दुनिया मेरे आगेः नकल का मर्ज - Jansatta
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दुनिया मेरे आगेः नकल का मर्ज

हर बार परीक्षा की शुरुआत होते ही सरकार और शिक्षा प्रशासन नकल माफियाओं से बचने के नए-नए तरीके सोचते हैं, लेकिन नकल करने वाले एक कदम आगे दिखते हैं।

Author March 7, 2016 2:57 AM
परीक्षा के दौरान नकल

हर बार परीक्षा की शुरुआत होते ही सरकार और शिक्षा प्रशासन नकल माफियाओं से बचने के नए-नए तरीके सोचते हैं, लेकिन नकल करने वाले एक कदम आगे दिखते हैं। नकल करने वालों में आमतौर पर गावों या कस्बों वाले इलाके के लोग ही दिखते हैं या पकड़े जाते हैं। शायद हम लोगों की नजरों को गांव तो दिख जाते हैं, लेकिन शहर बड़ी चालाकी से छिप जाते हैं। ऐसा नहीं है कि शहर के बच्चे नकल नहीं करते हैं, बल्कि सच यह है कि उनके नकल करने के शहरी सलीके उन्हें ढक लेते हैं। फिर शहर और गांवों की पढ़ाई की व्यवस्था में बहुत अंतर है और इसका फासला हम शहर के नाम से ही समझ जाते हैं।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों को नकल करना उनके मां-बाप नहीं सिखाते हैं, बल्कि यह कला भी उन्हें उसी विद्या के मंदिर में सीखने को मिलती है, जहां उनके माता-पिता उन्हें अक्ल सीखने भेजते हैं। इस बात पर अगर हम गहराई से सोचें तो समझ सकते हैं कि नकल करना शायद बच्चों को पसंद नहीं होता होगा, बल्कि यह उनकी मजबूरी होती है। आमतौर पर सरकारी स्कूलों की पढ़ाई ही ऐसी है कि बच्चों को पास होने के लिए नकल करनी पड़ती है। गांवों-कस्बों में शिक्षक स्कूलों में पढ़ाने के बजाय अलग से ट्यूशन पढ़ाना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योकि उसमें अपनी तनख्वाह के अलावा अच्छी-खासी रकम मिल जाती है। बहुत सारे शिक्षक तो स्कूल में सिर्फ हाजिरी लगाने के लिए जाते हैं। जो जाते भी हैं, उन्हें ईमानदारी से बच्चों को पढ़ाना जरूरी नहीं लगता। कम ही शिक्षक ऐसे होते हैं जो अपने इस पद का मान करते हुए बच्चों को पढ़ाते हैं।

अब सवाल यह है कि अगर बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी तो बच्चे परीक्षाएं पास होने के लिए क्या करें! अगर उनको शुरुआत से ही अच्छी शिक्षा मुहैया कराई जाए और उन्हें अपने विषय का ज्ञान हो तो वे क्यों नकल करेंगे? ऐसा नहीं है कि गांवों के बच्चे पढ़ना-लिखना नहीं चाहते हैं। लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए भी तो कोई होना चाहिए! अगर बच्चों को प्यार से समझा कर अच्छे से उनका मार्गदर्शन किया जाए तो सिर्फ शहर के ही नहीं, बल्कि गांवों के बच्चे भी अपना नाम रोशन कर सकते हैं। बच्चे शहर या गांव के नहीं होते हैं, बल्कि उन्हें शहर या गांव का बनाया जाता है। बहुत सारे परिवारों की गरीबी उनके बच्चों को शहरों मे पढ़ने के लिए भेज नहीं सकती। और गांव के शिक्षक बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं दे पाते कि वे गांव में रहते हुए भी शहरों के अच्छे और निजी स्कूलों के बच्चों की बराबरी कर लें।

जब कोई बच्चा नकल करते हुए पकड़ा जाता है तो उसे परीक्षा से निकाल दिया जाता है और उसका पूरा साल बर्बाद हो जाता है। लेकिन क्या इसमें उन माता-पिता की गलती होती है, जो एक-एक पैसा जोड़ कर अपने बच्चे को पढ़ने के लिए भेजते हैं या फिर उन बच्चों की जो हर दिन स्कूल आकर अपना हर दिन का छह घंटा स्कूल में पढ़ने के लिए ही बिताते हैं। वे इस नुकसान की भरपाई क्यों करें? इसकी भरपाई तो उन शिक्षकों को करनी चाहिए जो उन बच्चों को इतना शिक्षित नहीं कर पाते हैं और उन्हें नकल करने पर मजबूर करते हैं। शिक्षक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि हमने बहुत कोशिश की, पर बच्चा पढ़ने में मन नहीं लगाता है! लेकिन क्या यह स्कूल और शिक्षकों की कमी नहीं है कि बच्चा पढ़ने में मन नहीं लगाता है?

अगर बच्चों के माता-पिता अपने बच्चे को उतना प्रशिक्षित कर ही पाते तब फिर स्कूल की जिम्मेदारी क्या रह जाती है? किसी बच्चे के माता-पिता अनपढ़ भी हो सकते हैं। कहते हैं कि बच्चे प्यार का रूप होते हैं, उन्हें आप जैसे चाहें वैसे ढाल सकते हैं। अगर बच्चों को अच्छा मार्गदर्शक मिले तो वे बहुत अच्छा कर सकते हैं। उन्हें प्यार से पढ़ाया जाए तो वे पढ़ सकते हैं।

नकल की सजा बच्चों के बजाय उन्हें मिलनी चाहिए, जिनकी वजह से बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है। नकल करते हुए पकड़े जाने पर बच्चों को उस परीक्षा से निकालने के बजाय उन शिक्षकों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए, जिन्होंने उन्हें पढ़ाया है या जिनके संरक्षण में वे नकल रहे थे। मेरा यह साफ मानना है कि अगर अध्यापक बच्चों को अच्छी शिक्षा देंगे तो उन्हें नकल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सिर्फ परीक्षा के समय नकल पर रोक लगाने से नकल की समस्या खत्म नहीं होगी और न ही नकल करते हुए बच्चों को पकड़ कर उन्हें परीक्षा से बाहर निकालने से। यह समस्या तब हमारे देश से खत्म होगी जब हमारे बच्चों को पढ़ने-लिखने और शिक्षित होने के तमाम संसाधन और सुविधाएं अच्छे से मुहैया कराई जाएंगी। इसमें सबसे ज्यादा बड़ी भूमिका शिक्षकों की होगी।

हिमांशी पटवा

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