाभ के लिए, और हां शोभा के लिए भी। बिना फल-फूल वाले वृक्ष और पौधे, सचमुच में एक शोभा भी होते हैं- अपनी हरियाली, अपनी छाया में। और बहुतेरे तो अपनी सुंदरता के कारण भी एक शोभा। तो पत्तों का यह संसार इस मामले में भी विशिष्ट है कि जहां फल-फूल वाले वृक्षों के पत्ते, एक संख्या में जाकर सीमित हो जाते हैं- फल-फूल देने वाले वृक्षों की संख्या में, वहीं पत्तों वाले वृक्षों की संख्या सहित, स्वयं सभी तरह के वृक्षों के पत्तों की संख्या सचमुच बहुत बड़ी हो जाती है।

यह भी कितनी अनूठी बात है कि कोई भी फूल किसी एक रंग में, या कुछ रंगों में खिलता है- और मुरझाने के समय ही इसका रंग कुछ परिवर्तित होता है, जबकि पत्ते पल पल परिवर्तित प्रकृति वेश की तरह परिवर्तित होते रहते हैं- कोंपलों के रंग दूसरे होते हैं, किसी पत्ते के यौवन और प्रौढ़ावस्था के कुछ और! जब वे झर भी जाते हैं और हवा में हिलते रहते हैं, या कहीं जाकर एक ढेर में बदल जाते हैं- तांबई, पीले, कुछ पीले-कुछ हरे, कभी अपनी धारियों का रंग भी उभार देते, तो भी वे मोहक लगते हैं- अपनी ही तरह से।

जब हवा चलती है, और वे सर सर सर सर करते हैं, तब वे ही तो हैं जो यह बता रहे होते हैं कि वृक्ष आनंदित हो रहा है और दूसरों को भी आनंदित कर रहा है। चित्रकला में, कविता में, कहां नहीं हैं पत्ते : प्रसाद जी ने लिखा है न, ‘बीती विभावरी जाग री/ अंबर पनघट में डूबो रही, तारा घट उषा नागरी/ खग कुल कुल कुल-सा बोल रहा किसलय का अंचल डोल रहा।…’ हां, किसलय एक सुखद प्रतीति मन में भर देते हैं।

यह भी सोचने की बात है कि पत्तों से कोई वन या अरण्य बन भी सकता है क्या? उत्तर यही होगा कि नहीं, संभव ही नहीं हैं, बिना पत्तों के। हम जानते हैं कि फूलों की खेती होती है, और वह खेती स्वभावत: बड़ी सुंदर भी लगती है। पर, वह भूमि को उस तरह आच्छादित नहीं करती, जैसी कि पत्तियां/ पत्ते करते हैं। हां, पत्ते अपने आकार-प्रकार में कितने छोटे-बड़े भी होते हैं। तुलसी के पत्तों, और कमल के पत्तों में आकार का कितना बड़ा अंतर है। और केले के पात! वे तो हाथी की याद दिला देते हैं। पत्ते हमारे जीवन में, हमारे अनुष्ठानों में, हमारे खान-पान में, भी किस तरह शरीक रहे हैं, और हैं। याद कीजिए आम के पत्तों की बंदनवार को, और केले के पत्तों पर भोजन के परोसे जाने को।

भला इसमें क्या शक कि बिना पत्तों के वृक्ष ढूंठ है। सूखा है, छाया-रहित है। पत्ते ही तो हारे-थके पथिकों को, श्रमिकों को, पशुओं को छतरी जैसी छाया देते हैं। एक धूप-छांही नहीं, खेल भी रचते हैं। लोक में, आदिवासी जीवन में तो पत्तों का अपना विशेष महत्त्व रहा ही है: वे छप्पर छानी में काम आए हैं, चिकित्सा में भी, खाना परोसने में भी, देह-सज्जा में भी और आज से न जाने कितने वर्षों पूर्व, पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम इलाके में एक व्यक्ति को, तपती जमीन पर, पत्ते तलुवों में बांध कर चलते हुए देखा था। वह दृश्य कभी भूला नहीं। अगर सही है, तो हाल में यह खबर भी कहीं देखी थी कि आदिवासियों ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए, महुए के पत्तों से ‘मास्क’ बनाया है।

अचरज नहीं, वनवासियों को, ग्रामवासियों को सबसे पहले वही दिखते हैं। आनंद में, दुख में, किसी कठिन परिस्थिति में और नगरवासी भी भले उनका उपयोग अधिकतर न करते रहे हों, सिवाय मसालों के रूप में, व्यंजनों में; पर पार्कों, उद्यानों में, घर की बगीची में, गमलों के पौधों में, सड़क किनारे के पेड़ों में, या आसपास कहीं दिख जाने वाले आम, नीम, पीपल, बरगद आदि के पत्तों में, उन्हें कब एक शीतल हरे-भरे सौंदर्य की प्रतीति नहीं हुई। और फूलों की तरह, उनमें से बहुतों की अपनी एक सुगंध भी होती ही है। बनी रहे वह सुगंध।

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