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दुनिया मेरे आगे: मटके के आंसू

मटका भारतीय समाज की परंपरा है। भारतीय संस्कृति का वाहक है। शोक हो या सुख, मंगल हो या अमंगल, हर वक्त मटका हमारे साथ होता है। भारतीय परंपरा से नई पीढ़ी वाकिफ नहीं है।

मिट्टी का घड़ा। (फाइल फोटो)

जो मटका हमारे सूखे गले को अपने भीतर के ठंडे जल से तर करता रहा है, आज वही आंसुओं में डूबा हुआ है। आपने मटके का पानी तो बार-बार पीया होगा, लेकिन जिस स्नेह के साथ वह आपको अपने भीतर के जल से राहत देता है, उसे कभी महसूस किया हो, तो आपको मटके का दर्द पता चलेगा। मटका चिल्ला कर अपना दुख नहीं बता सकता है। उसे आप निर्जीव मान कर चलते हैं। पर सही मायने में वह भी आपको महसूस करता है।

कोरोना के इस दबे आक्रमण के कारण मटका दरकिनार कर दिया गया है। मटका कह रहा है- भाई इस समय मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। मेरी शक्ति को पहचानो। आज तक मैंने इसके सिवा किया क्या है? तपती सड़कों पर चलते मनुष्य को एक गिलास ठंडा पानी ही तो दिया है। कुछ लोग मुझे कोई सौ-पांच सौ मीटर की दूरी पर रख देते थे। मेरे ऊपर लिपटा लाल रंग का कपड़ा मेरी वर्दी हुआ करता था। किसी भी राहगीर को मैं इसी कपड़े से अपने पास बुला लेता था। आज मैं बेबस हूं। हाशिए पर पड़ा हूं। यकीन मानिए, चाहे बोतलबंद पानी जितना बांट लीजिए, वह पीने के काम आएगा, लेकिन मेरे भीतर सहेज कर रखा गया जल तृप्ति देता है। मन को सुकून देता है। आज राहगीर प्यासा है और मैं बेचैन।

मटके के आंसू आप देख नहीं सकते, उसे आपको महसूस करना होगा। जिस तरह आप हवा को पकड़ नहीं सकते। सूरज की किरणों को बांध नहीं सकते। चंद्रमा की शीतलता का अहसास मात्र कर सकते हैं, वैसे ही मटके की पीड़ा को आप महसूस कर सकते हैं। मई माह की तपन अपनी जवानी पर है। इस बार फकत अंतर इतना है कि बंदी के कारण पर्यावरण साफ है। धूप चुभ नहीं रही है। थोड़ी-सी राहत शाम को हवा से मिल जाती है, लेकिन मटके के ठंडे पानी का विकल्प तो अब भी नहीं है। घड़े को इस बात की भी शिकायत नहीं है कि वह घरों में कैद होकर रह जाए। वह तपती दोपहरी उस श्रमिक की भांति अपना कर्तव्य पूरा करना चाहता है, जो ऊंची इमारत तो बना देता है, लेकिन उसे अपना घरौंदा कभी नहीं मानता।

मटका भारतीय समाज की परंपरा है। भारतीय संस्कृति का वाहक है। शोक हो या सुख, मंगल हो या अमंगल, हर वक्त मटका हमारे साथ होता है। भारतीय परंपरा से नई पीढ़ी वाकिफ नहीं है। बहुतेरे नए बच्चों को तो इस बात की खबर भी नहीं है कि गर्मी के दिनों में नए मटके में जल भरने का वक्त कौन-सा होता है? उन्हे तो हमने यह भी नहीं सिखाया कि मटके में जल भरने के पहले उसका नेग किया जाता है। यह नेग मटके का मान है।

संस्कृति और परंपरा के बीच धड़कन की तरह मटका हमारे जीवन में हर वक्त मौजूद रहता है। अम्मा कहती थीं कि मई माह में जब अखातीज हो जाए, उसके दूसरे दिन मटके में स्वच्छ जल भरा जाए। इस जल भरे मटके की पूजा कर सिक्का जल के भीतर डाला जाए। जल से भरा पहला मटका मंदिर में रखे जाने का रिवाज था। फिर हैसियत के अनुसार तीन, पांच, सात यानी विषम संख्या में मटके सार्वजनिक स्थानों में रखे जाते थे। इसके बाद घर के उपयोग के लिए मटका रखा जाता था। हर मटके पर सुंदर-सा लाल रंग का कपड़ा लपेटा जाता था। इस तरह एक मटके का पूरे विधि-विधान के साथ स्थापना होती थी।

यह परंपरा अभी पूरी तरह तिरोहित नहीं हुई है, लेकिन मटके की उपयोगिता नए जमाने में खत्म होती चली गई है। फास्टफूड वाले बच्चों के गले में शुद्ध जल की जगह कोल्डड्रिंक उतरने लगा। फ्रिज में रखी पानी की बोतल उनकी प्यास बुझाने लगा। आपाधापी और दौड़भाग के इस दौर में हर कोई जल्दी में है। शॉर्टकट से कुछ मिला या नहीं मिला, यह तो समय बताएगा, लेकिन बीमारी और तनाव ने जैसे जीवन को छोटा कर दिया है। ऐसे में मटके की किसे और क्यों जरूरत है। आज मटका जरूर इस बात के लिए आंसू बहा रहा है कि इस संकट में उसे दरकिनार कर दिया गया है, लेकिन सच तो यह है कि मटका हमारे जीवन से बहुत पहले दूर जा चुका है।

सुराही तो शायद चलन से बाहर ही हो गई है। कभी फिल्मों या कहानियों में नायिका की गर्दन का उल्लेख होता था- सुराहीदार गर्दन। हालांकि लिखने-बोलने में भी अब सुराहीदार गर्दन का बहुत उपयोग नहीं होता। कुछ पुराने या मध्यवर्गीय परिवारों में सुराही देखने को मिल जाएगी। वहां भी सुराही फैशन के लिए है, उपयोग के लिए नहीं। बाजार ने मटका और सुराही के साथ उस पूरी परंपरा को निगल लिया है। बोतल और पाउच की आदत ने हमारा जीवन ही खराब नहीं किया, बल्कि पर्यावरण का भी सत्यानाश किया है।

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