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दुनिया मेरे आगे: सार्थकता का जीवन

जिंदगी की सार्थकता पर बहुत सारे लोगों ने बहुत बड़ी-बड़ी बातें कही और लिखी हैं, लेकिन जीवन जीना सबको आ गया हो, ऐसा जरूरी नहीं। हालांकि यह भी नहीं है कि जीवन बंधे-बंधाए मानकों पर चलता है। फिर भी यह बहुत हद तक हम पर निर्भर करता है कि हमें अपना जीवन कैसे बिताना है।

Author Published on: July 9, 2020 2:46 AM
जिंदगी जिंदादिली का नाम है। इसको सकारात्मक सोच के साथ जीना सीखना होगा।

वीणा शर्मा
जीवन में पाना क्या है? डॉमिनिक टोप्पो हॉकी के प्रशिक्षक यानी कोच हैं। एक ऐसी शख्सियत, जिन्हें हॉकी खेलना जुनून की हद तक पसंद था, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वे अपने पसंदीदा खेल को जारी नहीं रख पाए। फिर खेलने की उम्र निकल गई। लेकिन उन्होंने इस बात के अफसोस में अपना बाकी बचा हुआ नहीं गंवाया। बल्कि खुद खेलने से बड़े मकसद को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने बच्चों और नौजवानों को हॉकी का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। अपनी इच्छा को उन्होंने उन बच्चों के जरिए पूरा करने का बीड़ा उठाया। उनके सिखाए सैकड़ों बच्चे आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बन चुके हैं।

वे उन सबमें खुद को खेलता हुआ महसूस करते हैं। मुझे तो यहां तक सुनने में आया कि उन्होंने हॉकी सीखने वाले बच्चों को जरूरी सामान मुहैया कराने के लिए अपनी जमीन तक गिरवी रख दी। उनके ऐसा करने की खबर से और ज्यादा लोगों को उनके दीवानेपन का पता चला। इससे इतर भी वे पिछले कई सालों से साइकिल चला कर चालीस किलोमीटर दूर गांव से रोजाना राउरकेला जाकर सुबह-शाम चार घंटे बच्चों को मुफ्त हॉकी की कोचिंग देते रहे हैं।

जिंदगी की सार्थकता पर बहुत सारे लोगों ने बहुत बड़ी-बड़ी बातें कही और लिखी हैं, लेकिन जीवन जीना सबको आ गया हो, ऐसा जरूरी नहीं। हालांकि यह भी नहीं है कि जीवन बंधे-बंधाए मानकों पर चलता है। फिर भी यह बहुत हद तक हम पर निर्भर करता है कि हमें अपना जीवन कैसे बिताना है। कुछ लोग दूसरों से छीना हुआ जीवन जीते हैं और कुछ लोग अपना सब कुछ लुटा कर अपने जीवन की नई परिभाषाएं रच देते हैं।

कुछ लोग अपने जीने का सामान इकट्ठा करने में लगे रहते हैं, भले ही वह अपनी जरूरत से काफी ज्यादा हो, लेकिन ऐसे लोग अपने मन का कभी कुछ नहीं कर पाते। लेकिन कुछ लोग अपनी जमा-पूंजी भी दूसरों की खुशी के लिए न्योछावर कर देते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे सही मायनों जीवन के अर्थ को जान जाते हैं।

अपने आसपास और चारों तरफ यह देख कर मुझे कई बार बेहद अफसोस होता है कि वर्तमान शिक्षा का उद्देश्य अधिक से अधिक पैसा कमाने और साधन जुटाने तक सीमित होकर रह गया है। आज धन ही मुख्य हो गया है। स्कूल से कॉलेज पहुंचने वाला हर बच्चा एक ऐसे पाठ्यक्रम में दाखिला लेना चाहता है जो उसे किसी मालदार पेशे के साथ जोड़ दे। प्रशासनिक अधिकारी या फिर किसी बड़ी कंपनी का सर्वेसर्वा बनना ही उनका सपना होता है।

ये वही पचास-पचपन की पीढ़ी वालों के बच्चे होते हैं जो अपनी हड्डियों को यह सोच कर गलाते हुए अंधाधुंध धन कमाते रहते हैं कि उनके बच्चे उनके बाद सुकून से जीवन जिएंगे। लेकिन आमतौर पर यह देखा गया है कि इस तरह इफरात में धन प्राप्त करने वाली संतानें गलत रास्तों पर चली जाती हैं। ह्यपूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचयह्ण। अगर आज इस उक्ति के आधार पर ऐसे पिता चलें तो बहुत-सी कालाबाजारी और भ्रष्टाचार से छुटकारा मिल सकता है।

पैसे कमाने की अंधी दौड़ दरअसल व्यक्तित्व को पूरी तरह से जीने नहीं देती। इसलिए आज हम सब किसी न किसी अन्य की जगह लिए हुए हैं। कोई गायक बनना चाहता था, लेकिन बैंक का मैनेजर बन गया। बैंक मैनेजर बन कर भले ही वह गाने के शौक को थोड़ा-बहुत पूरा कर ले, लेकिन वह अपने वर्तमान पद से उस तरह की संतुष्टि कभी भी नहीं प्राप्त कर पाएगा, जो उसे गायक बन कर मिल पाती। दूसरी ओर ऐसे भी बहुत लोग हैं जो अपने मन का करते हुए अपने जीवन को भरपूर रूप से मुकम्मल जीते हैं। गांधीजी जैसे कई अन्य विचारकों ने बड़े-बड़े काम किए। अपना बहुत कुछ त्याग दिया।

दरअसल, उन्होंने वही किया जिनके लिए वे बने थे। प्रकृति हरेक व्यक्ति को कोई न कोई कौशल देकर भेजती है या वह हासिल करता है, लेकिन बहुत सारे लोग उसे पहचान नहीं पाते, बल्कि दूसरी-दूसरी चीजों को अपने ऊपर ओढ़े रहते हैं।

समाजशास्त्री अब्राहम मैस्लो ने कहा था- दुनिया में बहुत कम लोग खुद को उस मुकाम तक पहुंचा पाते हैं, जो प्रकृति ने उनके लिए संजो रखा है। आज डॉमिनिक जैसे लोगों ने भले गांधी, भगतसिंह सरीखी प्रसिद्धि न पाई हो, भले ही आज कुछ लोगों के बीच ही उन्हें पहचान मिली हो, लेकिन सच यह है कि उन्होंने खुद को पा लिया। अभी भी ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें हम नहीं जानते। जिन्हें किसी व्यवस्था द्वारा कभी पुरस्कृत नहीं किया गया, लेकिन वे उसी लगन से अपना काम कर रहे हैं, जबकि आत्म संतुष्टि के मामले में वे उन तमाम महान लोगों में से तनिक भी पीछे नही हैं।

आज मनुष्य अधिकतर शारीरिक जरूरत की चिंता करता है, अपनी सुरक्षा के लिए परेशान होता है और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के पीछे पागल है, ताकि लोग उसे पहचानें। लेकिन ऐसे लोग कभी भी आत्म संतुष्टि को प्राप्त नहीं कर सकते। जीतते वही हैं, जिनकी नजर चोटी पर रहती है और वही चोटी पर पहुंच पाते हैं। उनके आनंद का स्तर भी वही होता है जो गांधी और बुद्ध को प्राप्त हुआ होगा।

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