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दुनिया मेरे आगे: घरेलू हिंसा के बीज

घरेलू हिंसा इंसान को भीतर तक घायल कर देती है, मानसिक तौर पर बीमार बना देती है, जिसका अहसास पीड़ित व्यक्ति को काफी समय बाद होता है। इतनी देर हो चुकी होती है कि तब तक वह गहरे अवसाद में डूब जाता है और कई अनचाही व्याधियों से अपने को घिरा पाता है।

घरेलू हिंसा से दुनिया के सभी देशों के लोग पीड़ित रहे हैं। इस बुराई काे खत्म करने के लिए समाज को आगे बढ़कर निदान निकालना होगा।

एकता कानूनगो बक्षी

किस्से, कहानियां हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व के निर्माण की नींव में बचपन में सुने किस्सों का भी बड़ा योगदान रहता है। कई व्यावहारिक बातें, बाहरी दुनिया से श्ुरुआती परिचय और वैचारिक दृष्टि सहज और रोचक ढंग से कहानियों के द्वारा हम सबमें विकसित होती जाती है।

बचपन में अक्सर हम सभी ने एक बच्ची की कहानी अलग-अलग रूप में सुनी और पढ़ी है, जिसके साथ उसके परिवार के सदस्यों का ही रवैया बहुत निर्मम रहता है। बचपन में खेलने पढ़ने की उम्र में ही घर के बहुत सारे कामों और जिम्मेदारियों का बोझ निर्दयता से नन्ही बच्ची पर डाल दिया जाता है।

सभी काम अच्छे से करने के बाद भी मुश्किल से ही उसे रूखी-सूखी रोटी मिल पाती और स्नेह की जगह अपमान के कुछ शब्द। लेकिन इस सब के बावजूद अपने धैर्य, सौम्य और साहसी स्वभाव के कारण वह दिनोंदिन और भी खूबसूरत होती चली जाती है। अंत में एक राजकुमार उसकी सारी परेशानियां खत्म कर उसे हमेशा के लिए अपने साथ महल में ले जाता है। लड़की राजकुमार के साथ खुश और संतुष्ट दिखाई देती है।

इस तरह की कहानी के माध्यम से हमारा पहला परिचय ‘घरेलू हिंसा’ से होता है। यह कहानी बालमन को देखते हुए बनाई गई है, इसलिए कई परतों में बहुत सारी कड़वी सच्चाइयों को छिपा कर बस हल्का-सा संकेत दिया जाता है कि हिंसा कहीं से भी शुरू हो सकती है। फिर वह हमारा अपना घर-परिवार ही क्यों न हो। असल जीवन में यह घटना किसी भी उम्र की स्त्री के साथ घटित हो सकती है। कहानी का अंत आशा और विश्वास जरूर जगा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में यह इतना खुशनुमा नहीं हो सकता।

घरेलू हिंसा इंसान को भीतर तक घायल कर देती है, मानसिक तौर पर बीमार बना देती है, जिसका अहसास पीड़ित व्यक्ति को काफी समय बाद होता है। इतनी देर हो चुकी होती है कि तब तक वह गहरे अवसाद में डूब जाता है और कई अनचाही व्याधियों से अपने को घिरा पाता है।

इस तरह की हिंसा करने वाले लोग कोई अन्य नहीं, बल्कि कई बार पीड़ित के अपने परिवार के सदस्य ही होते हैं। जबकि पारंपरिक सोच और उम्मीद यह होती है कि परिवार के सदस्य हमेशा हमारा बेहतर ही सोचते हैं। इन स्थितियों में पीड़ित खुद का ही गलत तरीके से आकलन करने पर विवश हो जाता है, खुद को कमतर महसूस कर हीन भावना से भर जाता है। नतीजतन, उसके तन-मन के स्वास्थ्य की स्थिति भी चिंतनीय होती जाती है।

घरेलू हिंसा का एक बहुत बड़ा कारण हमारी परवरिश की वे खामियां भी हैं, जिसमें अक्सर जीवन के एक पक्ष पर अधिक जोर दिया जाता है। अपनों के प्रति निस्वार्थ प्रेम, समर्पण, त्याग, सहनशीलता, विश्वास, आदर के बीज तो बिना चूक किए रोप दिए जाते हैं, लेकिन रिश्तों के कुछ पहलुओं को लेकर उदासीन और चलताऊ रवैया अपना लिया जाता है। मसलन, परिवार के हर सदस्य को उसकी काबिलियत और लिंग के हिसाब से अलग-अलग आंकना और भेदभाव करना।

हमारे समाज में अपने से बड़ों के निर्णयों पर कोई सवाल खड़ा करना अशिष्टता के रूप में देखा जाता रहा है। बिना सवाल किए बड़ों के या व्यक्ति विशेष के विचारों पर अनुसरण करना ही सदाचार की श्रेणी में माना गया है। खुद के विचारों के प्रति आस्था रखना और आत्मसम्मान को अक्सर उतना महत्त्व नहीं दिया जाता, जो जीवन में सफलता, आत्मबल और खुशियों का प्रमुख आधार है।

अपने परिवार की जरूरतों का ध्यान रखना जिस तरह हमारा नैतिक दायित्व है, उसी तरह स्वयं पर निगाह रखना रखना भी बेहद जरूरी है। अपने पर विचार करते हुए किसी भी तरह की अत्यधिक आत्मग्लानि से बचा जाना चाहिए। जब तक हम खुद का ध्यान नही रखेंगे, तब तक हम दूसरों का भी ध्यान नहीं रख सकते। लंबे समय तक केवल सहन करते रहने से यह मानसिक तनाव दीमक की तरह किसी भी पीड़ित को भीतर से खोखला कर देता है।

यह अफसोसजनक है कि दूसरों पर निर्भरता, असुरक्षा और लोक लज्जा जैसे कई कारणों के चलते घरेलू हिंसा पर बात नहीं की जाती है। सबसे पहले हमें खुद की और खुद के जीवन की जिम्मेदारी लेनी होगी। अपने विकास के लिए हर व्यक्ति को थोड़ा समय हर दिन निकालना चाहिए।

प्राथमिकताओं की सूची में खुद के लिए भी स्थान सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। बदलते समय के साथ अद्यतन रहना, अपनी सेहत का ध्यान रखना, अपनी खुशियों के अवसर बिना किसी विरोधाभास के ढूंढ़ना और हरसंभव कोशिश करना कि हम हर दिन बेहतर और मजबूत बनते रहें।

एक योद्धा की तरह स्थितियों से संघर्ष करते हुए खुद के बलबूते पर जीने के लिए नए सिरे से तैयार हुआ व्यक्ति दूसरों के लिए मिसाल तो है ही, साथ ही उन लोगों को भी कड़ा जवाब है जो ये सोचते हैं कि रूढ़िवादी परंपराओं से बंधे अनुशासित पारिवारिक ढांचे, पारिवारिक एकजुटता और सुखों का आधार होते हैं।

वास्तविकता यह है कि परिवार की मजबूत डोर स्नेह, सम्मान, विश्वास और संवेदनाओं के कोमल, नाजुक धागों में गुंथी हुई है। इस सूत्र में पड़ी अनाचार, शोषण और गैरबराबरी की गांठें ही घरेलू हिंसा के विषवृक्ष का असली बीज होती हैं।

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