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दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व के औजार

हंसना बुरी बात नहीं है। जीवन को लय-ताल देने के लिए, इसे सुर में बांधे रखने के लिए हंसी की अहमियत से सब वाकिफ हैं। खिलखिलाहट हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दवा और इलाज का काम करती है।

women fun, jokes of womenखुशी में खिलखलातीं युवतियां।

संगीता सहाय
हाल के दिनों में महिलाओं के ऊपर बनने वाले चुटकुले, कार्टून और वीडियो की बाढ़ आ गई है। इनमें उनकी कम समझ, काम न करने की प्रवृत्ति, रहन-सहन, चलने, बोलने और व्यवहार के तरीकों सहित पूरी जीवनशैली को ही हास्य का विषय बना दिया गया है। ज्यादातर में उन्हें कमअक्ल और फैशन का आदी बता कर ही मजाक उड़ाया जाता है। महामारी के इस दौर से पैदा हुए बैठा-बैठी ने इसे और बढ़ावा दिया है। खाली बैठे लोग मनोरंजन को समाज के आग्रहों और कुंठाओं के सहारे जीने और उसे ज्यादा मजबूत करने के काम में लगे हैं।

हंसना बुरी बात नहीं है। जीवन को लय-ताल देने के लिए, इसे सुर में बांधे रखने के लिए हंसी की अहमियत से सब वाकिफ हैं। खिलखिलाहट हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दवा और इलाज का काम करती है। लेकिन क्या इसकी कीमत के रूप में किसी की जीवनशैली और पहचान को दांव पर लगाया जा सकता है? पिछले दिनों शराब की दुकानों के खुलने के बाद उनके आगे लोगों की मूर्खताभरी आपाधापी और भयानक भीड़ के दृश्य को पूरे देश ने देखा। लग रहा था जैसे इन तमाम लोगों के लिए शराब से बढ़ कर कुछ है ही नहीं।

नियम-कानून की धज्जियां उड़ाते लोग हर तरफ दिखे। और ऐसा करने वालों में लगभग हर वर्ग के लोग शामिल थे। सुर्खियों में उपहास भरा पड़ा था। पर खबरों के बीच ‘हजारों पुरुषों के बीच शराब खरीदती एक महिला’ की खबर भी प्रमुखता से चली। शराब की बोतलें ले जाते एक ने लड़के ने कहा कि वह अपनी पत्नी के लिए शराब ले जा रहा है… अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो उसकी पत्नी उसे घर में घुसने नहीं देगी।

ऐसी बहुप्रसारित खबरों के जरिए शराब के करोड़ों पुरुष तलबगारों के साथ औरतों को भी बैठाने की कोशिशें की गई। लोग हास-परिहास और सामान्य तरीके से भी सहजता से कहते दिखे कि हर सामाजिक बुराई में महिला समान रूप से भागीदार होती है। जबकि इस तथ्य से पूरा समाज वाकिफ है कि शराब या अन्य किसी प्रकार का नशा कौन लोग करते हैं और उसका दंश किसे झेलना पड़ता है।

समाज के हर स्तर पर अपनी उम्र के विभिन्न पड़ाव को पार करती औरत मन को भेदते अनगिनत विभेदों, हादसों और सवालों के पड़ाव को भी पार करती है। आमतौर पर वह उन्हें जीवन का अंग और सामाजिक बनावट का हिस्सा मान कर ही जीने की आदी होती है। और उसकी इसी चुप्पी के कारण पुरुषों की शर्मनाक गतिविधियों के लिए भी उसे समान रूप से दोषी ठहराने की साजिशें की जाती रही हैं।

समाज बड़ी ही सहजता से ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है’, ‘औरत न चाहे तो उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता’, ‘बलात्कार और छेड़खानी के लिए औरत के कपड़े और फैशन जिम्मेदार हैं’, ‘दहेज लेने की सबसे बड़ी दोषी औरत ही होती है’, ‘अच्छी औरतें घर की मर्यादा नहीं लांघती’, ‘शर्म ही औरत का गहना है’, ‘औरत बोलते अच्छी नहीं लगती’ जैसे अनगिनत मिथ्या और जकड़न भरे उपालंभों का निर्माण करता रहा है।

इन संदर्भों को आधार बना कर औरत को ही उसके साथ होने वाले तमाम अपराधों की वजह बना दिया जाता है। यह सब सदियों से भिन्न-भिन्न तरीकों से होता रहा है। वर्तमान में कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट के संजाल के कारण खुली राहें इसमें अहम् भूमिका निभा रहीं हैं। यह एक मानी हुई बात है कि बड़े से बड़े झूठ को भी अगर लगातार सत्य कह कर प्रचारित किया जाए तो वह झूठ भी सत्य प्रतीत होने लगता है। समाज में लंबे समय से एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर हावी होने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल किया जाता रहा है।

यह एक कड़वी हकीकत है कि अगर अपनी भ्रमित और निरंकुश मर्दानगी की नकारात्मक प्रवृत्तियों से अधिसंख्य पुरुष वर्ग मुक्त होने की सोच ले तो हमारे आसपास व्याप्त तमाम मालूम, नामालूम सामाजिक व्याधियां अपने आप ही समाप्त होने लगेंगी। बात हम लड़कियों, महिलाओं के ऊपर फब्तियां कसने की करें या बलात्कार और छेड़खानी की, बात-बेबात मरने-मारने की या लोगों को लूटने-पीटने की, शराब, गुटका, पान और अन्य प्रकार की नशाखोरी या उसके बाद किए जाने वाले अपराधों की, यत्र-तत्र थूकने और गंदगी फैलाने की या मूर्खतापूर्ण मर्दानगी के प्रदर्शन से वशीभूत होकर कहीं पर भी मूत्रत्याग की और बगैर वक्त और स्थान की परवाह किए अनावश्यक घूमने-फिरने और अड्डेबाजी की।

संभव है इनमें कुछेक मामलों में कुछ हद तक लड़कियां भी भागीदार बनती हैं, पर वह ऐसा खुद को पुरुषोचित गुणों से युक्त होने के भ्रम में करती हैं। इस दौर में जबकि सर्वशक्तिमान प्रकृति ने एक बहाना-सा बना कर अपने ऊपर उड़ेले गए मानवजनित मलिनताओं को धोने का रास्ता निकाला है, ऐसे में क्या ही अच्छा हो जब तमाम गलत प्रवृत्तियों से युक्त लोग भी घर के स्वच्छ वातावरण में उन पर विचार करें और उनसे उबरने का रास्ता खोजें, ताकि साफ होती नदियों की तरह ही उनके आचरण और मन का मैल भी उतरने लगे।

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