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अभिव्यक्ति के आभाषी मंच

अभिव्यक्ति और उसकी हड़बड़ी पर किसी और का नियंत्रण नहीं होता।

अभिव्यक्ति और उसकी हड़बड़ी पर किसी और का नियंत्रण नहीं होता। खासतौर पर लेखन के क्षेत्र में आज कोई भी व्यक्ति जब चाहे, उसे लिखने और वेबसाइट पर प्रकाशित करने की आजादी फेसबुक, ट्विटर, वाट्सऐप आदि सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। आज के समाज को किसी भी नियंत्रण से मुक्त छपने और दिखाने की आजादी इन सोशल वेबसाइटों पर हासिल है। यहां एक तरह से हर व्यक्ति लेखक, कवि, पत्रकार, समीक्षक और किस्सागो है। लेकिन सुबह नींद खुलने से लेकर रात-बिरात जग कर भी फेसबुक पर ताजा टिप्पणियां देखता आज का समाज क्या वास्तव में तकनीक इस्तेमाल करने के लिए अपने विवेक का प्रयोग करता है? हमें इस पर विचार करना चाहिए कि क्या सोशल मीडिया का हम अपने समाज के हित में प्रयोग कर रहे हैं? इस तरह का लेखन फेसबुक पर देखा जा सकता है जिसमें आत्मप्रचार से लबरेज कथ्य, प्रसंग, घटनाएं, फोटो आदि होती हैं।

यों विचारों, भावनाओं की अभिव्यक्ति से किसी को गुरेज नहीं है। लेकिन हम अगर आत्मप्रचार के मोह से ग्रस्त हैं, तो इस पर ठहर कर सोचने की आवश्यकता है। एक सरसरी निगाह सोशल वेबसाइटों पर डालें तो उन प्रसंगों को देख कर कई बार ताज्जुब होता है कि व्यक्ति इतना भी आत्ममुग्ध हो सकता है! वह कभी अपनी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों को लेकर इस कदर आक्रामक हो जाता है कि अगर उसके सुर में सुर नहीं मिलाया जाए तो आप उसके दोस्त रहने लायक नहीं। भाषाई हिंसा इससे अगला चरण है। हालांकि आलोचना स्वस्थ हो तो स्वीकार्य है, लेकिन वह कई बार महज नीचा दिखाने और अपमान करने के उद्देश्य से की जाती है। आपकी अभिव्यक्ति के अधिकार से किसी की जिंदगी बर्बाद हो जाए तो यह कहां का न्याय है! जीने और अभिव्यक्ति का अधिकार हर नागरिक को संविधान प्रदत्त है।

हालांकि सोशल मीडिया पर कई बार गंभीर विमर्श भी होते हैं। इन्हीं वेबसाइटों पर अच्छा साहित्य भी लिखा जा रहा है। कहीं वैचारिक यात्रा का आनंद लिया जा सकता है तो कहीं ताजी कविता, कहानी, लेख, समीक्षा आदि का भी रसास्वादन किया जा सकता है। कहीं व्यंग्य लिखे जा रहे हैं तो कहीं यात्रा संस्मरण। इससे एक बात तो साबित होती है कि जहां एक ओर इस माध्यम का प्रयोग सार्थक बहसों, रचनाओं को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचाने में किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर महज बेहद निजी रोजमर्रा की जानकारी भी पोस्ट की जाती है। नितांत व्यक्तिगत प्रचार भी प्रचुरता से यहां देखा-पढ़ा जा सकता है। लेकिन कई बार लोग अपने किसी फेसबुक मित्र के नाराज होने के डर से न चाहते हुए भी उनके पोस्ट को लाइक करते हैं।

आत्म-प्रचार की प्रवृत्तियां सामान्य हैं। फलां कहां पुरस्कृत हो रहा है, कहां माला पहनाई जा रही है जैसी जिज्ञासु प्रवृत्ति सहज देखी जा सकती है। परोक्ष और प्रत्यक्ष यह मंशा भी समझ में आती है कि लक्षित समूहों के बीच ईष्या पैदा करना है। कितना अच्छा हो कि हम इस माध्यम का प्रयोग सिर्फ आत्म प्रचार के लिए करने के बजाय कुछ स्वस्थ और सार्थक कामों के लिए भी करें। हालांकि सभी ऐसे हैं, यह कहना भी सही नहीं होगा। कई ऐसे लोग हैं जिनके फेसबुक पेज पर काफी महत्त्वपूर्ण चीजें भी पढ़ने को मिल जाती हैं। वह सिर्फ कविता नहीं, बल्कि घटनाओं, खोज, विचार से लेकर गतिविधियों की भी जानकारी होती है। अगर फेसबुक के बरक्स कुछ ब्लॉगों की बात करें तो यहां न केवल साहित्यिक समूह सक्रियता से बिना आत्म-प्रचार के रचनाधर्मिता का निर्वाह कर रहे हैं, बल्कि स्वस्थ पढ़ने-पढ़ाने की कला और अनुभव को भी साझा करते हैं।

फेसबुक पर रोजगार, संपर्क आदि के स्रोत भी मिलते हैं। लेकिन इसका इस्तेमाल इस रूप में बहुत कम ही होता है। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की ही है जिनके लिए फेसबुक महज प्रचार और मनोरंजन का साधन भर है। वे कुछ लिखते नहीं,बस दूसरों के ‘घरों’ में ताक-झांक कर लिया करते हैं। कई शोध सामने आ चुके हैं कि युवा वर्ग के साथ ही प्रौढ़ वर्ग भी अपना काफी वक्त इन वेबसाइटों पर महज यों ही खर्च करता है।

एक सच यह भी है कि आप लाख खुद पर संयम रखें, लेकिन मानवीय स्वभाव है कि हम दूसरे की उपलब्धि से अंदर ही अंदर जलन भी महसूस करते हैं। उसके बाद हम भी अनावश्यक आत्मप्रचार की गिरफ्त में आ जाते हैं। फिर पता नहीं कब के पुराने फोटो, लेख, घटनाओं को चिपकाने के लोभ से ग्रस्त हो जाते हैं। इसके बावजूद सच यह है कि सोशल मीडिया ने जहां हमारे अनुभव संसार को संकुचित किया है, वहीं एक व्यापक फैलाव भी दिया है। जहां हम अपने पुराने मित्रों के संपर्क में आ पाते हैं, वहीं एक सूचना तत्क्षण हजारों, लाखों के बीच प्रसारित हो जाती है। इस त्वरित माध्यम का प्रयोग समाज के रचनात्मक कामों के लिए किया जाए तो बेहतर हो।

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