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सपने में देखा सपना

वर्तमान दौर की भागमभाग में मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि हम तनावहीन, शांतिपूर्ण जीवन जीएं।

सपने में देखा सपना

रमेश चंद मीणा

सपने, सपने ही होते हैं, कभी हकीकत नहीं हुआ करते। पर बिना सपने देखे विकास या सफलता भी नहीं मिला करती। आज जो जहां जितनी उंचाई या शिखर पर दिखाई देते हैं, उनके वहां होने और पहुंचने तक के बहुतेरे खुली आंखों से सपने भी नहीं देख पाते हैं। यानी जो जितना बड़ा सपना देखता है, वह उसे एक दिन हासिल भी कर सकता है। इतिहास भरा पड़ा है, ऐसे उदाहरणों से कि झोपड़ियों से महलों तक की यात्रा करने वाले भी हुए हैं, तो महलों से निकल कर जंगल पहुंचने वाले भी।

बंद आंखों के सपने हों या फिल्मी कैमरे से उतारे खुली आंखों देखे दृश्य, बड़े ही सुंदर, मनभावन और मनोहारी हुआ करते हैं। वाकई कैमरे से देखे गए वही दृश्य जब प्रत्यक्ष खुली आंखों से देखे जाते हैं तब उनमें कुछ भी खास नहीं दिखाई पड़ता। यह हकीकत सबको पता है, फिर भी हम अपनी कल्पना में अपने अतीत को सुनहरा और आकर्षक पाते हैं। उसी अतीत को, जिसकी कड़वी यादें भी जब रील की तरह आंखों के सामने चलने लगती हैं, तब हम कंपकपा जाते हैं।

जिस व्यक्ति के साथ हमने लंबा जीवन जीया होता है, अब जिसे लेकर कभी सपने में भी सपने की सोच नहीं पा रहे हों और जीवन एकरस बीतने लगे, तब किसी रात उसे लेकर बेहतरीन सपना आ जाए, तो सपने में सपना आने जैसा महसूस होता है। तब सोचना पड़ता है कि वाकई कैमरे के दृश्य जितने लुभावने हुआ करते हैं, वैसे ही वह जगह कभी भी हकीकत में वैसी और उतनी आकर्षक नहीं लगती है।

शुरुआती दस-बीस माह के साहचर्य में जो रूमानियत हुआ करती है, वह साल-दर-साल न जाने कहां और कब वक्त के अंधड़, तूफानों को सहते हुए रंग-रूप और व्यवहार सब बदल जाया करता है। फिर जीवन की गाड़ी ऐसे चला करती है कि जैसे चलते-चलते कब पहिया धुर्रे से बाहर निकल जाए और गाड़ी बेपटरी हो जाए! कुछ भी विश्वासपूर्वक नहीं कहा जा सकता। वे बोल, जो सुरीले और संगीतमय हुआ करते थे, समय गुजरने के साथ कर्कस और बेसुरे हो जाते हैं। सुर जैसे अब सधते ही नहीं।

ऐसे में वह रात भी कितनी हसीन कही जा सकती है, जिसमें सपने के अंदर भी मनभावन सपना देखने का सुअवसर मिल जाए और वैसा दौर, जो दशकों पहले बीत चुका हो! वह सब, वैसा ही अब सपने में भी नसीब नहीं हो पा रहा हो, वह सपने में घटित हो जाए। तब सपने में भी सपने पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है और सपने में पुन: सपना लौट कर आता है कि पहला बेशक सपना रहा होगा, अब जो कुछ देख सुन रहे हैं वह हकीकत है। जबकि जिसे हकीकत माना वह भी सपना ही निकलता है। ऐसा दोहरा सपना जिंदगी में पहली बार घटित होना रोमांच से भर देता है। विचार करते हैं तो पाते हैं कि ऐसे पल सपने में ही क्यों न हुए हो, हुए तो सही! हुआ तो अपने साथ ही! ऐसे पलों को भरपूर जीया जाना चाहिए।

ऐसे दुर्लभतम पलों को संजो कर रखने का एक ही तरीका होता है, सृजन में ढालना, लिपिबद्ध करना। ऐसा सपना जो भुलाए से भी नहीं भुलाया जा सकता। पर कब तक? सुबह होने के साथ ही सपने तो पानी के बुलबुले की भांति पल भर में ही विलीन हो जाया करते हैं। हजारों सपने न जाने कहां, कब लुप्त हो जाते हैं। कुछ ही सपने होते हैं जो सुबह तक ठहरते हैं, फिर जिंदगी की भाग-दौड़ में हम कहां और सपनें कहां?

माना कि ऐसा हम फिल्मी पर्दे पर देख-सुन पाते हैं, पर वह भी किसी पटकथा लेखक की निरी कल्पना हुआ करता है या कैमरे का कमाल होता है। दरअसल, जो कुछ हम पर्दे पर देखा करते हैं, वह उनका भी सच नहीं होता, जो अभिनय कर रहे होते हैं। इस अर्थ में सपने और आदर्श कभी भी जमीनी हकीकत नहीं हो पाते हैं।

वर्तमान दौर की भागमभाग में मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि हम तनावहीन, शांतिपूर्ण जीवन जीएं। इसके लिए छोटी-छोटी खुशियां, छोटे-छोटे खुशी के पलों को बड़ा करके, जीने का शऊर पैदा करें। हमें अपनी मानसिकता भी बदलनी होती है। दरअसल कभी भी बड़ी खुशी बार-बार और लंबे समय तक नहीं मिला करती। सो, हमें बड़ी खुशी का इंतजार करने के बजाय, ऐसे पल जिनमें छोटी खुशियां हो सकती हैं, खोजने, पहचानने और उन्हें जीने की जरूरत है। आज समस्याओं की कमी नहीं है, जीवन पेचीदा, जटिल और बहुत तनाव भरा हो चला है। ऐसे खुशी के पल सपने में ही सही, उन पलों को भी जीवन का हिस्सा बनाया जा सकता है, बनाया जाना ही चाहिए।

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