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दुनिया मेरे आगेः उजड़ते आशियाने

खरगोश मुलायम-सा अहसास देने और प्राकृतिक परिवेश में रहने वाला जीव है। कुछ साल पहले कुल्लू की वादियों में एक खरगोश सफारी में बहुत सारे खरगोशों को देखा था।

Author August 20, 2018 5:24 AM

मिथिलेश श्रीवास्तव

खरगोश मुलायम-सा अहसास देने और प्राकृतिक परिवेश में रहने वाला जीव है। कुछ साल पहले कुल्लू की वादियों में एक खरगोश सफारी में बहुत सारे खरगोशों को देखा था। छोटे-छोटे दड़बेनुमा लकड़ी के पिंजड़ों में एक साथ दर्जन भर खरगोशों को रखा गया था। उनके रोएं को छूने से मुलायम स्पर्श का अहसास होता था। खाने के नाम पर पेड़ों के पत्ते उनके पिजड़ों में डाले जा रहे थे। लोगों ने बताया कि उनके मुलायम बालों से गर्म कपड़े बनते हैं। आलोकधन्वा की एक कविता ‘पतंग’ की कुछ पंक्तियां हैं- ‘सबसे तेज बौछारें गर्इं भादो गया/ सवेरा हुआ/ खरगोश की आंखों जैसा लाल सवेरा…।’ इसे पढ़ने के बाद खरगोश की आंखें देखने की बेचैनी रही। बहुत बाद में मेरी बेटी एक खरगोश घर में पालने के लिए ले आई। उसके आते ही सबसे पहले मैंने उसकी आंखों में गौर से झांक कर देखा। वही लाली, वही तेज जो हमारी आंखों में चुभता नहीं है। उसकी आंखों से अपनी आंखें मिला कर देखने से वही आभास हुआ जो भादो के जाने के बाद के सवेरे को देखने से होता है।

अगर आपने खरगोश की आंखें अब तक नहीं देखी हैं, तो देखिए उसकी लाल आंखें चमकती हुर्इं। वे डराती नहीं हैं। अपने प्राकृतिक आवास से बाहर मेरे घर के अंदर इस उछलते-कूदते, रूठते, उदास और अनमना होने के साथ-साथ अपने मूल स्वभाव से अलग जीवन जीते इस खरगोश की अब यही कहानी है कि बाजार से भरे झोले के साथ घर में प्रवेश करते ही मेरे सामने अपने दो पैरों पर खड़े और दो पैरों को हाथ की तरह जोड़े ऐसे लपकता है, जैसे उसे मालूम है कि झोले में उसके खाने के लिए कोई सामान जरूर होगा। हम जब जूता पहनने लगते हैं, तो वह यह समझ कर उदास हो जाता है कि हम घर से बाहर जा रहे हैं। एक दिन बाजार से आकर झोला फर्श पर रख कर मैं किसी काम में व्यस्त हो गया। थोड़ी देर बाद झोले पर नजर पड़ी तो देखा कि वह खुद झोले में से अपने खाने की चीज, मसलन बीन्स निकाल कर खा रहा था।

खरगोशों को दिन भर खाते रहने की प्राकृतिक आदत है। अपने घरों में हम जो खाते हैं, पालतू होने की वजह से वही उसे भी खाना पड़ता है। कहने का मतलब कि अब उसकी आदतें हमारे जैसी हो गर्इं हैं- रोटी, भात, ब्रेड, कच्ची सब्जियां, भुने या अंकुराए हुए चने आदि। हम उसका बहुत खयाल रखते हैं। लेकिन है तो वह प्राकृतिक परिवेश में रहने वाला ही। उसे हमने उसके स्वाभाविक परिवेश से उजाड़ कर एक ऐसी जीवन-शैली अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है जो उसकी है नहीं। जंगलों, झाड़ियों की ओट में ये मासूम अपनी जिंदगी को रहने लायक बनाते होंगे। लेकिन जरा सोचिए कि विकास, सुरक्षा या सुविधा के लिए उजाड़ दिए गए जंगलों, झाड़ियों के अभाव में कितने जीव-जंतु मर या बिला गए होंगे। गिलहरियां फर्राटे से दौड़ लगाती हैं। दिल्ली के नेहरू पार्क के बेंच पर बैठे हुए हमने उन्हें देखा है लोगों के आसपास मंडराते हुए, भोजन की तलाश में। गिलहरियों को लोगों के दिए चिप्स, रोटी के टुकड़े खाते भी देखा है।

प्रकृति में वास करने वाले जीव-जंतुओं को इस तरह देख कर मन में क्षोभ होता है। गिलहरियों के सामने से चिप्स या रोटी के टुकड़े को लूट लेने के लिए कुत्ते और कौवे या दूसरे पक्षी टूट पड़ते हैं। इन जीव-जंतुओं को इस हालत में हमने पहुंचाया है। वे बोल नहीं सकते, लेकिन देख और सुन सकते हैं और अपनी सीमा में विरोध भी जता सकते हैं। हम लगातार संवेदनशून्य होते गए हैं। जब हम इंसान की फिक्र नहीं करते हैं तो इन जीव-जंतुओं की क्या परवाह करेंगे! बचपन में हमने अपने गांव में झाड़-झंखाड़ वाली जगहें देखी थीं। वहां हमें जाना मना था। लेकिन हम ऐसी कम रोशनी वाली और अधिक डरावनी जगहों पर जाते थे और कहते थे कि एलिस के वंडरलैंड से लौट कर आ रहे हैं। उन जगहों पर अनेक वंडरलैंड में रहने वाले जीव-जंतु मिलते, जो अब जंगलों की साफ-सफाई के बाद नहीं दिखते। इसमें कोई शक नहीं कि बाग-बगीचे, झाड़-झंखाड़, तरह-तरह की लताएं जो उन जगहों को वंडरलैंड बनाती थीं, झाड़ियां-जंगल जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास थे, जहां उनके लिए घर-घोंसला बनाने के लिए पर्याप्त जगह और सामग्री उपलब्ध होती थी, भोजन भी पर्याप्त मिलता था।

बचपन में आम के बगीचे में गिलहरियों को दौड़ते-भागते, सुग्गों को पके अमरूदों को इधर से उधर करते, कोयल की घने पत्तों के पीछे छिप कर दर्द भरी सुरीली आवाज निकालते देखा-सुना है। इंसानों की तरह ही जीव-जंतुओं को जीवनयापन के लिए थोड़ी-सी ओट, थोड़ी-सी छाया चाहिए। उनके प्राकृतिक आवास छिन गए हैं। भोजन और आवास के लिए संघर्ष जीव-जंतुओं के बीच भी दिखाई देने लगा है।

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