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कुदरत के राग-रंग

धीरे-धीरे दुर्लभ होते जा रहे इन कीड़ों पर नजर पड़ती है तो ये मन को आकर्षित करते हैं।

कुदरत के राग-रंग

सुरेशचंद्र रोहरा

बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका असली नाम क्या है! बरसात के मौसम में जब बादल घिर आते हैं, चारों ओर हरियाली फैल जाती है, हर तरफ पानी-पानी होता है, हरी घास की तितलियों का आगमन हो चुका होता है, मन मयूर बन नाचने लगता है, तब ऐसे में अगर अचानक ही खेत-खलिहान, रेतीली जमीन पर एक लाल कीड़ा दिख जाए, तो मन में उत्सुकता पैदा हो जाना स्वाभाविक है।

नन्हे-नन्हे बच्चे इस लाल कीड़े को देखकर आश्चर्य से एक रहस्यमयी दुनिया की कल्पना करने लगते हैं। दरअसल, यह है वीर बहूटी या रेड वेल्वेट माइट। कोई बताने-समझाने वाला नहीं कि यह क्या है! पास में हमउम्र बच्चे साथी होते हैं और उनकी निगाह बरबस लाल कीड़े पर पड़ जाती है तो कोई बड़ी उम्र का साथी हंसते हुए कहता है कि डरो मत, यह कोई मकड़ी नहीं, रानी कीड़ा है, भगवान की बूढ़ी मां। मुलायम इस तरह है कि मन खुश हो जाए… आओ! इसे हाथों में उठा लें। अभी तो हमने सिर्फ एक रानी कीड़ा देखा है, और भी होंगे कहीं छिपे हुए…!

धीरे-धीरे दुर्लभ होते जा रहे इन कीड़ों पर नजर पड़ती है तो ये मन को आकर्षित करते हैं। ऐसा लगता है कि ये मन की पीड़ा को कम करने में मददगार होते हैं। शायद ईश्वर ने इन्हें सचमुच बड़े प्रेम और आत्मीयता से बनाया है। बरसात के ये नन्हे मेहमान अमूमन हर जगह के बच्चों के लिए एक अबूझ रहस्य की तरह होते हैं। जीवन का ऐसा पाठ भी होता है, जो पढ़ा जाता है अपने छोटे-से अस्तित्व से दुनिया को खुशियां देना और अपने नन्हे से शरीर से मानवता को आनंद विभोर कर देना। इसके बाद यह नन्हा-सा कीड़ा पता नहीं किन-किन शक्लों में लोगों को सुकून देता होगा।

यह प्रकृति सचमुच कितना कुछ देती है हमें, कई बार हम गौर नहीं कर पाते। लेकिन इसके बदले हमसे कुछ लेती नहीं है। यही है जिसकी गोद में हम कुदरत को समझ सकें तो हम मनुष्य भी एक रहस्य हैं, जैसे लाल रानी कीड़ा, जो असल में वीर बहूटी है। प्रकृति ने इस लाल कीट को जन्म दिया, प्रकृति ने मनुष्य को भी रचा। यह प्रकृति की नियामत है। हिचक मिटने के बाद बच्चे नन्हे-से हाथों में वीर बहूटी को उठा लाते हैं, तो हाथों पर उनके चलने के स्पर्श से एक गुदगुदी ऐसे अनुभवों से दो-चार करती है जो अनिर्वचनीय है और जिसका वर्णन शब्दों में कोई क्या कर सकता है!

सच तो यह है कि प्रकृति ने हर शै को यह रहस्यपूर्ण भाव से रचा है। सबकी अपनी उपयोगिता है। संसार में ऐसी कोई वस्तु या प्राणी नहीं, जिसे प्रकृति ने रचा हो और उसका कोई न कोई उपयोग और महत्त्व न हो। बस हमें समझना और देखना होता है, महसूस करना होता है। हममें अगर यह क्षमता है तो हम संसार को एक नई दृष्टि से देख सकते हैं और आनंद विभोर हो सकते हैं। आसमान की ऊंचाइयों को छू सकते हैं। यह दृष्टि हममें है, बस उसके लिए हमें प्रयास करना होगा। अगर हम गंभीर हैं मन में चाहत है तो इसे सहज ही अनुभूत किया जा सकता है।

प्रकृति और मनुष्य का संबंध शाश्वत है और रहेगा। इसके बगैर मनुष्य असल में मनुष्य नहीं है। बहुतेरे लोग धन-संपदा की दौड़ में प्रकृति से विमुख हो जाते हैं। उनके लिए माया ही सर्वस्व है। मगर वे भूल जाते हैं कि इस दौड़ में जीवन का आनंद उन्होंने खो दिया है, क्योंकि चाहे मनुष्य जितनी संपदा अर्जित कर ले, आखिर उसे चाहिए क्या! यह हमारे ज्ञानियों और ध्यानियों ने बार बार बताया है।

ऐसे में ध्यान करने की जरूरत है प्रकृति का। प्रकृति के सबसे प्यारे आगाज सावन-भादो का, जब यह पृथ्वी हसीन हो जाती है। आंख भर कर देख लिया जाए साल भर का सबसे जहीन महीना। पृथ्वी हरी चादर ओढ़ लेती है। चहुं ओर हरियाली प्रसारित होती है और चादर में कहीं लाल बहूटी यानी रानी कीड़ा का दिखना मन रोमांच और खुशी से भर उठता है। यह बच्चों के लिए जितनी रहस्यमय है, बड़े-बूढ़ों के लिए भी कम नहीं। यही कारण है कि मूर्धन्य कवि भी इसके लावण्य से मोहित हुए और अपनी कलम बड़ी ही आत्मीयता से चलाई है।

यह एक एक ऐसा कीड़ा है जो सभी कीट-पतंगों में सबसे खास स्वरूप रखता है, इसलिए लोगों की नजर भी इस पर टिकती है। इस वर्षा काल में हममें से किसी ने वीर बहूटी का दर्शन किया या नहीं, यह हमारे परिवेश पर निर्भर करता है। सावन भादो के महीने में इसे देखना और उससे रोमांचित होना भी इससे तय होता है कि हम कुदरत के रंग को अपने भीतर कितना भर पाते हैं। तो इन महीनों में वीर बहूटी को खोज कर कुछ पलों के लिए उन्हें हाथों में लेकर मौसम और प्रकृति का स्वागत किया जा सकता है।

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