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दुनिया मेरे आगेः संवाद का समाज

कुछ दोस्तों के साथ जन-संवाद के बदलते स्वरूप पर बात हो रही थी। ज्यादातर का मानना था कि पिछले कुछ समय से वेब मीडिया का जिस तेजी से प्रसार हो रहा है, उसने संवाद और संप्रेषण के नए रास्ते खोले हैं और किसी बात या विचार की पहुंच का विस्तार किया है।
Author August 4, 2017 23:56 pm
सांकेतिक फोटो

रोहिन कुमार

कुछ दोस्तों के साथ जन-संवाद के बदलते स्वरूप पर बात हो रही थी। ज्यादातर का मानना था कि पिछले कुछ समय से वेब मीडिया का जिस तेजी से प्रसार हो रहा है, उसने संवाद और संप्रेषण के नए रास्ते खोले हैं और किसी बात या विचार की पहुंच का विस्तार किया है। कई ने कहा कि यह एक तरह से मीडिया के लोकतांत्रिक दायरे का विस्तार है। जहां कुछ समय पहले इसका दायरा बहुत सीमित था, वहीं आज ऐसे आकलन आने लगे हैं कि भविष्य अब डिजिटल दुनिया का है। बेशक यह सब सही है, लेकिन मेरा मानना है कि इससे पत्रकारिता की चुनौतियों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। डिजिटल की मौजूदगी ने उत्पादन और वितरण के खर्चे को बहुत कम कर दिया है। मगर इस बचत का इस्तेमाल जमीनी स्तर पर खबरें निकालने के लिए रिपोर्टरों की जगह बनाने के बजाय भीतर ही सामग्रियां तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। हम सब देख सकते हैं कि ज्यादातर वेबसाइटों पर समाचार एजेंसी पर निर्भरता के अलावा अब खबरों का मुख्य जरिया ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के मंच होने लगे हैं।

अब जब डिजिटल दुनिया में मीडिया का विस्तार तेजी से हो रहा है तो इसकी चुनौतियों पर भी बात होगी। संवाद के डिजिटल मंचों पर जिस तरह की हल्की-फुल्की और कई बार ओछी खबरें प्रकाशित की जाती हैं, उन्हें अब भी अखबारों में जगह नहीं दी जाती। सवाल उठता है कि यह अंतर क्यों है? दरअसल, इस तरह की खबरें ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के मकसद से परोसी जाती हैं। इस होड़ से ही गूगल से विज्ञापन मिलता है और यही असली वजह है कि डिजिटल मंचों पर कई बार अच्छे लेखों और उनकी गुणवत्ता को वरीयता नहीं दी जाती। यानी अगर अखबार और टीवी चैनलों पर पूंजी से संचालित होने का आरोप लगाया जाता है तो डिजिटल मीडिया भी एक तरह से पूंजी के स्तर पर मजबूर ही दिखता है।

यहां मैं कुछ विदेशी और बिजनेस पत्रकारों के अनुभव साझा करना चाहता हूं। यूरोप के रोबर्ट वींबर्ग ने बताया कि उनकी वेबसाइट का व्यावसायिक प्रारूप ‘सब्सक्रिप्शन’ यानी चंदा आधारित है। करीब अस्सी हजार लोग उनकी वेबसाइट को नियमित चंदा देते हैं। यानी खबरों और सूचनाओं के महत्त्व का बोध वहां के दर्शकों और पाठकों को है जो उन्हें चंदा देने को प्रेरित करता है। उसी तरह एक अन्य बिजनेस वेबसाइट के संपादक ने भी इसी मॉडल पर चलने की बात कही। जिस दौर में गुणवत्ता को खारिज करके ज्यादा से ज्यादा रिपोर्ट प्रकाशित करके वेबसाइटों की होड़ में आगे निकालने की कोशिश दिखती है, वहीं उनकी वेबसाइट पर दिन भर में सिर्फ एक लेख छापा जाता है, क्योंकि उनका मानना है कि लेख की गुणवत्ता में मेहनत और संसाधन लगता है। उनका जोर खबरों की संख्या से ज्यादा गुणवत्ता पर है। भारत में भी स्वतंत्र मीडिया के प्रारूप में शुरू हुई कुछ वेबसाइटों ने अपने पाठकों से चंदे की अपील की। लेकिन बहुत कम लोग ही इस तरह मदद करते हैं, क्योंकि अपवाद को छोड़ दें तो न इन वेबसाइटों की पहुंच न हर जगह है, न यहां खबरों और सूचनाओं के महत्त्व का ज्यादा बोध पाया जाता है।

एक अखबार के छप कर तैयार होने की लगभग कीमत आती है तीस से चालीस रुपए। लेकिन पाठकों को यह उपलब्ध होता है तीन से पांच रुपए में। अखबार की कीमत में एक रुपए की बढ़ोतरी करने में अखबार के प्रबंधन बहुत जोखिम उठाते हैं। इसी तरह बहुत कम दर्शक हैं जो किसी खास समाचार चैनल को डिश टीवी पर पैकेज से अलग पैसा देकर देखना पसंद करते हैं। शायद अभी हमारे यहां दर्शकों के भीतर जागरूकता और रुचि का विकास इस स्तर तक नहीं हो पाया है कि वे अच्छी खबरों में लगी मेहनत और उसकी गुणवत्ता के लिए पैसा चुकाने के लिए उत्साह दिखाएं। लेकिन यह भी सच है कि जिस देश में दो जून के खाने की जुगत में लोग फिक्रमंद रहते हों, वहां चंदे पर निर्भर खबरें उन तक कैसे पहुंच पाएंगी! हां, इसमें एक स्वरूप यह हो सकता है कि समाज के सक्षम तबके से चंदा लिया जाए और खबरें सभी लोगों तक पहुंचाई जाएं। मोटे तौर पर इसे ‘फिलान्थ्रोफी मॉडल’ के नाम से जाना जाता है। लेकिन इस पहलू की व्यावहारिक चिंता यह है कि कितने अमीर प्रगतिशील कराधान के लिए राजी होते हैं? क्या यह वही वर्ग नहीं है, जिसकी आंखें वित्तीय बजट भाषण में टैक्स से संबंधित घोषणाओं पर टिकी होती हैं? यानी हमें डिजिटल मीडिया के व्यावसायिक पक्षों को भारत के सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में समझना होगा। जनता को सूचनाएं और खबरों के महत्त्व का बोध कराना होगा। रचनात्मक तरीके और आसान भाषा के साथ गुणवत्ता भी बनाए रखने की चुनौती बनी रहेगी।

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