बदलाव के बावजूद

समाज का ढांचा बहुत संगठित होता है। इसमें छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग तक विभिन्न आयु वर्ग के सदस्य होते हैं।

सांकेतिक फोटो।

देवेश त्रिपाठी

समाज का ढांचा बहुत संगठित होता है। इसमें छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग तक विभिन्न आयु वर्ग के सदस्य होते हैं। कभी-कभी बुजुर्ग किसी बात पर झल्ला जाते हैं, तो छोटे उसी बात को लेकर उनकी खुशामद करते हैं। पहले जब किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार होती थी, तो बुजुर्ग उसमें बढ़-चढ़ कर प्रतिनिधित्व करते थे, पर अब युवा वर्ग उनकी अगुआई को आंख मूंद कर स्वीकार नहीं करना चाहते। वे अपने मन के अनुसार ही सारा कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं। शादी-ब्याह का मामला हो या घर के छोटे-मोटे आयोजन, सबमें भोजन, सजावट, पहनावा आदि को लेकर सारा फैसला युवा वर्ग करना चाहता है। अदब और लिहाज की परंपरा और मान-मर्यादा का जिस हिसाब से समाज में पतन हो रहा है, वह वास्तव में नुकसानदेह है।

पहले के समय में जिस हिसाब से खपरैल के मकान हुआ करते थे, वह भवन निर्माण की परिपाटी अब धीरे-धीरे लगभग समाप्त हो गई है। गिट््टी, बालू मोरंग का चलन जब नहीं था, तब मिट््टी और कच्चे गारे से घर बनता था। बड़े-बड़े पत्थर लगते थे। पर अब तो बहुमंजिला इमारत बनाने का पहले से ही ठेका हो जाता है। बड़े-बड़े भवन निर्माता एक निश्चित समय के अंदर घर बनाने में जुट जाते थे। निश्चित रूप से आज के जमाने में भवनों की मजबूती वैसी नहीं होती, जैसी मजबूती पहले के मकानों में हुआ करती थी। पूरे इलाके में एक ही मिस्त्री हुआ करता था, जो घर भी बनाता था, लकड़ी के दरवाजे और खिड़कियों की नक्काशी भी करता था और बैठने के लिए लकड़ी के अलग-अलग पीढ़े भी बना दिया करता था। हमारे पैतृक आवास पर अब भी ढेका और चक्की रखी हुई है, जिस पर हमने हाथों को गोल घुमा कर कर चने की दाल पीसी है। कोदो चावल और भुजिया चावल खूब हमने ढेंके की सहायता से कूटा है।

आज जिसे शहरी लोग ब्राउन राइस कहते हैं, उसे देहात के लोग अपने घर के बाहर अदहन जला कर तैयार करते थे और उसी पर बगल में भोजन भी पका लेते थे। ठंडी के दिनों में तेज आंच से बड़ी राहत मिलती थी। अब उस तरह खाने-पीने की चीजें तैयार नहीं की जातीं। यही वजह है कि उचित पोषक तत्त्व हमारे शरीर में उतनी मात्रा में नहीं जा पा रहे हैं, जितनी उस देहाती भोजन से जाया करते थे। हर मौसम में पालिश किए हुए खाद्य पदार्थों और हाइब्रिड बीजों का चलन बढ़ गया है। सब्जियां, फल, मिष्ठान्न में सबसे ज्यादा मिलावट है। ये सभी हमारे यकृत, हृदय और किडनी को नुकसान पहुंचाते हैं। हमारी जिंदगी बाजार के चारों तरफ विक्रेताओं से घिर गई है। अब तो बैलगाड़ी देखे भी काफी दिन हो गए।

जब खेत की जुताई हो जाती थी, तो अनाज बोने के बाद उसमें पाटा फिराया जाता था। पाटा फिराते समय हम उसके ऊपर एक रस्सी पकड़ कर लटकते थे और पूरे खेत पर सुबह से शाम तक घूमते थे। मिट््टी और कीचड़ की महक बहुत आनंदित करती थी। मगर शहरी जीवन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संस्कृति में जो मंहगे इत्र का चलन व्यापक है, वह वहां गौण हो जाता है। महानगरों में तो मिट््टी की महक पाने के लिए अब संपन्न लोगों के बीच फार्महाउस संस्कृति विकसित हो रही है। गांवों में बिना जूते-चप्पल के खेत-खलिहान, जुताई आदि के सारे काम कर लिए जाते थे। आज ट्राली-ट्रैक्टर, जेसीबी, बड़ी-बड़ी मशीनों ने आदमियों के हिस्से के काम को खत्म कर दिया और उनकी रोजी-रोटी छीन ली। इससे समय की बचत जरूर हुई है, पर आदमियों के हिस्से में कुछ नहीं लगा।

समाज में अनेक जातियों के लोग रहते हैं, उनकी विचारधारा अलग होती है। फिर भी वहां शहरों जैसा वैचारिक प्रदूषण और सन्नाटा नहीं रहता। गांवों में चौपाल अब भी लगती है, दो-चार लड़के क्रिकेट खेलते हुए, दो-चार बुजुर्ग गमछा बांधे अक्सर मिल ही जाते हैं। गांवों में अब भी पुरोहितों का सम्मान है। उनके झोले और साइकिल की घंटी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। शहरों में कामकाजी वर्ग के पास इतनी फुरसत नहीं है कि वह बड़े, बूढ़े, बुजुर्गों के पास बैठने का समय दे पाए। शहरों में कभी न खत्म होने वाली रफ्तार है, दिखावटीपन ज्यादा है। कभी-कभी ‘चीफ की दावत’ भी लगती है। पांच सितारा होटलों में मद्यपान के इर्द-गिर्द देर रात तक मौज-मस्ती की जाती है। गांवों की तरफ खेत-खलिहान के अलावा चौपाल और पीपल-बरगद, अमलतास अधिक दिखते हैं। कौवे की कांव-कांव और कोयल की कूक अब भी आगंतुक के आने की शुभ सूचना दे जाते हैं। शहरों में पक्षियों की घटती संख्या पर्यावरण के बढ़ते प्रदूषण की ओर इशारा करती है। गांव और शहर की जीवन-शैली में अंतर है, पर रोजमर्रा की जिंदगी समान रूप से जीने वाले लोग दोनों जगहों पर हैं और आगे भी रहेंगे।

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