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दुनिया मेरे आगे: सवारी साइकिल की

साइकिल का इतिहास वैसे दो सौ वर्षों का है। मानते हैं कि पहली साइकिल जर्मनी के कार्ल वान ड्रेज ने 1817 में बनाई थी, जो वाडेन (जर्मनी) के ग्रांड ड्यूक के यहां उच्च अधिकारी थे। इन दो सौ वर्षों में साइकिल ने भारी तरक्की की है

प. बंगाल में साइकिल से स्कूल जातीं छात्राएं।

बहुतों की तरह साइकिल की सवारी मुझे भी बहुत प्रिय है। उसको लेकर कई खट्टे-मीठे अनुभव और किस्से कहानियां भी हैं, जो साइकिल चलाना सीखने, सिखाने और छोटी दूरियों से लेकर लंबी दूरियों पर निकल जाने तक से संबंधित हैं। इन कठिन दिनों में, खिड़की या बालकनी से, दूर-पास की दिखने वाली सड़कों पर, अन्य वाहनों की तरह साइकिल भी नहीं दिखी या कम दिखी, पर उसकी सुधि आती रही। अपने रिहायशी परिसर की भीतरी सड़कों पर भी वह कहां दिखी, जिसको लेकर शाम को किशोर-किशोरियां निकला करते थे। वे सब भी तो घरों के भीतर बंद थे। पर, कभी-कभार, नीचे उतरने पर, चौथी मंजिल से, सीढ़ियों के पास रखी हुई, ‘बच्चा’ और ‘किशोर’ साइकिलें धूल खाती दिखाई पड़तीं, तो मन में एक टीस-सी उठती!

किशोर और युवा-प्रौढ़ दिनों में भी साइकिल खूब चलाई है। इधर जरूर कई वर्षों से उसके पैडल खुद नहीं घुमाए हैं, पर उसे चलता हुआ देखने का आकर्षण कभी कम नहीं हुआ है। सो, देश में और एशिया-यूरोप के देशों की अपनी यात्राओं में, तरह-तरह की, कई रंगों वाली साइकिलों को जब भी देखा है, मुग्ध होकर देखा है- चीन, जापान, नार्वे, जर्मनी आदि में। हमारे यहां भी धुर पहाड़ी इलाकों को छोड़ दें, तो मैदानी इलाकों में, कब ऐसा हुआ है कि नहीं दिखी है- साइकिल; राजस्थान, गुजरात में, कर्नाटक में, बंगाल में, बिहार, उत्तर प्रदेश में, यहां तक कि मणिपुर में!

एक जमाना था जब साइकिल एक सपना हुआ करती थी। अब तो खैर यह हुआ है कि अगर आपके पास साइकिल न हो, तो आप उसे किराए पर ले सकते हैं। पर, अब भी वह हर इलाके में किराए पर तो मिलती नहीं है! जो भी हो, साइकिल की सवारी का अपना आनंद है। और आज भी वह बहुतों के लिए यातायात का एक अच्छा साधन है। अफसोस है तो यही कि हमारे देश में, ‘सोशल स्टेटस’ के प्रति ‘कांशस’ लोग उसे कुछ हेय दृष्टि से देखने लगे हैं!

पर दुनिया के बहुतेरे देशों में उसको लेकर ऐसी कोई दृष्टि है नहीं, और यूरोप के कुछ देशों से, ऐसी तस्वीरें भी आ ही जाती हैं, जो एक सामान्य नागरिक की तरह, साइकिल चलाते किसी प्रधानमंत्री, मंत्री तक की होती हैं। यह तो हमारे यहां ही है कि कोई सांसद/ अधिकारी अगर साइकिल से संसद/ दफ्तर जाने की बात सोचे तो वह एक बड़ी या छोटी-मोटी खबर तो बना ही दी जाती है, भले उस सांसद/ अधिकारी की ऐसी कोई इच्छा न हो।

साइकिल का इतिहास वैसे दो सौ वर्षों का है। मानते हैं कि पहली साइकिल जर्मनी के कार्ल वान ड्रेज ने 1817 में बनाई थी, जो वाडेन (जर्मनी) के ग्रांड ड्यूक के यहां उच्च अधिकारी थे। इन दो सौ वर्षों में साइकिल ने भारी तरक्की की है: अपने आकारों, रूपों-रंगों में, कल-पुर्जों में, और ‘सुविधाओं’ में। फिर, ‘स्पोर्ट साइकिलें’ हैं, जिम के साइकिली पहिए हैं- और बच्चों की दुपहिया-तिपहिया साइकिलों की मनमोहकता के तो कहने ही क्या! और शिशुओं के लिए, ‘प्रैम’ जिसे शिशु के साथ ही दुलारने का मन करता है।

साइकिलों ने ही, साइकिल-रिक्शों का भी मार्ग प्रशस्त किया। स्वयं मोटर साइकिल, और मोटरकार का भी, जो 1885 के आसपास आविष्कृत हुईं। पहले जर्मनी में ‘वेंज’ मोटर वैगन प्रचलित हुई, फिर 1908 में ‘फोर्ड’ कार आ गई! जो भी हो, साइकिल, साइकिल है, और आज भी वह बहुतों की पहली पसंद है, भले ही, उनके पास कार भी हो। चित्रकार सीरज सक्सेना उसके गुण गाते हैं। अपनी विदेश यात्राओं में भी, वे साइकिल की सवारी मजे से करते हैं।

पोलैंड के एक शहर के एक रेस्तरां में बैठे हुए वे यह तक नोट करते हैं : ‘कोई साइकिल सवार तेजी से आया और चला गया।’ दरअसल, साइकिल के साथ ‘हवा’ का एक गहरा संबंध है। साइकिल के पहियों के लिए तो हवा चाहिए ही होती है, पर साइकिल सवार तो पसंद करता है, उस खुली निर्बंध हवा को, जो उसके केश उड़ाती, सहलाती है, उसके गालों पर थपकी-सी देती हैं, और पैरों में चंचलता भरती है।

‘कोरोना, कोविड-19’ ने भी यह सिद्ध किया है कि साइकिल ही वह सवारी है, जो धुआं नहीं उड़ाती, जबकि मोटर वाहनों के कारण ही तो हमारा आसमान काला हो जाता है, और हवा प्रदूषित हो जाती है। कितना अच्छा हो कि साइकिल की संख्या बढ़े और अधिकतर जनसंख्या उसका उपयोग करने लगे। उसका स्टेटस बढ़ा हुआ मान लिया जाए।

हमारे महानगर, छोटे-मंझोले शहर, गांव-कस्बे, मुफ्फसिली इलाके अब भी साइकिलों की जरूरत महसूस करते हैं, यह अच्छी बात है। हां यह बात अलग है कि उनका चलन कहां-कितना बढ़ा या घटा है! वह बढ़े यही कामना है। विभिन्न अवसरों पर हमें उसकी सुधि आती रहे, यह भी जरूरी है। साइकिल अब भी बच्चों की बड़ी प्रिय चीज है, वह बड़ों की भी और प्रिय बने। बनती रहे।

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