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दुनिया मेरे आगेः पढ़ने की आदत

कुछ समय पहले एक कार्यशाला में शिक्षकों से बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने पिछले एक माह में पाठ्य पुस्तकों से इतर शिक्षा और बच्चों से संबंधित कौन-सी किताब पढ़ी है तो कुछ देर के लिए खामोशी छा गई।

Author December 2, 2017 2:49 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रेरणा मालवीय

कुछ समय पहले एक कार्यशाला में शिक्षकों से बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने पिछले एक माह में पाठ्य पुस्तकों से इतर शिक्षा और बच्चों से संबंधित कौन-सी किताब पढ़ी है तो कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। फिर धीरे-धीरे बात आनी शुरू हुई। एक ने कहा कि उसने प्रेमचंद का उपन्यास ‘गोदान’ पढ़ा। एक अन्य शिक्षक ने बताया कि उसने एक ज्योतिषी की किताब पढ़ी। कक्ष में फिर एक सन्नाटा पसर गया। खामोशी तोड़ते हुए मैंने फिर कहा कि समयावधि तीन महीने बढ़ा दी जाए। फिर भी उत्तर में कोई इजाफा नहीं हुआ। इस दौरान प्रतिक्रिया यह भी आई कि अरे अब तो सरकारी नौकरी लग गई है, अब क्या पढ़ना! और कक्ष में जोरदार ठहाका गूंजा।

यह चर्चा तो अपनी तय कार्यसूची के हिसाब से आगे बढ़ गई। मगर इस बात ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया कि सबसे पहले तो अगर हम शिक्षक ही नहीं पढ़ते हैं तो इसका परिणाम क्या होगा? शिक्षक होने के नाते तो हमें पढ़ते-लिखते रहना चाहिए। और क्या सरकारी नौकरी लगने से पढ़ना-लिखना बंद कर देना चाहिए? क्या अपने को सिर्फ विषयों की किताबों तक सीमित कर लेना ठीक है? क्या हमें अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए, अपनी सोच का दायरा बढ़ाने के लिए नहीं पढ़ना चाहिए? हमेशा किसी अपेक्षा के साथ पढ़ना ठीक है क्या?
एक शिक्षक के लिए तो यह बात और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इससे बच्चों को पढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। शिक्षकों को ही क्यों, सभी को पढ़ना-लिखना चाहिए। हम हिंदीभाषियों के साथ यही दिक्कत है कि यहां पढ़ने की संस्कृति ही नहीं है। हम घंटों बिना मुद्दे के बात कर सकते हैं। जैसे फलां फिल्म में अभिनेत्री ने बहुत भारी गहने पहने हैं, या पड़ोसी के घर की बातें, या फालतू संदेश पढ़ते रहते है। उसको आगे पहुंचाते रहते हंै। मगर उस समय का सार्थक उपयोग नहीं करते।

पढ़ने को लेकर आम धारणा यह भी है कि पढ़ना यानी सिर्फ परीक्षा पास होने के लिए पढ़ना। बच्चे बस पाठ्य पुस्तकें पढे, और बाकी किताबें (साहित्य वगैरह) फुरसत के समय में या गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ना चाहिए, समय पास करने के लिए। जबकि इन किताबों का उपयोग शुरुआती दौर में बच्चों को पढ़ने-लिखने में, सीखने में मदद करता है। यह पढ़ना तो सबके लिए जरूरी है, चाहे कोई भी उम्र हो या कोई भी व्यवसाय। इसको सिर्फ अपने काम तक जोड़ कर देखना ठीक नहीं। पढ़ने की आदत के दूरगामी फायदों से लोग अनजान हैं।
जब हम विभिन्न तरह की सामग्री पढ़ते हैं तो यह हमारे विचारों को निर्मित करने में मदद करता है। जो भी पढेंÞ, उस पर चिंतन करें, विमर्श करें। हम अपने आसपास ऐसे कई उदाहरण देख सकते हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि जिसे बचपन में कई सारी किताबें पढ़ने का मौका मिला है उसमें पढ़ने की आदत ज्यादा अच्छे तरीके से विकसित होती है। अपने विषय की किताबें पढ़ना तो ठीक है, मगर तरह-तरह के विषयों को पढ़ने से हमारी समझ का दायरा व्यापक होता जाता है। हमारे आसपास इतनी अमानवीय और गलत घटनाएं घट रही होती हैं मगर हम चुप रहते हैं, क्योंकि हमने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं है। बचपन से हमने यही होते देखा है। इस कारण इनमें हमें कुछ गलत, कुछ अलग नहीं लगता है। हमने चीजों को खुली नजर से देखा ही नहीं है। इसलिए समझ ही नहीं पाते हैं कि सही-गलत में अंतर कैसे करें।

किताबें हमें इस दिशा में काफी-कुछ सिखा सकती हैं। हम नया कुछ नहीं पढेंगे तो नई सोच कहां से आएगी। इसके लिए तरह-तरह की चीजें पढ़ते रहना चाहिए। उदाहरण के लिए, गौरेया के बारे में किसी कविता में उसके पंखों, उसके रंग, उसकी सुंदरता के बारे में बताया गया है। एक दूसरी कविता में गौरेया की लुप्त हो रही प्रजाति के बारे में चिंता जताई गई है कि कैसे पहले हमारे घरों के आंगन में गौरेया देखी जाती थी। मगर आजकल तो इनके दर्शन दुर्लभ हंै। खत्म होती गौरैया प्रजाति और पर्यावरण के बारे में कविता काफी कुछ बताती है। अगर कोई पहली वाली कविता ही पढ़ कर रह जाएगा तो वह गौरेया की सुंदरता से ही परिचित हो पाएगा मगर दूसरी कविता ने हमें एक और पहलू की ओर इंगित किया है।
‘बांध बनने से देश का विकास होता है’, इस तरह के उदहारण किताबों में अक्सर देखने को मिल जाते हैं। मगर दूसरे कई लेखों में यह भी बताया गया है कि बांध बनने से किस तरह से उसके प्रभाव में आने वाले लोगों का जीवन प्रभावित होता है, उनको विस्थापित होना पड़ता है। अगर हम दोनों पहलू को जानेंगे तो बांध पर अपनी राय ज्यादा अच्छे से बना सकेंगे। दो उदाहरण मैंने यहां अपनी बात को समझाने के लिए दिए हैं। हम जितना पढ़ते हैं, उतना ही दुनिया को पहले से अधिक समझते हैं। पढ़ने की आदत हमें एक अच्छा, तर्कशील इंसान बनने में मदद करती है।

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