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दुनिया मेरे आगेः निज भाषा की भूख

हिंदी के बढ़ते वैश्विक दबदबे और संसार भर के विश्वविद्यालयों में हिंदी का पढ़ना-पढ़ाना अच्छा है, लेकिन उससे भी अच्छा ये हो कि वर्तमान और आने वाले युवा को उसकी बुद्धि और परिवेश के अनुसार निर्भय और स्वच्छंद भाषाई प्रांगण अपने राष्ट्र में मिल सके।

Promotionहिंदी को आगे बढ़ाने की आवश्‍यकता। फाइल फोटो।

निशा यादव

हर रोज की तरह उस दिन भी सुबह जब लैपटॉप पर मैं ‘गूगल कक्षा’ से जुड़ी तो विद्यार्थियों में भाषाई वाद-संवाद जोरों पर था। यहां तक की मेरे आने का भी किसी को भान नहीं हुआ। मैं कुछ पल चुप्पी साधे बैठी रही। एक छात्र कह रहा था- ‘कोई कुछ भी कहे, पर हिंदी के सहारे आज नौकरी मिलनी मुश्किल है। हिंदी की स्थिति तो इसी से पता चलती है कि ‘कस्टमर केयर’ पर फोन करो तो भी पहले नंबर पर अंग्रेजी में बात कहने का विकल्प दिया जाता है।’

उसके चुप होने से पहले ही एक छात्रा ने उसका समर्थन करते हुए पुख्ता साक्ष्यों के साथ अपना मत रखा- ‘कहीं बाहर जाने की जरूरत क्या है! मैडम ने भी बताया था कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा बहुत मुश्किल होती है और उसमें निन्यानबे फीसद अंग्रेजी माध्यम के बच्चे पास होते हैं!’

देश के युवाओं के सामने छाया ये भाषाई कोहरा उनके सामर्थ्य को न केवल चुनौती देता नजर आ रहा है, बल्कि समय के साथ ही उसे कुचलता भी जा रहा है। हिंदी भाषी होना अपने ही घर में यानी कि देश में एक नागरिक को रोजगार की दृष्टि से असुरक्षा के भाव से ग्रस्त कर रहा है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम हिंदी के विकास के कसीदे किस आधार पर गढ़ सकते हैं?

हिंदी के प्रचार या उसके विकास को लेकर उसे विश्व की तीसरे नंबर की बोली जाने वाली भाषा बताना, अनेक देशों में हिंदी बोला जाना या फिर करीब एक सौ चालीस विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाना बता कर और गूगल सहायता, अमेजॉन, फ्लिपकार्ट और फेसबुक-ट्विटर जैसे सोशल मीडिया मंचों पर हिंदी के प्रयोग से भले हम हिंदी के सुनहरे भविष्य की कामना कर लें, लेकिन इस सच की ओर से अपनी आंखें नहीं मूंद सकते हैं कि हमने रोजगार या शिक्षा के माध्यम से हिंदी को कितना जोड़ कर रखने की कोशिश की है।

हिंदी के बढ़ते वैश्विक दबदबे और संसार भर के विश्वविद्यालयों में हिंदी का पढ़ना-पढ़ाना अच्छा है, लेकिन उससे भी अच्छा ये हो कि वर्तमान और आने वाले युवा को उसकी बुद्धि और परिवेश के अनुसार निर्भय और स्वच्छंद भाषाई प्रांगण अपने राष्ट्र में मिल सके। इससे उनकी विकासशील बुद्धि न केवल उतरोत्तर विकसित होगी, बल्कि उनके मानसिक द्वंद्ध की कालिमा हट जाएगी और वे भविष्य की ऊहापोह से बाहर निकल पाएंगे। यों किसी भी भाषा को प्रतिभा की कसौटी मानना उचित नहीं है।

इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण भारत में संस्कृत भाषा का दिया जा सकता है। बड़े-बड़े संस्कृतज्ञ आचार्य, पंडित, कवि और लेखक हुए, लेकिन सिर्फ संस्कृत में ही हुए, यह कहना गलत है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी और कबीर की महत्ता किसी परिचय की मोहताज नहीं है, जिन्होंने जन भाषाओं के माध्यम से जनमानस को ज्ञान की किरणों से प्रकाशित किया। आज चिंता इस बात की है कि कहीं वर्तमान भारत का कोई बुद्ध या महावीर भाषाई द्वंद्व की इन बेड़ियों में ही टूट कर न रह जाए।

देश का एक बड़ा तबका आज भी आर्थिक तंगी का शिकार है। उस तबके की शिक्षा का माध्यम हिंदी और सरकारी संस्थान ही हैं। ऐसे में भाषाई बाध्यता को पार करके जैसे-तैसे वे जिंदगी के उस मोड़ पर पहुंचते हैं, जहां से उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के कुरुक्षेत्र में उतरना होता है। हिंदी और अंगे्रजी के द्वंद्व से गुजरने के बाद अब उनका सामना ऐसी अनूदित हिंदी भाषा से होता है, जिसे पढ़ कर उसे ऐसा आभास होता है कि इससे तो अच्छी अंग्रेजी ही है! अनूदित हिंदी का ऐसा रूप प्रतियोगी परीक्षा के साथ ही सरकारी कार्यालयों में भी देखने को मिलता है।

एटीएम, बैंक, डाकखाना आदि की पारिभाषिक शब्दावली में जिसे कार्यालयी हिंदी कहा जाता है, इसका रूप आसानी से देखा जा सकता है, जहां आपका अभिकर्ता, अधिसूचना, अभिसूचना, अभिहस्तांकन जैसे सिर घुमाने वाले शब्दों से सामना होगा। ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि हिंदी को सहज और सरल बनाया जाए, न कि उसे क्लिष्टता की सीढ़ियां चढ़ाई जाए।

इस डिजिटल दौर में शिक्षा का भी तेजी से डिजिटलीकरण हो रहा है। पिछले साल भर में इसे और भी मजबूती मिली है, इसे नकारा नहीं जा सकता है। सरकार की ओर से भी लगातार इसको बढ़ावा देने के प्रयास हो रहे हैं। स्वयं पाठ्यक्रम, ई-पीजी पाठशाला, स्वयंप्रभा आदि इसी तरह के उदाहरण हैं। लेकिन संसाधनों तक बहुत सारे बच्चों की पहुंच के सवाल से इतर यह भी महत्त्वपूर्ण है कि भाषाई दृष्टि से हिंदी माध्यम के बच्चों को यहां भी कठिनाई का सामना करना पड़ा है।

खासकर विज्ञान, तकनीकी और जनसंचार जैसे विद्यार्थियों को इन सबसे दो-चार होना पड़ा। हालांकि इस समस्या के गहराने के बाद इसके समाधान की कोशिशें हुईं, लेकिन इसने आग लगने पर कुआं खोदने वाली उक्ति को चरितार्थ किया। निज भाषा को लेकर स्वतंत्रता के पहले से आवाज उठती रही है।

कभी ‘भाषा, भूषा, भोजन और भवन’ का नारा गूंजा तो कभी ‘भाषा माता’ का, लेकिन स्थिति अभी भी ‘ढाक के तीन पात’ वाली बनी हुई है। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत ‘त्रिभाषा फार्मूला’ से उम्मीद जगी है, मगर हिंदी या अन्य भाषाओं को रोजगार और शिक्षा के माध्यम से जोड़े बिना यह कैसे पूरी होगी!

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