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दुनिया मेरे आगे: औपचारिकता का यथार्थ

पिछली सदी के सत्तर के दशक की बात है। एक सख्त मिजाज प्राचार्य मातहतों को आसानी से आकस्मिक अवकाश नहीं देते थे। एक तेज किस्म के प्राध्यापक ने इसका लाजवाब तोड़ निकाला। वे जैसे ही अवकाश का आवेदन लेकर उनके कक्ष में जाते तो सबसे पहले उनकी वेशभूषा, टाई और उसकी ‘नॉट’ की तारीफ करते। प्राचार्य खुश हो जाते और तब वे आवेदन देते और उनका आवेदन तत्काल स्वीकृत हो जाता।

विचार और सोच।

औपचारिक रूप से कही गई बात दरअसल मुंह दिखाई ही होती है। अक्सर किसी को देख कर बातचीत शुरू करने के लिहाज से लोग कह देते हैं कि ‘आज तो आप जंच रहे हैं’, यानी बहुत प्रभावी और दूर से ही आकर्षक लग रहे हैं। औपचारिकतावश कही गई इस तरह की बात को आप गंभीरता से ले लेंगे तो आफत मोल ले लेंगे। जरा सोचिए कि ऐसा कहने वाला मुमकिन है कि आपका मजाक उड़ा रहा हो और ताना मार रहा हो! मैंने एक मित्र लेखक से उन्हीं के एक मुंहलगे और परिचित व्यक्ति को उनसे यह कहते हुए सुना है कि वे क्या खूब लिखते हैं।

ऐसा लगता है कि उनके लिखे जाने के बाद कागज जलने लगा हो! अब आप बताइए कि क्या आपने ऐसा लेखन देखा है? मैंने तो अभी तक नहीं देखा। सुना जरूर है कि जब कालिदास, सूर या तुलसी या फिर शेक्सपियर या मिल्टन लिखते थे तो कागज से आग निकलने लगती थी। इसका सीधा-सा अर्थ है कि लेखन ऐसा प्रभावशाली हो कि वह अपना असर छोड़े। तभी वह सार्थक लेखन कहलाएगा।

एक जुमला और है जो औपचारिक रूप से अक्सर कहा जाता है। जब कोई आपसे मिलता है तो रस्म-अदायगी के लिए आप कहते हैं कि आपको उससे मिलकर बेहद खुशी हुई। जरूरी नहीं कि ऐसा हुआ ही हो। ऐसे कथन को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए और न ही इसे सच माना जाना चाहिए। बरसों से यह रस्म चली आ रही है। आप यह तो कहने से रहे कि उससे मिल कर आपको दुख या कष्ट हुआ। ऐसा कहना न कहने में अच्छा लगेगा और न ही सुनने में। मैंने देखा है कि हाथ मिलाते वक्त भी कुछ लोग तटस्थ बने रहते हैं। न गर्मजोशी दिखाते हैं और न मुस्कराते हैं।

स्थितप्रज्ञ ही बने रहते हैं। ऐसे लोग शायद औपचारिकता में विश्वास नहीं करते। मैंने अपने एक मित्र को अपने मेहमान का बेहद गंभीर अंदाज में लच्छेदार शब्दों के साथ स्वागत करते देखा। फिर मेहमान के मुंह फेरते ही आंख मार कर उनका मजाक-सा उड़ाते भी देखा। संभव है उन्होंने औपचारिकतावश तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी थी, पर शायद उनकी भावना में वह गरमाहट नहीं थी जो सहज रूप से व्यक्त आदर में होती है।

आदमी जो कह रहा है, उसके द्वारा वह आदर व्यक्त कर रहा है या टांग खिंचाई कर रहा है, यह पता लगाना मुश्किल है। हो सकता है वह एक साथ दोनों काम कर रहा हो। अमेरिका में जब सुबह दो अजनबी एक दूसरे से आते-जाते टकराते यानी मिलते हैंं तो कहते हैं- ‘हाऊ डूइंग’ और ऐसा कहते-कहते तेजी से सड़क पार करते हैं। वे जानते हैं कि इसका जवाब नहीं मिलेगा और वे इंतजार भी नहीं करते। जवाब देने का समय ही किसी के पास नहीं है।

सिर्फ औपचारिकता वह कहा जाता है। आशय यही है कि वे एक-दूसरे से पूछें कि उनका काम कैसा चल रहा है और वे ठीक तो हैं। इसी तरह अगर आप भोजन कर रहे हों और किसी परिचित के आ जाने पर आप महज शिष्टाचारवश और औपचारिकतावश कहें कि आइए, भोजन कीजिए। इसके बाद वह सचमुच आ ही जाए और आपकी थाली में बैठ कर भोजन करने लगे तो आप अवाक रह जाऐंगे! आपको अंदाजा भी नहीं था कि वह आपकी कही बात को सच मान बैठेगा। जाहिर ऐसी बातें कई बार औपचारिकता, सौजन्यता और शिष्टाचारवश कही जाती हैं, लेकिन उसके बाद प्रतिक्रिया पर हमारा नियंत्रण नहीं भी हो सकता है।

पिछली सदी के सत्तर के दशक की बात है। एक सख्त मिजाज प्राचार्य मातहतों को आसानी से आकस्मिक अवकाश नहीं देते थे। एक तेज किस्म के प्राध्यापक ने इसका लाजवाब तोड़ निकाला। वे जैसे ही अवकाश का आवेदन लेकर उनके कक्ष में जाते तो सबसे पहले उनकी वेशभूषा, टाई और उसकी ‘नॉट’ की तारीफ करते। प्राचार्य खुश हो जाते और तब वे आवेदन देते और उनका आवेदन तत्काल स्वीकृत हो जाता। यह बात वे स्टाफ रूम में सभी को चस्का लेकर सुनाते। तो कहने का आशय यह कि मुंह पर की गई तारीफ भी झूठी हो सकती है। इसे भी औपचारिक और स्वार्थ के लिए की गई प्रशंसा ही माना जाना चाहिए।

औपचारिकता हकीकत नहीं है। सिर्फ रस्म अदायगी है, लोकाचार है, सौजन्यता है, शिष्टाचार है। इसलिए औपचारिक रूप से किसी के भी द्वारा कही गई किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। वह केवल कहने के लिए कही गई बात हो सकती है। कहने वाला भी जानता है कि उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा। सामाजिक रूप से की गई तारीफ ही अच्छी लगती है और सभी को सुहाती है, भले ही वह झूठी हो। सामाजिक रूप से बुराई करके कौन विवाद मोल ले। तभी तो औपचारिकता को सकारात्मक माना जाता है। लेकिन हर स्थिति में उसे गंभीरता से लेना किसी को असहज स्थिति में जरूर डाल दे सकता है।

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