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दुनिया मेरे आगे: शब्दों से परे

कई लोग तर्क देते हैं कि स्त्रियों के आराम के लिए उन्हें रसोई से निष्कासित किया जाता है, लेकिन कितनी स्त्रियां सचमुच आराम कर पाती हैं। निचले तबके की बात करें या फिर दफ्तर जाने वाली स्त्रियों की, उन्हें काम से छुट्टी नहीं मिलती।

Author Updated: December 5, 2020 8:36 AM
कंक्रीट का एक-एक निवास- उसे घर बनाने में एक महिला की सबसे बड़ी भूमिका होती है।

दिव्या प्रकाश

पिछले दिनों जब स्कॉटलैंड में महिलाओं को माहवारी से संबंधित जरूरत की वस्तुएं सरकार की ओर से मुफ्त देने की पहल हुई, तो यह चर्चा का विषय बना। यानी एक आधुनिक माने जाने वाले पश्चिमी देश में भी यह विषय खास महत्त्व का माना जाता है। लेकिन हमारे देश में इस मसले पर स्थिति क्या है, यह हम सबसे छिपा नहीं है। जब मैं कॉलेज में थी, तब माहवारी या मासिक धर्म के लिए लड़कियां आपस में इसके बारे में बताने या बात करने के लिए संकेत में तैयार कुछ शब्दों का इस्तेमाल करती थीं। यानी माहवारी को इंगित करते शब्द-युग्म। आधुनिक समझी जाने वाली लड़कियां भी इसका अपवाद नहीं थीं। ये शब्द सहज समझे जाते थे और ‘पीरियड’ जैसे शब्द संकीर्ण दृष्टि से देखे जाते थे। इस शब्द का प्रयोग करने वाली लड़कियों की खिल्ली उड़ाई जाती थी और कुछ समय के बाद वे भी मूल शब्द भूल कर परदेदारी में आ जाती थीं।

एक समानता इन नए नामों के बीच जो मैं देख पाती थी कि मेरे आसपास की सभी लोग माहवारी को एक अनचाहे मेहमान की तरह या फिर बीमारी की तरह चित्रित करते थे। जैसे कोई ‘गर्ल फ्लू’ कहता था, जिससे लड़कियों को होने वाली बीमारी का अर्थ ध्वनित होता था। ‘रेड आर्मी’ कह तो दिया जाता था, लेकिन इससे ऐसा लगता था मानो किसी सेना की बात की जा रही हो। कितनी ही लड़कियां ऐसे दिनों से गुजरते हुए अपने आप ही समूह से अलग हो जातीं और पूछने पर कहतीं- ‘अनटचेबल’। बिना इस शब्द के संदर्भों और सामाजिक त्रासदी को समझे हुए। कॉलेज खत्म होने तक भी लड़कियां इसके प्रति सहज नहीं हो पाई थीं। यह भय का, संकोच का, दुराव-छिपाव का कारण बना रहा, जिसके बारे में अगर बात करनी है तो ऐसे शब्दों की आड़ में, जिनका सामान्य अर्थ कुछ और हो।

अब भी स्थिति बदली नहीं है। सीधे ‘पीरियड’ कहने में आज भी स्त्रियों को शर्म आती है। वे इसके बारे में इशारों से, भेद भरी हंसी में लपेट कर कहती हैं। कॉलेज के जमाने के ये सहज शब्द घर-परिवार में ‘बैठ गई’ जैसी बातों में बदल गए। कुछ स्थानों पर ‘रसोई से बाहर हो गई’, ‘छिपकली गिर गई’ जैसे उनके अशुद्ध होने का बोध करवाने वाले शब्द-युग्म भी काम में लिए जाते हैं। स्त्री को कमतर करके देखे जाने का भाव सभी शब्दों से झांक रहा है। उनकी उपयोगिता पर जैसे एक विराम लग जाता है। शायद इसीलिए महत्त्वपूर्ण अवसरों पर वे ‘पीरियड’ से बचने की कोशिश करती हैं। इसके लिए भले ही उन्हें दवाई खाकर अपनी तारीखें टालनी पड़ें या लौंग, अजवाइन जैसी गर्म तासीर की चीजें खाकर ‘पीरियड’ पहले लाने की जुगत लगानी पड़े। जैविक घड़ी की धज्जियां उड़ जाती हैं।

