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पढ़ाई के पैमाने

मेरे सामने अक्सर यह सवाल एक उलझन के रूप में सामने आता है कि शिक्षकों के अध्ययन का दायरा क्या हो! पाठ्यक्रम को अगर छोड़ दें तो स्कूलों में कहानी-कविता आदि पढ़ने वाले शिक्षकों की..

Author नई दिल्ली | November 8, 2015 9:29 PM
सच तो यह है कि सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा और शिक्षा के बाजारीकरण की जिम्मेदारी सरकार पर आती है।

मेरे सामने अक्सर यह सवाल एक उलझन के रूप में सामने आता है कि शिक्षकों के अध्ययन का दायरा क्या हो! पाठ्यक्रम को अगर छोड़ दें तो स्कूलों में कहानी-कविता आदि पढ़ने वाले शिक्षकों की खासी कमी है। पढ़ने के नाम पर हमारे शिक्षक अखबार पढ़ने को ही पढ़ना मान लेते हैं। जबकि भाषा कौशल विकास में पढ़ने को भी एक कौशल के रूप में शामिल किया जाता है। हिंदी कहानी कई मोड़ और मुहानों से गुजर कर यहां तक पहुंची है। लंबी कहानी, लघु कहानी, नई कहानी, आधुनिक कहानी, उत्तर आधुनिक कहानी, प्रगतिशील कहानी आदि संज्ञा से हम हिंदी कहानी आंदोलन को देखते हैं। इन आंदोलनों के सूत्रधार जो भी थे, उनकी प्रतिबद्धताओं से किसी को गुरेज नहीं हो सकता। कहानी ने आंदोलनों के दौर में अपनी काया में भी बदलाव किया। साथ ही इसकी मान्यताएं भी बदलीं। लेकिन जो तत्त्व नहीं बदले, वे हैं कथानक और कहने की शैली।

यह सभी जानते हैं कि कहानियां न केवल बच्चों को, बल्कि बड़ों को भी प्रभावित करती रही हैं। हम सबने अपने बचपन में कहानियां जरूर सुनी होंगी। लेकिन परिपक्व लोगों और बच्चों को ध्यान में रख कर लिखी गई कहानियों काफी अंतर दिखाई देता है। वह फांक न केवल कथावस्तु, बल्कि भाषा और प्रस्तुतिकरण के स्तर पर भी साफ दिखाई देती है। लेकिन बाल कहानियां परोसने वाली पत्रिकाओं की भी काफी कमी महसूस की जाती रही है। अगर बाल कथा और बाल पत्रिका की तलाश में निकलें तो निराशा ही हाथ लगेगी। हिंदी में देखें तो ‘नंदन’, ‘बालहंस’, ‘चंपक’, ‘चंदामामा’ को छोड़ शायद ही कोई और नाम याद आए। दरअसल, बाल कहानियों और बाल पत्रिकाओं को बाजार के हिसाब से न तो देखा गया और न गंभीरता से इस ओर ध्यान दिया गया।

अगर हम भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाली बाल पत्रिकाओं के बारे में जानकारी लेना भी चाहें तो संभव है दस की संख्या मुश्किल से पार कर पाएं। उत्तर भारत में लोगों के साथ एक समस्या यह भी है कि हम हिंदी से बाहर झांकना मुनासिब नहीं समझते। हमारा दायरा और दरकार भी सीमित हो जाते हैं। कुछ प्रमुख प्रकाशनों और पत्रिकाओं के नाम तो हम जानते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रसिद्ध पत्रिकाओं के बारे में हमारी समझ और जानकारी हलकी ही रहती है। जाहिर है, स्थानीय लघु बाल पत्रिकाओं को वह स्थान नहीं मिल पाता जो महानगर से निकलने वाली पत्रिकाओं को मिलता है।

हालांकि बाल साहित्य को बढ़ावा देने के लिए राज्य-स्तर पर काफी काम हो रहा है, लेकिन उनकी पहचान और पहुंच अब भी सीमित है, मसलन ‘शैक्षिक दखल’, ‘दीवार पत्रिका’, ‘संदर्भ’ आदि। इनमें शामिल कुछ वे पत्रिकाएं भी हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। लेकिन यह सौभाग्य उन हजारों पत्रिकाओं को नसीब नहीं है जिनकी पचास या सौ प्रतियां छपती हैं, जिन्हें खरीदने वाले भी बड़ी मुश्किल से मिला करते हैं। आर्थिक पक्ष कमजोर होने के कारण अच्छी और प्रतिष्ठित पत्रिकाएं हमारे बीच से गायब हो गर्इं। लघु पत्रिकाओं को जीवनदान देने वाले प्राय: लेखक ही होते हैं। इन्हें सरकारी प्राणवायु कम ही मिल पाती है। लिहाजा, इन्हें अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ती है।

क्या किसी बचपन की कल्पना बिना कथा-कहानी के की जा सकती है? क्या कहानियों, पत्रिकाओं के बगैर पढ़ने की आदत विकसित की जा सकती है? बच्चों में पढ़ने की रुचि विकसित करनी है तो उन्हें बाल साहित्य उपलब्ध कराना होगा। वहीं हमारे शिक्षकों और अभिभावकों को भी साहित्यिक रुचि को बचाए रखना होगा। अगर वे खुद पत्रिकाएं, कहानियां आदि नहीं पढ़ेंगे, तो वे किस प्रकार बच्चों को बाल गीत, बाल कहानी उपलब्ध करा पाएंगे!
मुझे अक्सर शिक्षकों से बातचीत करने का मौका मिलता रहा है। उनके साथ बातचीत में जो तथ्य निकल कर आते हैं वे बड़े चिंताजनक हैं। शिक्षकों की रुचि साहित्य पढ़ने में बहुत कम है; वे पत्र-पत्रिकाएं भी पढ़ना जरूरी नहीं समझते। इसमें बहाना यह गढ़ लिया जाता है कि वक्त नहीं मिलता।

हालांकि कई शिक्षकों और शिक्षिकाओं का यह भी मानना है कि वे पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन कौन-सी किताब पढ़ें, इसकी न तो जानकारी है और न समझ। अगर कुछ खास पढ़ने का सुझाव दिया जाए तो वे तपाक से कहते हैं कि हमारी नौकरी आपके जैसी नहीं है कि पढ़ते-लिखते रहें। हमें कॉपियां भी जांचनी पड़ती हैं, जनगणना, सर्वे जैसे गैर-शैक्षिक काम भी निपटाने होते हैं। ये बातें एकबारगी तर्कसंगत लगती हैं। लेकिन मुझे लगता है कि ज्यादातर मामलों में ये बचने के तौर-तरीके हैं। शायद इसलिए भी कि इन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ने को पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखा। लेकिन पढ़ने का असल मर्म जीवन की किसी भौतिक आवश्यकता की पूर्ति में नहीं, बल्कि चेतना के स्तर पर खुद को विकसित करने में है। (कौशलेंद्र प्रपन्न)

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