दुनिया मेरे आगे: सहयोग का समाज

यह किस्सा किसी एक किसान का नहीं, पूरे देश भर के किसानों का है। आए दिन यहां अलग-अलग कारणों से कई अर्थियां उठती हैं। अंतर केवल इतना होता है कि हर कोई उस किसान की तरह पूर्व तैयारी नहीं कर पाता, जो जाते-जाते अपनी अर्थी का सामान खुद खरीद कर अपने परिवार को दे जाए।

Farmers Protest, Farm Laws, SC, NDA, BJPकेंद्र में पीएम मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के लाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली में डेरा डालकर आंदोलन पर बैठे किसान। (फोटोः पीटीआई)

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

वह घर से यह कह कर निकला था कि थोड़ी दूर पर पड़ने वाले कस्बे से घर के लिए कुछ चीजें खरीदने जा रहा है। कोई नहीं समझ पाया कि वह घर से नहीं, दुनिया से निकला था। उसने जाते-जाते जो चीजें घर भेजी थीं, उसमें अर्थी का सामान था। घर में खाने के लाले पड़ गए थे। साहूकारों की धमकियां पल-पल बेचैन कर रही थीं। दरअसल, उसने ये सामान अपनी ही अर्थी को सजाने के लिए खरीदा था। घर में एक कॉपी पड़ी थी, जिसमें किस-किस साहूकार से कितना-कितना रुपया उधार लिया है, दुकान वाले से खेती के लिए छिड़काव की दवाइयों, बीज और न जाने कितने तरह के लिए गए कर्ज के संदर्भ में चालीस-पचास लोगों की एक सूची थी। उसे पता था कि मरने के बाद अर्थी के सामान के लिए घर वाले बहुत परेशान होंगे। जाते-जाते उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था। इसीलिए वह अपनी विदाई की तैयारी खुद कर गया।

यह किस्सा किसी एक किसान का नहीं, पूरे देश भर के किसानों का है। आए दिन यहां अलग-अलग कारणों से कई अर्थियां उठती हैं। अंतर केवल इतना होता है कि हर कोई उस किसान की तरह पूर्व तैयारी नहीं कर पाता, जो जाते-जाते अपनी अर्थी का सामान खुद खरीद कर अपने परिवार को दे जाए। पश्चिमी राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तर-पश्चिम मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश में रायलसीमा, तेलंगाना में दक्षिणी तेलंगाना तथा महाराष्ट्र के मराठवाड़ा एवं विदर्भ प्रदेश सूखे और अकाल से मरने वालों की दास्तान चीख-चीख कर बयान करते हैं।

सूखाग्रस्त क्षेत्र में रहने वाले लोग वहां की आबोहवा से इतने वाकिफ होते हैं कि उनके दिल में सूखे और अकाल की धड़कनें साफ सुनाई दे जाती हैं। इनकी पीड़ा मामूली नहीं है। वे बताएं तो क्या बताएं? कभी मानसून की अनिश्चितता तो कभी वर्षा की विभिन्नता, कभी अनियमित चक्रवात तो कभी तापमान में वृद्धि इन्हें तोड़ कर रख देती है। वनों का विनाश, बंजर भूमि में वृद्धि, मरुस्थलीकरण, मिट्टी की संरचना, जल-प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया जाना, जीव नदियों का अभाव और ऊपर से सरकार की उदासीनता जैसे ऐसे कई कारण हैं जो इनसे जीने के हालात छीन लेते हैं और कई बार मरने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसी स्थितियों में आदमी जिए तो जिए कैसे?

अकाल या सूखा केवल एक समस्या नहीं है। यह तो समस्याओं का बहुत बड़ा पैकेज है। इस क्षेत्र के किसी किसान के साथ बैठ कर उनसे कुछ देर बात करने पर पता चलता है कि इनका जीवन कितनी मुश्किलों से गुजरता है। वास्तव में वे अकाल और सूखे के साथ जिंदगी गुजर-बसर नहीं करते। वे जिंदगी काटते हैं मौत का अभिशाप बनी परिस्थितियों के साथ, उसके बीच रहते हुए। बाकी देश-दुनिया के दूसरे हिस्से के आम समाज में जो लोग छोटी-छोटी चीजों की कमी की वजह से खुद को जीने लायक नहीं मानते हैं, उन्हें कभी इस इलाके के लोगों के पास आकर बैठना चाहिए।

कुछ पल गुजारना चाहिए। तब पता चलेगा कि वास्तव में जिंदगी होती क्या है। ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं कि यहां वे सिंचाई के लिए जल की बूंदों के लिए तरसते हैं। पीने के पानी के लिए मरते हैं। खाने के दाने-दाने के लिए तड़पते हैं। अपने मवेशियों के चारे के लिए बिलखते हैं। बीज, खाद जैसे कच्चे माल की कमी से परेशान रहते हैं। महंगाई की मार से कराहते रहते हैं। जल-जंगल-जमीन की आह भरी करवटों से बेचैन रहते हैं। कभी बिजली, बेरोजगारी और अनब्याही बेटियों को लेकर पल-पल घुटते, गिरते, मरते रहते हैं।

वैसे तो कृषि के नाम पर कई दिवस मनाए जाते हैं। इस साल भी यह दिवस आया और गुजर गया। यह सब किताबों में, सभाओं-सम्मेलनों और चाय-बिस्कुट खाने के लिए अच्छा लगता होगा, किसानों के लिए तो ये दर्द भरे दिन होते हैं। वह कथनी नहीं, करनी के रूप में इन दिवसों को देखना चाहता है। वह चाहता है कि जो बड़े-बड़े सपने उसे दिखाए जाते हैं, वह न दिखाए जाएं, बल्कि छोटी-छोटी सहायता कर दी जाए।

मसलन, कोई उसे बताए कि कृषि जलवायु के आधार पर कौन-सी फसल डाली जाए, वैकल्पिक कृषि के रूप में शुष्क कृषि कैसे करें, कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए कपास, गेहूं, ज्वार की किस किस्म का चयन करें, विशेष सिंचाई साधन जैसे टपक सिंचाई और छिड़काव सिंचाई के लिए क्या करें, नहरों की सतह का पक्काकरण, उचित जल-क्षेत्र प्रबंधन, जल संरक्षण, मिट्टी-संरक्षण, चारे की बचत, बंजर भूमि का विकास, गैर-कृषि वैकल्पिक उपायों, जैसे पशुपालन और डेयरी उद्योगों का विकास, लघु तथा कुटीर उद्योग का विकास कैसे करें… आदि के बारे में बताया जाए। किसान भारत के अन्नदाता हैं। उन पर भरोसा कर उन्हें आर्थिक सहायता करने की आवश्यकता है। वे भूखे रह कर देश का पेट भरते हैं। क्या हम उन्हें अच्छा खाते-पीते नहीं देख सकते हैं?

थोड़ा-सा प्यार, थोड़ा सा स्नेह, उनके प्रति थोड़ा-सा ध्यान न जाने कितने किसानों को बचा सकता है। यह वक्त की जरूरत है कि हम हाथ बढ़ाएं और हमें जीवन देने वालों को भी जीने का भरपूर मौका मिल सकने के लिए अपनी सीमा में कुछ करें।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: धूप की जिजीविषा
2 दुनिया मेरे आगे: रिश्तों की संवेदना
3 दुनिया मेरे आगे: असीम प्रकृति
ये पढ़ा क्या?
X