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दुनिया मेरे आगेः तस्वीर के तार

कुछ समय पहले एक तस्वीर पर नजर पड़ी, जिसमें एक मां अपनी छोटी बच्ची को गोद में लिए खड़ी थी और उसने पैर में पायल पहनी हुई थी। वह ‘बेटी बचाओ’ का संदेश था, जो पिछले कुछ सालों से चारों ओर गूंज रहा है।

Author August 9, 2018 4:13 AM
किसी विज्ञापन में बच्चों को दिखाया जाता है तो उनमें लगभग सभी में वैसे बच्चों को चुना जाता है, जो गोरे होते हैं और जिन्हें समाज में सुंदर माना जाता है।

प्रेरणा मालवीया

कुछ समय पहले एक तस्वीर पर नजर पड़ी, जिसमें एक मां अपनी छोटी बच्ची को गोद में लिए खड़ी थी और उसने पैर में पायल पहनी हुई थी। वह ‘बेटी बचाओ’ का संदेश था, जो पिछले कुछ सालों से चारों ओर गूंज रहा है। उस तस्वीर में जो बात मुझे खास लगी, वह यह थी कि सांवली-सी महिला को प्रथम प्रभाव के स्तर पर ही साधारण पृष्ठभूमि की दर्शाया गया था, जबकि लगभग अंग्रेज-सी दिखती बच्ची खूब गोरी और सामाजिक दृष्टिकोण के मुताबिक सुंदर थी। मैंने सोचा कि ऐसा क्या था, जिसने मेरा उस ओर ध्यान खींचा। दिमाग पर जोर डालने के बाद इस बात पर ध्यान गया कि अगर किसी विज्ञापन में बच्चों को दिखाया जाता है तो उनमें लगभग सभी में वैसे बच्चों को चुना जाता है, जो गोरे होते हैं और जिन्हें समाज में सुंदर माना जाता है। इसके अलावा, जिम, पार्लर कोचिंग क्लास या फिर महिला डॉक्टरों के क्लीनिक या अस्पताल में भी गोरे और ‘सुंदर’ बच्चों की फोटो ही लगी होती है। खासतौर पर सौंदर्य प्रसाधनों के विज्ञापनों में तो यह आम है।

हम लोग इसके इतने ज्यादा आदी हो गए है कि इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। हमारे आसपास इतनी सारी घटनाएं होती रहती हैं, मगर हमारा ध्यान उस ओर नहीं जाता है। आजकल हमारी मानसिकता और सोचने-समझने का तरीका वाट्सऐप समूह में आए संदेश बनाते हैं। उनमें कितनी हकीकत और कितना फसाना होता है, इसकी पड़ताल करने का समय और समझ बहुत कम लोगों के पास ही है। हर इंसान अपने में खूबसूरत, अद्भुत और अद्वितीय होता है। फिर उसको रंग-रूप, कद-काठी के हिसाब से कम-ज्यादा महत्त्व देना कितना उचित है? हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं। ऐसे बहुत से उदाहरण हमारे सामने होंगे। आज के समय में यही किसी उत्पाद की गुणवता और बिक्री तय करने के मानक भी बन गए हैं। यानी जो लोग इन विज्ञापनों वाले चेहरों से नहीं मिलते हैं तो उनमें कोई कमी है, उन्हें वैसा ही बनना चाहिए। यह सीधे तौर पर कहा नहीं जाता है, मगर उसमें छिपा अर्थ शायद यही होता है।

जाने-अनजाने हम सब इस तरह की सोच की गिरफ्त में हैं। सिर्फ युवा नहीं, हर उम्र के लोगों पर इसका असर पड़ रहा है। जिन विदेशी चेहरों को हमारे देश के विज्ञापनों में बहुतायत से दिखाया जाता है, क्या उनके देशों में हमारे यहां के चेहरे रूप-रंग का उपयोग किया जाता होगा? शायद नहीं। फिर हम क्यों यह सब कर रहे हैं और उसके पीछे हम कितने सारे प्रश्न छोड़ रहे हैं? हम अपने देश की युवा और भावी पीढ़ी को क्या दिखाना चाहते हैं, कैसी समझ देना चाहते हैं और उन्हें किस होड़ में शामिल करना चाहते हैं? हमें पता भी नहीं चलता है और इसका सिरा कई दूसरे मनोभावों से भी जुड़ता चला जाता है। आकर्षण के केंद्र में सिमटते किशोरों और युवाओं में अपने भविष्य के बारे में सोचने-समझने की सलाहियत न्यून रह गई है और वे केवल वर्तमान के सुख को अपना मकसद मानने लगे हैं। हालत यह है कि अच्छे और संपन्न घरों से आने वाले कितने ही पढ़े-लिखे युवा भी अपने शौक पूरे करने के लिए जुर्म की राह पर चल पड़ते हैं।

अच्छा दिखने और अच्छा होने में फर्क है। विज्ञापनों की चकाचौंध के इस दौर में हम बस अच्छा दिखने की होड़ में सारे जतन करते हैं, चाहे वह तरीका सही हो या गलत। इसमें एक अच्छा इंसान होने की कोशिश कोई मायने नहीं रखती, व्यक्ति के रूप-रंग ही मुख्य होते हैं। भारत एक बहु-सांस्कृतिक और विविधताओं से भरा देश है। साथ ही इसकी भौगोलिक स्थिति के मुताबिक हमारे रंग-रूप, नयन-नक्श भी तय होते हैं। यह एक प्राकृतिक सच है और इसमें कोई बुराई या कोई कमी नहीं है। हम सभी को अपने अस्तित्व का तहेदिल से स्वागत करना और अपनाना चाहिए। गोरेपन को बेहतर और सांवलेपन को कमतर मानने की मानसिकता में एक तरह की गुलामी का भाव पलता है।

सवाल है कि क्या किसी विषय या वस्तु को सुंदर और बेहतर बताने वाले विज्ञापनों की तस्वीरों में झारखंड या छत्तीसगढ़ की किसी अदिवासी या फिर उत्तर-पूर्व की किसी महिला और बच्चे का चेहरा नहीं हो सकता है? किसने यह प्रचारित किया और यह सामाजिक प्रभाव पैदा किया कि सांवला रंग आकर्षण पैदा नहीं करता है? कहते हैं, किसी बच्चे की भाषा अस्वीकार करने का मतलब है उसके पूरे अस्तित्व को नकार देना। लेकिन ऐसा करते हुए शायद ही किसी का ध्यान इस ओर जा पाता है। इसका कारण समाज में पीढ़ियों से चली आ रही सोच और आज बाजार के जरिए इसका विस्तार है, जिसमें हमारे भीतर अपने और आसपास के समाज को सुंदर मानने की संवेदना पैदा नहीं हो पाती। जो चीजें हम बहुतायत में देखते हैं, उनसे हमारी मानसिकता और विचारधारा बनती है। यह एक धीमी प्रक्रिया है, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होता है।

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