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दुनिया मेरे आगेः आंकड़ों में जीवन

सरकार हो या बाजार, इन सबके पास महामारी से मरने वालों का आंकड़ा है और उससे लड़ कर जीतने वालों का भी। बाजार इन आंकड़ों को अपने हित में भुनाने में लगा है। वहीं लोक कल्याणकारी कही जाने वाली सरकारें भी इसी पथ पर अग्रसर हैं।

विचारबढ़ती आबादी के बीच इंसान एक आंकड़ा बन गया है।

भावना मासीवाल

कई बार ऐसा लगता है कि मौजूदा समय में आम आदमी आंकड़ों से अधिक कुछ नहीं रह गया है। सारे संबंध, रिश्ते-नाते इस दौर की दुनिया में दूर होने पर मजबूर हो गए हैं। एक ओर तो हम बेफिक्र और निडर होकर घूमते लोगों को देखते हैं, जिनमें इस महामारी के प्रति विस्मयसूचक भाव है कि भला यह भी कोई बीमारी है! दूसरी ओर हर दिन इसी दौरान किसी अपने को आंकड़ा बन जाते देखते हैं। इन आंकड़ों में कितने लोग बीमारी से मरे तो कितने उसका समुचित इलाज न होने से, यह अलग प्रश्न है। मगर सरकारी आंकड़ा दोनों ही बने। आंकड़ों का क्या है! आज ज्यादा है तो कल कम। किसी के लिए यह महज एक आंकड़ा है तो किसी की जिंदगी, जिसमें किसी के अपने, सपने, खुशियां, इच्छाएं… सभी कुछ को इस दौर ने महज एक आंकड़ा बना दिया। हालात यहां तक पहुंचे कि अपनों से अंतिम मिलाप तक के मामले में इन आंकड़ों को अनुमति नहीं मिली।

जिंदगी भी कितनी अजीब है! कल तक जो जीवंत व्यक्तित्व था, जिसके होने से हर तरफ रौनक थी, जिसकी आवाज की गूंज भर से हर कोई उसे पहचान लेता था, आज वे सब खामोश और महज सरकारी आंकड़ा बन कर रह गए हैं। सरकारों का क्या है? उनके लिए चुनाव के समय आदमी सिर्फ एक वोट होता है तो वही मरने के बाद सरकारी आंकड़ा। वह भी जब गिनती करने की व्यवस्था लागू हो, तब। वोट और आंकड़ों का यह खेल भी मनुष्य के जीवन-चक्र बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था के समान चलता रहता है और हम इसका हिस्सा बने आजीवन इसी चक्र की परिक्रमा करते रहते हैं।

आंकड़ों का पूरा खेल विश्व में खेला जाता है। कहीं आरोप तो कहीं प्रत्यारोप के रूप में। इसमें भी दिखने वाले आंकड़े और बोलने वाली सरकारें होती हैं। एक ओर महामारी का डर दूसरी ओर राजनीतिक उठापटक में खुद को बेहतर और दूसरे को नीचा दिखाने की धर-पकड़। इस क्रम में आंकड़ों का बढ़ते जाना और सरकारों का शोक मनाना। फिर उसे ऊंचा और नीचा करने की प्रक्रिया में लग जाना। इस महामारी में यह सब आम बात हो गई है।

इस डर से आम आदमी ग्रस्त है, मगर नेताओं के आए दिन निकलते काफिलों को कोई डर नहीं है। आम आदमी सोच में पड़ा है कि महामारी है या क्या है! इस उधेड़बुन में कोई सोचता हुआ आदमी भी कुछ समय बाद सरकार का एक आंकड़ा बन जाता है और यह उधेड़बुन की प्रक्रिया इसी तरह आम आदमी में चलती हुई आगे बढ़ती जाती है और सरकारी आंकड़ों का हिस्सा बनती जाती है। सरकारें रोटी की समस्या से अधिक आंकड़ों के गणित को महत्त्व देती है।

दूसरी ओर, आंकड़ों के बढ़ने से भी अधिक डर उसे अपनी कुर्सी को बचाने का होता है। आंकड़ों को तो फाइलों में घटाया और बढ़ाया जा सकता है। अब आंकड़े सवाल नहीं कर सकते, धरना नहीं दे सकते। अब वे वोट भी नहीं रहे, सिर्फ आंकड़ों में सिमट कर रह गए हैं। सरकारों के लिए हर आदमी एक आंकड़ा और उसकी जिंदगी एक डेटा भर है। आंकड़ा आया, उसने डेटा दिया और फिर आंकड़ा बन कर चला गया। उसका क्या उपयोग होता है, यह आंकड़ा बन गए लोगों को शायद पता भी नहीं चल पाता है। लोगों का अस्तित्व, जो जीवन भर जीवित रहने के लिए संघर्ष करता रहा, वह भी आज आंकड़ा बन गया है।

हालांकि यह पहले भी अनेक स्तरों पर होता रहा है, लेकिन अब तक यह लोगों की चिंता में शुमार नहीं होता रहा, उम्मीद और इंतजार का सबब बना। वह आंकड़ा पैदा होने का हो या मरने का या फिर सरकारी कागजों में उनके होने का। लेकिन अब पूरे वजूद का महत्त्व सिर्फ व्यक्ति के आंकड़ा बन जाने में है। इन्हीं आंकड़ों का पूरी दुनिया में संश्लेषण, विश्लेषण होता है और फिर निष्कर्ष निकाला जाता है और इसी के आधार पर अपनी-अपनी व्यवस्था को बेहतर बताया जा रहा है। आंकड़ों की भी अजीब दुनिया है। इसके बढ़ने पर कहीं खुशी होती है तो कहीं गम। कहीं यही आंकड़े पूरी व्यवस्था को बदल देते हैं और कहीं व्यवस्था बन जाते हैं।

ये आंकड़े कोई और नहीं, हम सब ही हैं। इस बदलते दौर में एक आम आदमी सत्ता और व्यवस्था के लिए सिर्फ एक संख्या है। पहले यह फाइलों में दबी होती थी और आज तकनीकी व्यवस्था में कंप्यूटर की फाइलों में दर्ज और एक क्लिक पर उपलब्ध है। इनकी भी अजीब कहानियां हैं। जो सरकार के लिए आंकड़ा है, उसका अपना जीवंत व्यक्तित्व, परिवार, रिश्तेदार और बहुत सारे अपने हैं। इनकी कहीं धड़-पकड़ होती है तो कहीं खरीद-फरोख्त, कहीं इन पर सट्टा लगता है, तो कहीं इनसे सेंसेक्स बढ़ता-घटता है। आंकड़े अर्थव्यवस्था के पहिए हैं। इससे पूरा बाजार भरा है।

सरकार हो या बाजार, इन सबके पास महामारी से मरने वालों का आंकड़ा है और उससे लड़ कर जीतने वालों का भी। बाजार इन आंकड़ों को अपने हित में भुनाने में लगा है। वहीं लोक कल्याणकारी कही जाने वाली सरकारें भी इसी पथ पर अग्रसर हैं। कभी-कभी सोचती हूं कि क्या कभी इन आंकड़ों की दुनिया से अलग कोई इंसान को इंसान समझ पाएगा! या हर व्यवस्था इन्हें आंकड़ों के रूप में ही मानती और जानती रहेगी! जरूरी है कि इनसे इतर मनुष्य को मनुष्य समझा जाए।

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