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दुनिया मेरे आगेः वंचना की परतें

आमतौर पर व्यवस्था में घुली-मिली बातों, व्यवहारों और गतिविधियों को सामान्य मान कर हम अपने काम में लग जाते हैं, क्योंकि उसका सीधा असर हम पर नहीं पड़ता है।

Author June 3, 2017 2:25 AM
दिल्ली मेट्रो।

संतोष यादव

आमतौर पर व्यवस्था में घुली-मिली बातों, व्यवहारों और गतिविधियों को सामान्य मान कर हम अपने काम में लग जाते हैं, क्योंकि उसका सीधा असर हम पर नहीं पड़ता है। लेकिन कई बार उसके असर की जद में हम भी होते हैं, तब भी हमारा निरपेक्ष और प्रतिक्रिया से शून्य होना हैरान करता है। जबकि समाज में अपेक्षया समर्थ तबका अगर अपने से जुड़ी किसी समस्या पर प्रतिक्रिया देता है तो व्यवस्था के संचालकों को एक बार सोचना पड़ता है। दरअसल, समाज का जो वर्ग अपने अधिकारों या फिर अपनी सुविधाओं को लेकर सजग रहता है, उसे संतुष्ट रखना व्यवस्था के लिए जरूरी है। शायद इसलिए कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसके विरोध की आवाज बाकी लोगों तक भी पहुंच सकती है और वहां भी प्रतिक्रिया उभर सकती है। लेकिन अगर ऊपर से थोपी गई किसी गतिविधि या फैसले का असर उन वर्गों पर पड़ता है जिन्हें पहले ही हाशिये के किनारे माना जाता है तो असंगठित होने की वजह से न उनकी आवाज ठीक से उभर पाती है, न उनकी फिक्र की जाती है।

इस क्रम में होता यह है कि किसी सामान्य लगने वाले फैसले के नतीजे में कोई बड़ा जनसमूह अपने आप ही किसी खास सुविधा के दायरे से बाहर हो जाता है। उदाहरण के तौर पर हाल ही में दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन की रीढ़ बन चुकी मेट्रो ट्रेन के किराए में की गई भारी बढ़ोतरी को देखें तो पता चलता है कि इसका सबसे ज्यादा असर कमजोर और कम आय वाले तबके के लोगों पर पड़ा है। इनमें रोजाना स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राएं और छात्र, कम आय वाली नौकरियां करने वाले लोग या फिर दिहाड़ी पर निर्भर वे मजदूर शामिल हैं, जिनके लिए मेट्रो कुछ वक्त बचाने और अपनी पहुंच के खर्च पर अपनी पढ़ाई या काम की जगहों पर पहुंचने का एक बड़ा साधन बन गया था। केवल दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके कॉलेजों में ही नहीं, बल्कि दूसरे कॉलेजों के विद्यार्थी सुविधाजनक खर्च में मेट्रो के सहारे अपने घर से दूर के कॉलेज में भी कक्षाओं में शामिल होने चले जाते थे। इनमें से बहुत सारे ऐसे भी हैं जो देश के दूरदराज के इलाकों से आकर राजधानी दिल्ली में पढ़ाई करते हैं, पिछड़ी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से भी आते हैं और दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों में किराए पर कमरा लेकर रहते हैं।

मेट्रो ट्रेन इन सबके लिए कहीं भी आवाजाही का एक बेहतर साधन थी। लेकिन जिस तरह मेट्रो ने अपने किराए में बेतहाशा बढ़ोतरी की, उसका सीधा असर ऐसे विद्यार्थियों पर भी पड़ा है, जो अपने खर्च में कटौती करके इस शहर में रहते और पढ़ते हैं। हाल के दिनों में मैंने अपने कई दोस्तों और दूसरे लोगों को भी मेट्रो के बढ़े किराए को अपने लिए परेशानी का कारण बताते हुए सुना। अब अपने कॉलेज या विश्वविद्यालय तक पहुंचने का बढ़ा हुआ किराया पढ़ाई के अन्य खर्चों के साथ इनके ऊपर दोहरा भार बन गया है। तो क्या इन विद्यार्थियों को दूसरे बहानों से बेहतर शैक्षिक अवसरों से वंचित करने की कोशिश की जा रही है! क्या इसे संविधान में वर्णित अवसरों की समानता के मूल्य के हनन के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति की वजह से कोई व्यक्ति या समूह किसी सार्वजनिक सुविधा से वंचित हो जाता है?

इसके अलावा, दिल्ली में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि जगहों से आकर छोटे-मोटे रोजगार, नौकरी, मजदूरी या दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग इस शहर को चलायमान रखने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। इन लोगों की आमदनी और काम की प्रकृति वह नहीं है कि वे खुद को आभिजात्य आवरण में लपेट कर रख सकें। वे साफ-सुथरी मेट्रो में सफर करने वाले साफ-सुथरे लोगों के बीच शायद ‘आभिजात्य शोभा’ को बिगाड़ रहे थे। अब बढ़े किराए के बाद वे अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए खुद ही मेट्रो से बाहर होकर फिर से सड़क पर ‘हरी’ और ‘संतरी’ बसों का कई बार घंटों इंतजार करते रहने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि ‘लाल’ एसी बसों या मेट्रो में चढ़ने की इनकी आर्थिक हैसियत नहीं बची है। सार्वजनिक परिवहन के साधनों में किराया बढ़ोतरी को जीएसटी परिषद् की बैठक के संदर्भ में देखें तो कुछ नतीजों तक पहुंचा जा सकता है। इसमें सेवाओं के लिए दरें तय की गई हैं, जिसके तहत ‘उबर’ और ‘ओला’ जैसी ऐप आधारित टैक्सी सेवा देने वाली कंपनियों से टैक्सी की बुकिंग करना सस्ता हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि सार्वजनिक परिवहन की जगह अब टैक्सी सेवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। शिक्षा के एक बड़े हिस्से के निजीकरण के बाद अब धीरे-धीरे समूचे सार्वजनिक परिवहन को भी केवल मुनाफा केंद्रित बनाने और निजी हाथों में सौंपने की भूमिका बना कर राज्य अपनी एक और जिम्मेदारी से पीछे हटना चाहता है। जाहिर है, इसका सीधा असर उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर तबकों पर पड़ेगा, जो सार्वजनिक सुविधाओं के हाशिए से बाहर किए जाने की व्यवस्था के शिकार होंगे!

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