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दुनिया मेरे आगे: बदलाव की खुशबू

धूल हटे तो फिर शिद्दत से चमक उठते हैं। जिंदगी की भागदौड़ में मासूमियत छीनने का एक शायर ने कभी यों उलाहना दिया था- 'सौदा खतरनाक किया वक्त ने मेरे साथ, मुझे तजुर्बा देकर मेरी मासूमियत ले गया।'

Author Published on: June 2, 2020 12:31 AM
कोरोना वायरस की पीड़ा झेल रही दुनिया ने बेसहारा मजदूरों के संघर्ष को देखा।

प्रदीप कुमार राय
चौबीसों घंटे बड़ी चतुराई भरी बातें करने वाले जब इन दिनों सरल-सरल व्यवहार करते दिखे, तो अचंभा-सा हुआ। इस अचंभे ने मामले की गहराई समझने की प्रेरणा दी। यह स्पष्ट था कि संकट से गुजर रही दुनिया में बहुत कुछ अजीबोगरीब और अप्रत्याशित हुआ। स्वाभाविक है कि इसी कड़ी में उनमें भी मासूमियत सी नजर आई, जो इसे बुद्धिहीनता की निशानी मानते थे। लेकिन आगे बढ़ कर नजर आया कि मेरे संपर्क के ऐसे चिह्नित चेहरे, जो जलेबी और इमरती की तरह घुमाकर और अपना स्वार्थ ऊपर रख कर बात करते थे, वे भी अब कुछ हद तक सहज होकर बात करते हैं।

मसलन, बस भाई, वक्त का कुछ नहीं पता, इंसान को बड़े बोल नहीं बोलने चाहिए… सबके भले में अपना भला है वगैरह। बहुत उच्च वर्गीय पड़ोसी से ही बात करने वाले इन दिनों गली में आते-जाते हर ताऊ-चाचा से हाल पूछते हैं। इंसान के दुख-दर्द की बात करते हैं। मसलन, भाई सब ठीक-ठाक रहें, सबका भला हो ये हालात सुधरें, दोनों वक्त प्रभु से यही मांगते हैं। सोशल मीडिया पर भी बहुतेरे लोग अचानक सादगी से भरा संवाद करते मिल रहे हैं।

इस संकट काल में लोगों में दुख-चिंताओं के साथ साहस और प्रेम की रसधारा भी फूटी और वहीं से शायद सरलता की झलक आई। हालांकि कुछ सकारात्मक बदलाव देखने पर हम बबार्दी की कहानी तो नहीं भूल सकते, उसका दर्द अपनी जगह है। लेकिन इस बदलाव से ये जरूर सिद्ध हुआ कि मानव में सभी कल्याणकारी गुण बने रहते हैं। धूल-धूसरित होकर ढक जाते हैं।

धूल हटे तो फिर शिद्दत से चमक उठते हैं। जिंदगी की भागदौड़ में मासूमियत छीनने का एक शायर ने कभी यों उलाहना दिया था- ‘सौदा खतरनाक किया वक्त ने मेरे साथ, मुझे तजुर्बा देकर मेरी मासूमियत ले गया।’ चलो अब तो वक्त कह रहा है कि मैं इसे लौटा भी सकता हूं। मिल भी गया तो कब तक संभाल पाएंगे, ये कौन जाने।

इंसान को इंसान और सामाजिक प्राणी कहलाने के लिए थोड़ा-सा भोलापन बचा कर रखना होता है। स्वभाव में भोलापन या मासूमियत आने का यह अर्थ नहीं कि इंसान की बुद्धि तेज नहीं रहती, वह चौकन्ना नहीं रहता। सरल स्वभाव की तो हम सब तारीफ करते ही हैं। तो ये भोलापन और मासूमियत उसी सरलता के मोहल्ले के बाहर का थोड़ा न है। शब्द के अर्थ में महीन-से रंग बदलते हैं, पर हैं तो एक ही माला के मोती!

हम सभी उनकी प्रशंसा करते हैं जो बहुत गुणी, बुद्धिमान और अपने कार्यक्षेत्र में सफल होकर भी सरल हैं। स्वामी विवेकानंद के गुरु परमहंस ज्ञान के महासागर के दूसरे छोर पहुंचे हुए थे, पर भोलापन गजब का था। खुद विवेकानंद असामान्य बुद्धि और अद्भुत भोलेपन का संगम थे। गुरु गोबिंद सिंह का भोलापन उनके एक अद्वितीय योद्धा और तीव्र बुद्धि व्यक्तित्व होने के गुणों में से एक था।

हुआ यों कि पश्चिमी देशों ने स्मार्टनेस की ऐसी अवधारणा दी, जिसने संवेदनशीलता, सरलता, मासूमियत के प्रति नफरत-सी पैदा कर दी। पुरातन भारतीय परंपरा पर बरसों से शोध कर रहे प्रो आशुतोष अंगीरस ने एक चर्चा में बताया- ‘स्मार्टनेस वास्तव में कुटिलता का ही पर्याय है। बहुत अप्रिय व अनुपयुक्त शब्द चालूपन में जो तत्त्व लोग देखते हैं, बस ये उसी के आसपास का है। कम पढ़े-लिखे लोग स्मार्टनेस की जगह इस शब्द का बड़ा प्रयोग करते मिल जाते हैं।’

वे कहते हैं- ‘इसके अलावा ‘इंटेलिजेंट’ शब्द भी पश्चिम की ऐसी अवधारणा है जिसमें संवेदनशीलता शामिल नहीं। जबकि भारत का शब्द है विवेकी जिसका अर्थ है- उचित-अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक में भेद करने का गुण प्राप्त करना, लेकिन इस निर्णय शक्ति में बुद्धि की तीव्रता के साथ संवेदनशील होने की शर्त भी रखी गई, क्योंकि इसके बिना मानवता खतरे में पड़ जाएगी।’

दरअसल, इंसान का भोलापन जो वास्तव में संवेदनशीलता का ही पर्याय होता है, पूरे समाज को महकाता है। यूरोप के कुछ समृद्ध देश जो अपने नागरिकों के भोलेपन के लिए विख्यात हैं, संयोग से उनमें से कुछ एक में मुझे भी जाने का मौका मिला। अपने आसपास के समाज में भोलेपन की उभरती छटा को देख मुझे वे याद आ गए। मेरी यात्रा में पुर्तगाल, लिथुआनिया और लात्विया शामिल हैं। वहां आम जनमानस के व्यवहार में एक गजब की मासूमियत मिलती है। ऐसा भी नहीं कि इन देशों में समृद्धि कम है या यहां ‘इंटेलिजेंट’ लोग नहीं।

बहरहाल, यह अभी खुला प्रश्न है कि संवेदनशीलता और सादगी से परहेज करने वाली ह्यस्मार्टनेसह्ण बदलते हालात में लोगों को दिक्कत पैदा करेगी। पर बदलते हालात में, जहां पग-पग पर एक दूसरे की सहायता की जरूरत हैं, संवदेनशीलता और सरलता रखे बिना समुदाय का सहयोग नहीं मिलेगा, अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ी जाएगी, तो कम से कम ‘स्मार्टनेस’ की अब तक की परिभाषा के दायरे तोड़ने पड़ेंगे।

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