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दुनिया मेरे आगेः सफर की दिशा

आज भी भारत के अतीत को याद करते हुए सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों और चरित्र का ही संदर्भ आता है। ऐसी बातें भी आमतौर पर सुनी जा सकती हैं कि जब धन गया तो कुछ नहीं गया, जब सेहत गई तो बहुत कुछ गया और जब चरित्र गया तो सब कुछ गया।

Author May 21, 2016 2:26 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुमेर चंद

आज भी भारत के अतीत को याद करते हुए सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों और चरित्र का ही संदर्भ आता है। ऐसी बातें भी आमतौर पर सुनी जा सकती हैं कि जब धन गया तो कुछ नहीं गया, जब सेहत गई तो बहुत कुछ गया और जब चरित्र गया तो सब कुछ गया। हमारे देश पर कई सौ साल तक विदेशियों ने राज किया। इसके बावजूद वे भारत की चरित्रगत खासियतों को बदल नहीं सके। खासतौर पर गुलामी के दौर में साधारण लोगों के बीच स्कूलों और कॉलेजों की पढ़ाई नाममात्र की थी, लेकिन तब भी कम से कम साधारण लोगों का चरित्र अपने आप में उदाहरण था। जिन्हें अनपढ़ कहा जाता था, वैसे लोग ही आमतौर पर झूठ बोलने या दूसरों को धोखा देने से पहले हिचकते थे।

दूसरे के धन पर कब्जा जमाने की फिराक में रहने के बजाय अपनी मेहनत की कमाई में ही बरकत समझी जाती थी। एक कहावत थी- ‘देख पराई चूपड़ी मत ललचाए जी, रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पी।’ अपनी छवि बिगड़ जाने का डर था और सबसे अहम यह कि समाज खुद एक अघोषित पुलिस के तौर पर मौजूद था। अपने मन पर बोझ डालना मर जाने समान समझा जाता था। यह बात आम लोगों के बीच आम थी कि आंख, कान और पैर तो पशुओं के भी होते हैं, लेकिन मनुष्य के पास अक्ल और जमीर नाम का असल धन होता है, जिसकी रखवाली करना बहुत ही कठिन काम है।

विडंबना यह है कि भारत से गुलामी का साया तो छंट गया, अपना राज भी आ गया, हमने खुद राज चलाने वाले को चुन कर भेजा, लेकिन समाज और राजनीति का चेहरा पहले के उलट होता गया। चुनाव का सीधा मकसद होता है अच्छों में से अच्छे को छांटना। लेकिन ज्यों-ज्यों ‘अच्छों’ को चुनते हुए समय बीतता जा रहा है, हम देश को आजाद होेते देखने वालों का सब्र अब जवाब देने लगा है। एक आह-सी निकलती है कि क्या यही देश बनाने के लिए हमारे शहीदों ने फांसी का फंदा चूमा था, लाखों ने जेलों में यातनाएं झेली थीं..!

रोज सुबह जब अखबार खोलते हैं या टीवी की एक झलक देखते हैं तो हत्या, बलात्कार, चोरी, डाका, आत्महत्या, भाई द्वारा भाई का कत्ल, बेटे द्वारा बाप का कत्ल, नेताओं का भ्रष्टाचार और घोटाला, हमारी अगुआई करने वालों की धोखाधड़ी, शिक्षकों का आचरण, नाबालिग बच्चों तक के अपराधों में शामिल होने और न जाने किस-किस तरह की नकारात्मक और अफसोस से भर देने वाली खबरें मिलती हैं। ये तो सामाजिक यातनाएं हैं। इससे इतर विकास के मोर्चे पर देखें तो जो भवन या पुल वगैरह अंग्रेजों ने बनवाए थे, वे आज भी मजबूती से काम कर रहे हैं, लेकिन हमारी अपनी सरकारों और नेताओं द्वारा बनवाए गए पुल और सड़कों की गति किसी से छिपी नहीं है। सरकारी नौकरियां बिकती हैं, तबादलों की बोली लगती है। कई बड़े नेता चोटी तक भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं यानी भ्रष्टाचार का नाच हो रहा है!

सवाल है कि जिस ईमानदारी और चरित्र का हम अक्सर गुणगान करते रहते हैं, आज वे कहां पाए जाते हैं, किस कोने में छिपे हैं कि खोजना मुश्किल हो गया है! जो भारतीय अपने आत्मसम्मान के लिए जीने और मरने का दावा करते थे, वह स्वाभिमान कहां गया! बल्कि आज तो हालत यह है कि अगर कोई व्यक्ति आत्मसम्मान की बात करता है तो उसे बुद्धू मान कर किनारे कर दिया जाता है। दूसरी ओर, देश के खर्चे पर पढ़ाई-लिखाई करके डिग्री हासिल कर जो युवा विदेश चले जाते हैं, उन्हें वहां मोटी तनख्वाह मिलती है, उसका गुणगान होता है। लेकिन ऐसे लोगों के बारे में चर्चा करते हुए शायद ही कभी उनके आचरण या देश प्रेम का जिक्र होता है। हमने पैसा और पद को ही सब कुछ समझ लिया है, चरित्र या आचरण को बट्टे-खाते डाल दिया है। देश में रहने वाले लोगों को देशभक्ति और प्रतिबद्धता की कसौटी पर कसा जाता है और बिना किसी बड़ी वजह के सिर्फ अपनी सुविधा के लिए विदेश जाकर सुखी जीने वालों की देशभक्ति कभी कठघरे में खड़ी नहीं की जाती।

जो समाज अपनी खामियों या कमजोरियों को स्वीकार नहीं करता है, उससे निपटने की कोशिश नहीं करता है, वह पिछड़ जाता है। अगर अब भी हम इस बात को महसूस कर सकें कि बतौर नागरिक हमारा चरित्र न देश के लिए फायदेमंद है, न समाज या खुद के लिए, तो भविष्य की राह मुश्किल होगी। सवाल है कि अगर देश को ऊंचे तटबंध, मिसाइल या दूसरे तमाम मारक हथियारों से लैस किया जा रहा हो तो उसमें एक सभ्य और संवेदनशील नागरिक के लिए क्या जगह है! भारत के अतीत के राग को गाते हुए हम आखिर किस मंजिल के सफर पर हैं! ईमानदार चरित्र और प्रगतिशील सोच वाले समाज के बिना हमारा सफर कहां तक पहुंचेगा!

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