उन संयुक्त परिवारों में, जहां लड़कियों या महिलाओं को ऐसे दिनों में रसोई में जाने की अनुमति नहीं होती, वहां कुछ स्त्रियां अपराध-बोध से ग्रस्त हो जाती हैं कि वे रसोई में नहीं जा सकेंगी। परिवार वालों के आराम में हर्जा होगा। कई दफा वे दूसरी स्त्रियों की ईर्ष्या का केंद्र भी हो जाती हैं कि काम से तीन दिन की छुट्टी उन्हें मिल गई। ऐसे में कोई उत्सव-त्योहार आ जाए तो दोनों ही भावों की अति देखने को मिलती है। ‘तेरा तो टाइम हमेशा बेटाइम आता है’ जैसी उक्तियां कितनी ही स्त्रियों को सुननी पड़ती हैं, जैसे यह उनके हाथ में हो। घर की किसी स्त्री द्वारा ‘पीरियड’ की घोषणा के बाद घर की उन स्त्रियों की आंखों में जिनकी माहवारी बंद हो चुकी है, ऐसा हिकारत का, उस स्त्री से दूर रहने वाला भाव कौंधता है कि वह स्त्री जमीन में गड़ जाती है। अचानक ही उसका सोफे पर, बिस्तर पर बैठना बंद हो जाता है और उसके लिए प्लास्टिक की कुर्सी निकल आती है, जिसे बाद में धोया जा सके। यह तो एक उदाहरण मात्र है। ऐसी न जाने कितनी ही पाबंदियां गिनाई जा सकती हैं।

कई लोग तर्क देते हैं कि स्त्रियों के आराम के लिए उन्हें रसोई से निष्कासित किया जाता है, लेकिन कितनी स्त्रियां सचमुच आराम कर पाती हैं। निचले तबके की बात करें या फिर दफ्तर जाने वाली स्त्रियों की, उन्हें काम से छुट्टी नहीं मिलती। सम्मिलित परिवारों में रसोई से बाहर के काम इन्हीं दिनों के लिए तय रहते हैं। यहां स्त्री की तथाकथित अपवित्रता के कारण वह रसोई में नहीं जा सकती, लेकिन काम से छुट्टी वह किसी प्रकार नहीं पा सकेगी। इसी तरह एकल परिवारों में चूंकि कोई अन्य काम करने वाला नहीं होता, वहां घर की स्त्री को काम संभालना ही पड़ता है।

इन शब्दों को बरतने के पीछे जो मंशा रही है, उससे जाहिर है कि ‘पीरियड’ को हेय दृष्टि से देखा जाता है, स्त्री देह की नैसर्गिक क्रिया होने के बावजूद। एक अदृश्य परिधि के भीतर उन्हें कैद कर दिया जाता है, जिसके बाहर वे अपने मन से नहीं आ सकतीं। हर घर में बुजुर्ग महिलाओं द्वारा बनाए गए कायदे हैं, जिन्हें चाहे-अनचाहे मानना पड़ता है। मैंने वे सारे नियम तोड़े हैं। अचार को छुआ तो वह खराब नहीं हुआ। बाहर घूमी तो ‘भूत’ नहीं मिला। मंदिर के भीतर गई तो ईश्वर के कोप का भाजन नहीं होना पड़ा। ‘पीरियड’ की वर्जना को तोड़ने के लिए स्त्री को ही पहल करनी होगी। असंगत नियमों को ध्वस्त करने के लिए सबसे पहले रहस्यात्मक शब्दों के आवरण से निकल कर मूल शब्द कहने की हिम्मत जुटानी पड़ेगी।

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