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दुनिया मेरे आगे: वे यायावर

पहले कभी जब मैं अपने मित्रों के साथ गांव के बाहर सैर पर निकलता था, तो गांव के बाहर खुले मैदान में यदाकदा एक दो तंबू नजर आते थे। भट्ठी जलती दिखती थी। उसमें लोहे की सलाखें गर्म कर वे दैनिक उपयोग में आने वाले विभिन्न प्रकार के सामान बनाते थे, जैसे कि हंसिया, कुल्हाड़ी, खुरपी, संड़सी आदि। पास में खड़ी बैलगाड़ी में इनका मोबाइल घर हुआ करता था। घर-घर घूमते-फिरते सामान की बिक्री करते नजर आते थे। सारा सामान ‘हैंड मेड’ होता था।

Author Published on: April 2, 2020 2:38 AM

हेमंत कुमार पारीक
पता नहीं वे कौन हैं? लेकिन शहर के चौराहों पर आजकल बहुतायत में दिखाई देते हैं। चौराहा एक चलता-फिरता बाजार-सा बन जाता है। गंदे-फटे कपड़ों में ये लोग सिग्नल पर दिखाई देते हैं। पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी को प्लास्टिक या कागज के छोटे-छोटे झंडे लिए नजर आते हैं। अमूमन बड़ी गाड़ियों के सामने झंडे लहराते हुए खरीदने की गुजारिश करते दिखते हैं। मैंने कई बार उन्हें देखा है, लेकिन आश्चर्य होता है कि समय के अनुसार उनके बेचने का सामान बदल जाता है।

उन लोगों में औरतें, आदमी और बच्चे दिखते हैं। कभी बूढ़ी औरतें हाथ में कलम लिए बेचती नजर आती हैं। उनके हाथों में ‘यूज ऐंड थ्रो’ वाले सस्ते पेन होते हैं, वेलेंटाइन-डे जैसे विशेष अवसरों पर हाथ में दिल के आकार के लाल-लाल गुब्बारे लिए होते हैं। गर्मियों में कार के शीशों पर लगाए जाने वाले काले-काले कवर होते हैं। कभी-कभी शनिवार के दिन बच्चों के हाथ में बाल्टी भी होती है। शनि का दान मांगते फिरते हैं। कभी छोटे-छोटे खिलौने और बार्बी डॉल जैसे शो-पीस लिए होते हैं, तो कभी नए साल के कैलेंडर होते हैं उनके हाथ में।

कौन हैं ये लोग? मन में विचार आता है। इतनी तेजी से तो बाजार का मिजाज भी नहीं बदलता, जितनी तेजी से इनके हाथों में रखे उत्पाद बदल जाते हैं। कहां से लाते हैं वे ये सब? कहां रहते हैं? शायद उनकी जीविका इन्हीं उत्पादों की बिक्री पर टिकी होती है।

पहले कभी जब मैं अपने मित्रों के साथ गांव के बाहर सैर पर निकलता था, तो गांव के बाहर खुले मैदान में यदाकदा एक दो तंबू नजर आते थे। भट्ठी जलती दिखती थी। उसमें लोहे की सलाखें गर्म कर वे दैनिक उपयोग में आने वाले विभिन्न प्रकार के सामान बनाते थे, जैसे कि हंसिया, कुल्हाड़ी, खुरपी, संड़सी आदि। पास में खड़ी बैलगाड़ी में इनका मोबाइल घर हुआ करता था। घर-घर घूमते-फिरते सामान की बिक्री करते नजर आते थे। सारा सामान ‘हैंड मेड’ होता था। बाजार की कीमत से कई गुना कम कीमत में बेचते थे। कुछ दिन दिखते वे लोग और फिर जाने कहां गायब हो जाते थे। वहीं मैंने लोहे को विभिन्न आकारों में ढलते देखा था। औरतें बड़े-बड़े घन चलाती थीं। और वे ही बाजार में सामान की बिक्री के लिए बैठी दिखती थीं। कभी-कभी सामान बेचने बस्ती में भी निकल आती थीं। खेती-किसानी करने वाले उनसे सस्ती दरों में सामान खरीदते थे, पर पढ़े-लिखे किस्म के लोग सीधे बाजार से ही सामान खरीदना पंसद करते थे। अभी भी आश्चर्य होता है कि कैसे इन छोटे-छोटे सस्ते सामान से उनकी गुजर-बसर होती होगी?

एक बार मैंने उनके डेरे में जाकर एक कैंची खरीदी थी। वह मजबूत कैंची आज भी मेरे पास है। यदाकदा धार लगवाने की जरूरत पड़ती है। उसी मैदान में मैंने उनमें से एक जवान आदमी से पूछा था, भाई, आप लोग कहां से आए हैं और इस प्रकार क्यों घूमते हैं?’ उनके छोटे-छोटे बच्चे गंदे कपड़ों में खेल रहे थे। उनकी तरफ देख मैंने उससे यह सवाल किया था। दरअसल, मन में कहीं न कहीं एक पीड़ा थी। सर्दी, गर्मी और बारिश में देखा करता था।… ऊंचा पूरा नौजवान था वह। राजस्थानी लहजे में बोला, हम लोग राणा प्रताप के वंशज हैं। महाराणा जंगलों में घूमते रहे। आखिरी दम तक दुश्मन से लड़ते रहे। घास-फूस की रोटियां भी खाईं, मगर कभी घुटने नहीं टेके।

सदियां बीत गईं इस घटना को। हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास में दर्ज हो गया, पर ये अभी तक उस परंपरा का निर्वाह करते चले आ रहे हैं। समय बदल गया। मगर ये अभी भी यायावर हैं। विमर्श का विषय है कि इनकी आने वाली संतानों का क्या होगा? आज हम सब सर्व सुविधायुक्त जीवन-यापन कर रहे हैं, पर उनकी हालत पर कोई गौर क्यों नहीं करता? आज जो बच्चे हैं कल वे इसी तरह घूमंतू जीवन जीते बड़े हो जाएंगे। क्या समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का इन्हें कोई अवसर मिलेगा? क्या इसी तरह वे भी अनपढ़ रह कर चौराहे पर लोगों से झंडा खरीदने का आग्रह करते फिरेंगे? फटे कपड़ों में खेलते इन बच्चों को देख कर मेरे मन में यही सवाल पैदा हुए थे। गंदे-मैले कपड़ों में वे बच्चे डेरे के आसपास मंडरा रहे थे। उस वक्त भी और आज भी जब हमें आजाद हुए एक अरसा हो गया, वे उसी तरह यायावर हैं। दुनिया भर की खाक छान रहे हैं। कभी चौराहे पर झंडे बेचते हैं, तो कभी बाजार में पारंपरिक हस्तकला से बने औजार!

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