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त्रासद सपनों की विरासत

भूखा आदमी परेशान है। एक छोटा-सा परिवार भी है उसका। कितनी भयानक सर्दी है। पेट में अन्न का दाना नहीं।

Author Updated: February 26, 2021 4:30 AM
Airसांकेतिक फोटो।

सुरेश सेठ

भूखा आदमी परेशान है। एक छोटा-सा परिवार भी है उसका। कितनी भयानक सर्दी है। पेट में अन्न का दाना नहीं। पहनने को पूरे कपड़े नहीं। बाप-दादा के जमाने का एक छोटा-सा कमरा विरासत में मिला था। वक्त के थपेड़ों ने उसे लगभग खंडहर बना दिया। न जाने कहां कहां से सर्द हवा तीर की तरह सबके सीने में उतरती है।

कभी-कभी सोचते हैं, इससे तो मौत बेहतर है। क्यों न इस जिंदगी का अंत ही कर दें। फिर भी सब सपने देखते हैं। टूटे-फूटे त्रासद सपने। मरने के बाद शायद उनके पीछे बचे इस परिवार को इसका कुछ मुआवजा मिल जाए। बच्चों के बदन पर कपड़े आ जाएं। टूटी छत की मरम्मत हो जाए।

मगर अपने सपनों में मरने से क्या होगा? कई वर्षों से मरने वालों की गिनती नहीं होती। गिनती हो तो मुआवजा देना पड़ता है। इसलिए उन्हें तो सीधे-सीधे निबटा दो। अत्यधिक शीत से अकड़ कर मर गए तो हम कहेंगे, हाजमा दुरुस्त नहीं था, मर गया। इन गरीबों की पारिवारिक कलह भी बहुत होती है। इसलिए फंदा लगा कर मर गया।

सपने चलते हैं बंधुवर। आंकड़े गवाह हैं, कि भूख से कोई नया आदमी नहीं मरा। फसलें मरने से किसी नए किसान ने फंदा नहीं लगाया। आपने कैसे कह दिया कि इस देश में हरित क्रांतियां विफल हो गर्इं। पहले से किसी लाभ का नामोनिशान नहीं बचा और दूसरी हरित क्रांति शुरू करने का साहस ही नहीं हुआ। हम तो पर्यावरण प्रदूषण संधि पर भी हस्ताक्षर कर आए थे, चाहे हमारा दादा भाई अमेरिका बहाना लगा कर इससे बाहर हो गया।

सपना चल रहा है। हम करेंगे भाई, प्रदूषण नियंत्रण पर काम शुरू करेंगे, लेकिन दो साल के बाद। इस बीच मौसम की बदमिजाजी सहन कीजिए। अपनी फसलों को मरता देखिए, मंडियों में उन्हें खुले पड़े-पड़े खराब होते देखिए। बाहर जो मंडी के चौराहे में लटक कर मर गया, वह तो एक पगला था। अब जब जान ही नहीं रहेगी तो उसे कैसे पता चलेगा कि हम अगले पांच वर्षों में देश की आय दोगुनी कर देते।

हम इसे इतना बाहुबली बना देते कि चीन और अमेरिका भी कहीं पीछे छूट जाते। परिभाषाएं बदल जातीं? छोटा भाई बड़ा कहलाने लगता, और बड़ा छोटा होकर फिसड्डी हो जाता। पर आह! तुमने हमारे भाषणों, वायदों और दिलासा भरे तेवरों का विश्वास नहीं किया, और अब फंदा लेकर लटके हुए हो चौराहे पर।

भूखा आदमी परेशान है। ऐसे विरोधाभासी वक्तव्यों से वह कैसे संतुष्ठ हो जाए? वह एक आदमी नहीं, मर-भुक्खों की जमात है। हर वर्ष इनकी संख्या को घटता बता दिया जाता है। अभी सरकारी डेस्क से इनकी संख्या मात्र बाईस करोड़ बताई जा रही है, लेकिन भूखा आदमी सोचता है, बाईस करोड़ है कि एक सौ बाईस करोड़।

सुना था, उसके देश में एक सौ तीस करोड़ लोग बसते हैं। उनमें से उसे तो हर व्यक्ति अपने जैसा लगता है। फुटपाथ पर सिकुड़ी पड़ी लाश-सा आदमी, अपनी झुग्गी-झोंपड़ी की टूटी खपरैल में से अपनी मोतियाबिंद भरी आंखों से डूबते चांद और उगते हुए सूरज की तलाश करता हुआ आदमी। अपनी टूटी साइकिल पर बीवी को बिठा कर चलता हुआ आदमी। पास से धूल उड़ा कर निकल जाती आयातित कार को देखता आदमी।

आदमी और आदमी। भीड़ के कोलाहल में कुछ सुनाई नहीं देता। कभी लगता, यह आसान जिंदगी जीने के लिए नारा लगाते लोगों का जुलूस है। फिर लगता, भूल हो गई। यहां क्रोध में नारा लगाते हुए लोगों का जुलूस कहां। रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्म पर अपने घुटनों में सिर देकर बैठे हुए उदास लोगों का जमावड़ा है, जो खुशहाली की उस ट्रेन के अपने प्लेटफार्म पर आने का वर्षों से इंतजार कर रहे हैं।

यह ट्रेन कभी आती नहीं। उसके लेट आने की कोई घोषणा भी नहीं होती। कोई उन्हें यह नहीं बताता कि उनके प्लेटफार्म पर आने वाली ट्रेनों की संभावना स्थगित हो गई। शायद ट्रेनें चलने वाले स्टेशन से ही रद्द हो जाती हैं।

बीच रास्ते में बैठे जुमलेबाजों ने उन्हें अपने आगोश में समेट लिया। अब ये ट्रेनें केवल उनके घरों की परिक्रमा करती हैं। कभी किसी ट्रेन को अट्टालिकाओं की नींव से चल कर उनके शिखर तक जाते देखा है? नहीं देखा न, तो यहां आकर देख लो। आसमान की ओर जाती हुई ट्रेनों से लेकर उड़नखटोलों तक को, जो इन लकदक बस्तियों में कैद होकर रह गए। देखो, देश के पर्यटन व्यवसाय को तरक्की मिल रही है। विदेशी अपने देश में अधिक संख्या में आएंगे।

प्रचार पुस्तिकाएं कहती हैं, आओ-आओ, हमारे देश में कुछ नया भारत देख लो। पहले सिर्फ ताजमहल और कुतुबमीनार देखने आते थे, अब इन नई उभरती बस्तियों को देख लो। बहुमंजिला मॉल प्लाजाओं को देख लो। देखो, हमारे बायस्कोप में बारह मन की धोबिन नहीं, बीस मंजिली इमारतें दिखाई जाती हैं। फ्लाई ओवर नजर आते हैं।

पर्यटक उन्हें देख कर चकित होते हैं, वे कहते हैं, आह! यह देश हमारी गुलामी से आजाद होते ही कितनी तरक्की कर गया। इनके पिछवाड़े बसी गंदी बस्तियों को न देखना, अधूरे फ्लाई ओवरों से हाथ मिलाने न जाना, कहीं सब सपने न टूट जाएं।

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