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दुनिया मेरे आगेः गोद में कश्मीर

नाम उसका अच्छा खासा है यानी कि उर्वशी। पर रही वह पिन्नी की पिन्नी ही! इसका आप कोई भी अर्थ निकाल सकते हैं। साठ बरस पहले का वह लम्हा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया है।
Author August 4, 2017 02:45 am
कश्मीर

पदमा सचदेव

नाम उसका अच्छा खासा है यानी कि उर्वशी। पर रही वह पिन्नी की पिन्नी ही! इसका आप कोई भी अर्थ निकाल सकते हैं। साठ बरस पहले का वह लम्हा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया है। पिन्नी मुझे साइकिल के पीछे बिठा कर अमीरा कदल ले जा रही थी। हम पोलो व्यू बाजार में सूट देखने जा रहे थे। यानी कि मटरगश्ती। पोलो व्यू देखने से ही पेट भर जाता है। आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। हर चीज कश्मीरी हाथों की कढ़ाई से सजी मानो मुंह से बोलती थी। उस वक्त हम दोनों बारहवीं में पढ़ते थे। सामने लड़कियों का कॉलेज जैसे मन में ही बसा रहता था। तब मिस महमूदा प्रिंसिपल होती थीं। उन्हें कुछ कहना नहीं पड़ता था, बल्कि उनकी आंखें ही बड़ी होकर न जाने क्या-क्या बोलती थीं। मिस महमूदा, आपकी कितनी याद आ वही है, क्या कहूं! पोलो व्यू से हम भला कुछ न कुछ खरीदें, पर देखने में क्या जाता है, सो देख रहे थे।

मैं साइकिल के पीछे बैठी थी, यानी डबल सवारी! जब चौराहा आया तो पिन्नी ने पीछे मुंह करके कहा- ‘ओ बेवकूफ, मरजानी, हंसना शुरू कर दे। और वह खुद खिलखिला कर जोर से हंसी। चौराहे पर खड़ा पुलिस वाला विस्फारित नेत्रों से देखता रह गया। हम चौराहा पार कर गए। दूसरे चौराहे पर भी उसने हिदायत दी कि जोर से हंसना। हंसी वही और चौराहा पार हो गया। उसके बाद हम पोलो व्यू में दुकानें देख कर मस्त थे। पिन्नी की हंसी अब भी बरकरार थी। हम दुकानों में ताक-झांक कर रहे थे। कश्मीरियों के हाथ की कढ़ाई के क्या कहने! दिल खुल कर सामने बिछ जाता था। कॉलेज हम सफेद कपड़ों में यों जाते, जैसे किसी के घर अफसोस करने जा रहे हों। कॉलेज आज भी वही है, पर अतीत की वे यादें मन में पिछले साठ बरसों का हिसाब कर रही हैं।

आज भी मेरी पिन्नी वही है, शेरनी की शेरनी। श्रीनगर में अपने घर आए उसे महीना भर हो गया है। हम सभी चितिंत हैं। मैं सुबह रोज उसे पूछती हूं। पिन्नी तू है न! तो वह हंसना शुरू कर देती है, जिसका कोई जवाब नहीं। हाय मेरी शेरनी..! जो दो लोग इसने अपने बागों की रखवाली के लिए रखे हैं, उनमें से एक की मां ने यह कश्मीरी में कहा था। पिन्नी कश्मीरी जानती है। ये लफ्ज आज भी उसके कलेजे को छील कर रख देते हैं।
पिन्नी अपने बागों में उगे ट्यूलिप, डेफोडिल्स, नरगिस और न जाने किन-किन का हिसाब कर रही थी। 2004 की बात है। उसने कहा था- ‘जितना चाहे हिसाब कर ले, जब तक कश्मीरी मुसलमान से शादी न कर ले, तब तक बाग इसके कैसे हो सकते हैं।’ हाय रे वक्त! तुम कैसे इतने जालिम हो गए! कश्मीर जितना कश्मीरियों का है, उतना ही डोगरों का, जिन्होंने वहां आंखें खोली हैं। उनकी आंखों में वही बसा है।

मैं कुर्बान जाऊं दिल्ली के मुसलिम दोस्तों पर जो ईद पर सिवय्यां खिलाते हैं और दिवाली पर मिठाई। उन बच्चों पर जो बचपन में मुझे पम्मांटी कहते थे। पिन्नी के पिताजी महाराजा हरिसिंहजी के जमाने में रियासत के हर बाग, हर फूल, हर पत्ती, हर खुशबू को पहचानते थे। इसी तरह फूलों को भी प्रेमनाथ कोहली से मुहब्बत थी। महाराजा हरिसिंह के चहेते थे। अब मेरी पिन्नी अकेली पिताजी के फूलों को देख रही है, बाकी सब बहनों की शादियां दिल्ली में हुई हैं, पर यहां भी उन्होंने अपने घरों में छोटे-छोटे कश्मीर बना रखे हैं, जहां फूल ही फूल हैं।
मेरी पिन्नी ने वहीं अपना सर्वस्व भी खो दिया था। उसके पति को हम वीरा कहते थे, निहायत खूबसूरत आदमी। 1990 की पहली अगस्त को दो लड़के पिन्नी के गेट पर आए। टेबल टेनिस के पारंगत वीरा से कुछ टेबल टेनिस के बारे में पूछना था, उन्होंने पिन्नी से कहा। पिन्नी ने नहा रहे पति से कहा कि दो लड़के आपको पूछ रहे हैं। वीरा गेट पर जाकर उनसे बातें कर रहे थे। थोड़ी देर में गोलियों की आवाज आई और मेरी पिन्नी उजड़ गई। गोलियां एकदम सीने में लगी थीं। बरसों बाद पिन्नी फिर कश्मीर गई और अब हर बरस जाती है।
वहीं एक लड़का है फैयाज। वह पिन्नी को मौसी कहता है। उसके स्टाफ बाग देखते रहे। जब पिन्नी बैंक से पैसे नहीं निकाल सकती थी, तब उसने पिन्नी को कहा- ‘मौसी चिंता न करो।’ वह पैसे देता रहा।
फैयाज बेटा, कश्मीर तुम जैसे लोगों के हाथों में सुरक्षित है… हमेशा रहेगा। आमीन मेरी पिन्नी, मेरी दोस्त, मेरी हमवतन श्रीनगर के अपने घर में रात को तुम अकेली नहीं थी। मैं भी थी तुम्हारे साथ, अपने कश्मीर को गोद में लिटा कर उस लोरी सुनाती हुई।
इंशा अल्ला… ये दुर्दिन न रहेंगे! जब मरेंगे हिंदुस्तान और पाकिस्तान की मांओं के जवान बेटे। आमीन!

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