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दुनिया मेरे आगे: सुधार की दीवारें

गलती का अहसास ही वह बिंदु है, जहां से व्यक्ति में सुधार की प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है। सवाल है कि फिर सजा का सिद्धांत और उसकी प्रक्रिया क्या हो, जिससे अपराध के मानस को ही खत्म करने में मदद मिले?

Author Updated: January 22, 2021 12:56 AM
Civil societyसमाज में मिल जुलकर रहने से व्यापक परिवार का अहसास होता है। (फोटो- फ्रीपिक)

सुरेशचंद्र रोहरा

अपने परिवार से लेकर आस-पड़ोस तक में अगर कोई बच्चा हमें गलती करता हुआ दिखता है तो हमारे मन में कैसी बातें आती हैं? हम सोचते हैं कि बच्चा ऐसा न करे। इसके लिए हम बच्चे को समझाने, हिदायत देने से लेकर हल्की-फुल्की सजा तक को सहज मानते हैं। इससे आगे बढ़ते हैं। जब हम कहीं अपराध होता हुआ भी देखते हैं तब भी यही सोचते हैं कि ऐसे अपराध न हों, अपराधी ऐसा न करें और अगर कोई इस मानसिकता का व्यक्ति है तो उसमें सुधार आए। एक हद तक हम यह उम्मीद करते हैं और उसके बाद उसके लिए निर्धारित सजा को भी समर्थन देते हैं। लेकिन आखिर किसी भी तरह की सजा का मकसद क्या होता है?

क्या इसके पीछे समाज से लेकर राज्यसत्ता तक की यह उम्मीद नहीं छिपी होती कि सजा के बाद संबंधित व्यक्ति के विचार और व्यवहार में सुधार आएगा और वह फिर से एक सामान्य इंसान होकर अपना जीवन गुजारेगा? निश्चित तौर पर सजा के पीछे यही उद्देश्य होता है। लेकिन मुझे लगता है कि हमने आमतौर पर सजा को सिर्फ इस रूप में देखा-जाना है कि किसी की गलती पर उसे प्रताड़ित किया जाए, ताकि उसे अपने किए गए अपराध या गलती का अहसास हो। गलती का अहसास ही वह बिंदु है, जहां से व्यक्ति में सुधार की प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है। सवाल है कि फिर सजा का सिद्धांत और उसकी प्रक्रिया क्या हो, जिससे अपराध के मानस को ही खत्म करने में मदद मिले?

हम सबने सजा के बिल्कुल समांतर जेल को ही याद किया है। संयोग से मुझे जेल को नजदीक से देखने-समझने का मौका मिला है। ऊंची-ऊंची दीवारें, मजबूत लौह दरवाजे, भीतर एक बड़ा-सा मैदान, कैदियो को रखने के लिए कोठरियां, बदबूदार संडास, अनुशासन, जेलर, कर्मचारी, सादा भोजन और भीतर का घात-प्रतिघात। दरअसल, जेल की परिकल्पना और उसका मूर्त स्वरूप जाने कितना पुराना है। मानव सभ्यता और जेल की चारदिवारी मानो एक दूसरे के पर्याय है।

प्राचीन ग्रंथों और बाद की कहानियों में इससे संबंधित प्रसंगों से लेकर आज तक के संदर्भ में जेल की एक खास तस्वीर हमारे दिमाग में बनती है, जहां की कई तल्ख हकीकतें अक्सर सामने आती रही हैं। मगर हम जेलों की स्थापना और अनिवार्यता पर नजर डालें तो इसका एक ही निष्कर्ष है। इंसान को उसके अपराध की सजा और सुधार का प्रयास। मानव सभ्य हुआ तो निस्संदेह उसे बुरे लोगों और अपराधियों के लिए जेल की परिकल्पना सूझी और उसे अमलीजामा पहनाया गया।

आज सभ्य समाज में जेल इसीलिए अपरिहार्य है कि हम अपराधी को सुधार सकें। जेल का भय हमें अपराध से रोकता है। मगर सच यह है कि अपराध को रोकने और अपराधी को सुधारने की महती कल्पना आज शायद निर्मूल हो चुकी है। मेरे आसपास घटी कई घटनाएं हैं, जिन्हें मैं भूल नहीं पाता। मेरे मोहल्ले में एक युवक था। थोड़ा गुस्सैल और बेलगाम था, इसलिए अक्सर उसके साथ लोगों के झगड़े हो जाते थे। धीरे-धीरे उसने छोटे-मोटे अपराधों की दुनिया में कदम रख दिए और आखिर कानून के हत्थे चढ़ा।

चार साल जेल में रहने के बाद जब वह मोहल्ले में वापस आया, तो लोगों ने उम्मीद की कि उसके व्यवहार में सुधार आया होगा। लेकिन अब उसका व्यवहार और ज्यादा आक्रामक था और उसने खुद को मोहल्ले के सबसे बड़े ‘दादा’ के रूप में पेश करना शुरू कर दिया। अब उसका रौब गालिब होता, जेल काट कर आए होने के कारण उससे सब डरते। जेल जाने से पहले वह एक दुकान चलाता भी था, तो अब उसे उसकी जरूरत नहीं रही। वह सबके सामने अपनी रंगदारी दिखा कर उनसे वसूली की रकम पर मौज करने लगा। लेकिन आगे चल कर किसी विवाद के बाद उसके अपराधी दोस्तों ने ही किसी बात पर उसकी हत्या कर दी।

अब सोचता हूं कि सही है कि जेल मनुष्य को उसके अपराधों की सजा काटने की जगह के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन ऐसा क्यों हो गया है कि कोई छोटे-मोटे अपराध करने वाला व्यक्ति अपने हिस्से की सजा काटने वहां जाता है तो कई बार वह वहां और भी बड़ा अपराधी बन जाता है या फिर उसका शेष जीवन अनुपयोगी रह जाता है। जबकि एक सभ्य समाज में जेलों की परिकल्पना सुधार गृहों के स्वरूप में की गई है।

शायद यह नहीं हो पा रहा है। जब समाजवादी लोकतंत्र की बात की जाती है तो क्या जेल की संरचना ऐसी नहीं हो सकती कि अपराध करके अगर कोई मनुष्य वहां जाए तो उसे ऐसा आदर्श माहौल मिले कि वह सुशिक्षित बन कर बाहर आए। वह एक मैकेनिक, एक इंजीनियर या किसी अन्य कला में पारंगत होकर क्यों नहीं आ सकता, ताकि बाकी का जीवन वह एक अपराधी की सोच के साथ नहीं, बल्कि सभ्य समाज में अपना अवदान दे कर सिर उठा कर जीए। कई बार ऐसी कुछ खबरें आती हैं तो पढ़-सुन कर अच्छा लगता है। लेकिन यह आम नहीं है। एक फिल्म ‘दुश्मन’ की याद आती है, जिसमें फिल्म के नायक को सजा के तौर पर गांव भेजा जाता है। एक खुली जेल की परिकल्पना को परदे पर उतारती यह फिल्म सभ्यता के लिए एक संदेश है।

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