ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः पर्दे पर समाज

सिनेमा का पहला चाक्षुष अनुभव, वह भी बड़े पर्दे पर। सचमुच यह दुनिया किसी जादू से कम नहीं लगी होगी।

Author December 27, 2017 03:28 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

पूजा खिल्लम

सिनेमा का पहला चाक्षुष अनुभव, वह भी बड़े पर्दे पर। सचमुच यह दुनिया किसी जादू से कम नहीं लगी होगी। खासकर उस पीढ़ी के लिए, जो थियेटर और नौटंकी के युग से निकल कर सीधे डिजिटल दुनिया तक गई है, वह उस फर्क को बखूबी जानती है जो रामलीला के मैदान की नौटंकी, थियेटर और फिल्म के बड़े पर्दे के बीच है। लेकिन उसी पीढ़ी से आगे की पीढ़ियां इस फर्क से अनजान हैं। उन्हें डिजिटल दुनिया कोई जादू नहीं, बल्कि एक खेल की तरह समझ आती है, जिसे खेल कर वे बड़ी से बड़ी समस्या या चुनौती का हल चुटकियों में खोज सकते हैं। चुटकियों का यह खेल कई बार तो चुटकी बजाने और पलकें झपकाने तक का इंतजार भी नहीं करता। उससे पहले ही कोई घटना हो चुकी होती है और दूसरी ओर उसके लक्ष्य पर मौजूद लोग मनचाहे परिणाम के इंतजार में होते हैं। लेकिन हर बार परिणाम मनचाहा नहीं होता। यह खेल खेलने वाला सिर्फ उस तक महदूद नहीं रहता, बल्कि उन सबका भी बन चुका होता है जो अब तक इससे अनजाने थे।

बहरहाल, यह तथ्य डिजिटल दुनिया को जितना परिभाषित करता है, शायद उससे आधा या थोड़ा ज्यादा हिंदी सिनेमा को भी करता है। चूंकि फिल्में सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, कई बार हम इन्हें खेल समझते हैं, लेकिन यह हमें जीवन की बहुत बड़ी चेतावनी या सीख देकर जाती हैं। अब यह हम पर निर्भर है कि हम उससे सीख कर अपना जीवन बनाना चाहते हैं या फिर बर्बाद करना चाहते हैं। लेकिन एक बात साफ है कि फिल्में सिर्फ कहती नहीं हैं, बल्कि करने को उकसाती हैं। यह उनकी शक्ति है और सीमा भी। यह याद दिलाने के लिए हाल की एक घटना है, जिसमें एक नवयुवक ने एक फिल्म देखी और अपने से छोटी उम्र की एक लड़की का अपहरण किया, फिरौती मांगी और उसकी हत्या कर दी।
इस तरह की कोई घटना भले ही इक्का-दुक्का कभी-कभार सामने आई हो, इसके बावजूद यह घटना सिनेमा को बनाने, देखने और पसंद करने वालों के लिए आंख खोलने वाली है। अब तक सिनेमा को सस्ते मनोरंजन की तरह देखने वाले लोगों का रवैया बदला नहीं है। उनकी यह दलील भी उनके अपने रवैए की तरह नहीं बदलने वाली है कि आखिर फिल्म भी एक उत्पाद है और सभी उत्पाद बेचने के लिए ही होते हैं। यों साहित्यकारों ने फिल्म की तुलना जीवन से की है। उधर ‘शोमैन’ के रूप में मशहूर राजकपूर कहते हैं ‘शो मस्ट गो आॅन’ तो वह सिनेमा की तुलना जीवन से करते हैं। इस तरह फिल्म और जीवन में परस्पर संबंध है।

यह सही है कि फिल्म को बाजार में जाना होता है, जहां उसकी कीमत लगाई जानी है। लेकिन फिल्मों में जो क्षमता है, उसका अंदाजा ऐसे किसी तर्क से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव को देख कर ही लगाया जा सकता है जो इस तरह के हल्के तर्क से कहीं ज्यादा बड़ा है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के समय जिस मूल्य के लिए लोग उनका मंचन देखने जाते थे, हर युग में और यहां तक कि आज के डिजिटल युग में भी कहीं न कहीं दर्शक उस मूल्य की खोज करता हुआ पाया जाता है। अगर वह उसे नहीं मिल पाता है तो उसका हश्र और अंजाम या तो उसमें पागलपन या कहीं न कहीं जुनून की तरह घर कर जाता है। यह कभी-कभी किसी जघन्य अपराध का रूप भी ले लेता है।

यह चुनौती हर युग में रहेगी, सही-गलत, अच्छा-बुरा, सोचा-अनसोचा, जाना-अनजाना। दरअसल, युग्म जब तक रहेंगे, चुनौतियां तब तक रहेंगी। अगर ऐसा न हो तो क्यों आज भी दर्शक ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ और ‘टॉयलेट- एक प्रेमकथा’ जैसी फिल्मों को देखने जाए और उनसे सीख कर अपना और समाज का परोपकार करे। सिनेमा हॉल में सत्तर या बहत्तर एमएम का पर्दा महज पर्दा नहीं है, बल्कि उसकी वह छाती है जो उसके गंभीर और गहन प्रभाव को दर्शाता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि थियेटर का वह तत्त्व जो उसे थियेटर जैसी गंभीर और सशक्त विधा का रूप देता है, उसका संरक्षण थियेटर से ज्यादा फिल्मों में हो सकता है।

गंभीर बातों को मनोरंजक ढंग से पर्दे पर भारतीय फिल्मों ने साकार किया है। इस रूप में भारतीय फिल्मों ने अपनी एक पहचान बनाई है, जिसमें हाल ही में दुनिया को अलविदा कह गए शशि कपूर जैसे समर्पित कलाकारों की बड़ी भूमिका है। वे बड़े पर्दे पर जाकर भी ‘अपनी मां’ यानी थियेटर को नहीं भूले। थियेटर को सही अर्थों में ‘सिनेमा की मां’ कहा जा सकता है, जो हर युग में और हर हाल में फिल्मों को बेहतर बनाती रही है और आगे भी बनाती रहेगी। लेकिन सिनेमा की यह चुनौती सिर्फ उसकी नहीं है, बल्कि बतौर एक जागरूक दर्शक हमारी भी है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App