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दुनिया मेरे आगे: संवेदना की छवियां

हमारी कई परंपराएं ऐसी हैं, जो किसी न किसी दृष्टि से बेहद प्रासंगिक हैं, जो हमें पारिवारिक और सामाजिक जीवन संबंधी संदेश देती हैं। इसके साथ ही ये इंसानी जज्बातों के मूल्यों को समझने के महत्त्व की ओर भी इशारा करती हैं, जिनसे आज हम दूर होते जा रहे हैं।

हमारी परंपराएं और संस्कृतियां हमें बहुत कुछ सिखाती हैं।

अंब्रेश रंजन कुमार
कुछ महीने पहले अपने एक मित्र की शादी में शरीक होने बिहार के बांका पहली बार जाना हुआ। अमूमन किसी स्थान का नाम सुनते ही हमारे जेहन में उस जगह की एक छवि उभरती है, चाहे हम उस जगह पर गए हों या नहीं। पर एक दृश्य आंखों को अवश्य दिखता। यह एक ऐसा दृश्य होता है, जिसे हमने कभी देखा नहीं है। इस काल्पनिक दृश्य का मन में उभरना भी अपने आप में अद्भुत है। बहरहाल, उस जगह की सही सूरत वहां जाकर ही दिखती है। यात्राएं इसलिए भी यादगार होती हैं कि इनमें हमें बहुत कुछ नया देखने को मिलता है, जो हमारी जिज्ञासा से जुड़ा होता है।

दरअसल, जब हम किसी खास परंपरा के बारे में जानना-समझना चाहते हैं तो उसका साक्षात्कार ज्यादातर बेहतर मौका देता है। इस लिहाज से कहूं कि महानगरों की चकाचौंध भरे विवाह समारोहों के मुकाबले छोटे कस्बों और गांवों में बरात में शामिल होने का अनुभव भी मनोरम होता है। उसमें दूल्हे के मित्रों का शामिल होना बरात की शोभा बढ़ाने वाला माना जाता है। लेकिन आजकल की शादियों में पहले की शादियों के मुकाबले बरातियों के व्यवहार में परिवर्तन आया है। लोगों की व्यस्तताएं इतनी बढ़ गई हैं कि शादियों में बरातियों की संख्या पहले से कम होती जा रही है। दूसरी बात यह कि पहले बरात आगमन के बाद लड़की पक्ष वाले बरातियों को उनके आगमन के अगले दिन सेवा सत्कार करने के बाद ही विदा करते थे।

आज के दौर में देखा जाता है कि वरमाला के बाद ही अधिकतर बराती वापस जाने लगते हैं। हालांकि शादी की रस्म आगे भी जारी रहती है, जो आमतौर पर सुबह तक चलती है। इस रस्म में लड़के और लड़की, दोनों पक्षों के परिजन और करीबी रिश्तेदार, मित्रगण उपस्थित रहते हैं। आज ऐसा देखा जा रहा है व्यस्तताओं और अपने शहर से दूर रहने के कारण भी हम अपने करीबियों के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाते हैं। मेरे मित्र की शादी में भी राज्य से बाहर रह रहे मित्रों और करीबियों में कुछ गिने-चुने लोग ही शामिल हो पाए थे। उनमें से एक मैं भी था। बचपन से मित्र होने के नाते मुझे भी काफी सत्कार दिया गया। मैं पूरे रास्ते दूल्हे के साथ ही रहा। बरात में सबसे प्रमुख व्यक्ति के साथ रहने की अनुभूति भी खास होती है।

बहरहाल, विवाह में बरातियों के स्वागत में पुरानी परंपराओं का बखूबी निर्वाह किया गया। इसने मेरे अनुभव को और रोचक बना दिया। गांव में प्रवेश करते ही बरात धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और रास्ते के दोनों तरफ गांव वाले खड़े थे। मानो सभी बरातियों का स्वागत कर रहे हों। इस बीच सभी की आंखें दूल्हे को देखने को उत्सुक थीं। मैं इस बात को पूरी तरह अनुभव कर पा रहा था। किसी भी विवाह समारोह में आम लोगों की इस उत्सुकता का अध्ययन करना सारे सामाजिक आयामों को खोलता है।

चूंकि आज हर हाथ कैमरे वाले मोबाइल का जमाना है, तो इस दृश्य को देखने के साथ-साथ बहुत सारे लोग इस पल को अपने मोबाइल में रिकॉर्ड भी करना चाहते थे। तकनीक ने ऐसे खुशी के पलों को सहेजने के लिए एक अच्छे यंत्र का ईजाद कर दिया है। मसलन, मोबाइल के कैमरे से हम मनचाहे दृश्यों को कैद कर सकते हैं। आज यह आदत हम सभी के व्यवहार में गहराई से घर कर चुकी है। लेकिन शायद यह हमारी संवेदनाओं की जगह को कम करती जा रही है।

विवाह के मुख्य चरण और रस्म गीत-संगीत और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ संपन्न हुई। इसमें पूरी भव्यता लिए सामूहिक तस्वीरें खिंचवाना भी एक रिवाज की तरह विवाह में शामिल हो गया है। सारे कैमरे की लाइटों की चमक नवविवाहित जोड़े पर देर तक पड़ती है। इस पूरी प्रक्रिया में उनकी असहजता और सहजता का मसला एक अलग विषय है।

भोजन के बाद रात में ही धीरे-धीरे बरातियों की संख्या घटती गई। लोग अलग-अलग साधनों से अपने घर वापस लौटने लगे। लेकिन विवाह की प्रक्रिया कन्यादान और विदाई तक चलती है। तब आमतौर पर भोर हो जाती है। कन्यादान की रस्म के दौरान दुल्हन के पिता की आंखों से आंसू बहने लगे और दूल्हे के पिता ने उन्हें संभाला। आसपास बैठे दुल्हन पक्ष वाले लोग अधिक भावुक लग रहे थे। यह क्षण मेरी आंखों में लंबे समय तक के लिए कैद हो गया। यह शहरी संस्कृति में घटती संवेदनाओं के बरक्स जिंदा संवेदनाओं का सामना था। तमाम सामाजिक, पारिवारिक जीवन के निर्वाह की दृष्टि से यह क्षण बेहद मार्मिक था।

हमारी कई परंपराएं ऐसी हैं, जो किसी न किसी दृष्टि से बेहद प्रासंगिक हैं, जो हमें पारिवारिक और सामाजिक जीवन संबंधी संदेश देती हैं। इसके साथ ही ये इंसानी जज्बातों के मूल्यों को समझने के महत्त्व की ओर भी इशारा करती हैं, जिनसे आज हम दूर होते जा रहे हैं।

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